हेमंत पाल

काफी साल पहले एक फिल्म आई थी ‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है।’ इस फिल्म में अल्बर्ट पिंटो का गुस्सा महज अभिनय था। लेकिन, अभिनेत्री कंगना रनौत को फ़िल्मी गुस्सा नहीं आता। ये बात अलग है कि उनके गुस्से का कारण कुछ भी हो सकता है। कंगना रनौत इन दिनों फिर गुस्सा हैं। वैसे भी वे सामान्य कम ही रहती हैं। जरूरी नहीं कि उनके गुस्से का कोई आधार हो। कंगना कब किस बात पर अपना आपा खो दें, कोई नहीं जानता। वास्तव में तो कंगना असहमति का दूसरा नाम है।

हर मामले में अपनी सलाह और नज़रिया व्यक्त करना कंगना की आदत है। इन दिनों वे एक्टर सुशांतसिंह राजपूत की आत्महत्या वाले मामले में उखड़ी हुई हैं। साथ ही चीन की घुसपैठ पर भी नाराज हैं। राम मंदिर निर्माण के शिलान्यास वाले दिन अमिताभ बच्चन का कोई ट्वीट न करना भी कंगना के पेट दर्द की एक वजह है। बॉलीवुड में कम ही लोग होंगे, जो इस अभिनेत्री की कसौटी पर खरे उतरते हों। उन्हें हर व्यक्ति में खोट नजर आता है, सिवाय खुद के।

कंगना की इस आदत को उनकी बहन रंगोली ने ज्यादा हवा दी है। सोशल मीडिया पर कंगना के नाम से जो भी आग उगली जाती है, वो इसी बहन के कारण है। कंगना की नजर में पूरा बॉलीवुड ख़ामियों से भरा है और सभी उनकी उपलब्धियों से जलते हैं। दरअसल, ये इस अभिनेत्री की खुद को सर्वश्रेष्ठ समझने की ग़लतफ़हमी है, और कुछ नहीं। उन्हें हर फ़िल्मकार से शिकायत है कि वे बड़े कलाकारों के बच्चों को लेकर ही फिल्म क्यों बनाते हैं। इससे कई प्रतिभाशाली कलाकार दबकर रह जाते हैं।

सुशांत की आत्महत्या वाले मामले में कंगना ने किसी को भी कठघरे में खड़ा करने में देर नहीं की। नेपोटिज्‍म (भाई-भतीजावाद) के नाम पर उन्होंने करण जौहर से लगाकर यशराज फिल्म्स, महेश भट्ट और संजय लीला भंसाली तक को नहीं छोड़ा। इन फिल्मकारों के अलावा टाइगर श्रॉफ और सोनाक्षी सिन्हा तक पर उंगली उठाई। कुछ लोगों ने कंगना को उसी अंदाज में जवाब भी दिया।

इससे इंकार नहीं कि कंगना रनौत अभिनय के मामले में प्रतिभाशाली हैं। क्वीन, तनु वेड्स मनु, तनु वेड्स मनु रिटर्न जैसी फिल्मों में उन्होंने अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया है। लेकिन, परदे की यह अभिनेत्री अपने बगावती तेवरों के कारण आज सोशल मीडिया में खलनायिका बन गई है। राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने, रितिक रोशन के साथ विवाद, पासपोर्ट में गलत उम्र का मामला, नेपोटिज्‍म पर बवाल, जेएनयू मामले पर टिप्पणी और चीन विवाद जैसे कई मामले हैं, जिनपर कंगना बेवजह बोली। यही कारण है कि सोशल मीडिया पर ‘कंगना’ ब्रांड निगेटिव हो गया।

खुद अपने प्रोडक्शन हाउस की फिल्म ‘मणिकर्णिका’ के समय भी उनके डायरेक्टर से कई विवाद हुए। सोशल मीडिया पर कंगना के पक्ष-विपक्ष में अकसर खेमेबाजी होती है। कंगना के खिलाफ ट्विटर पर नकारात्मक हैशटैग भी ट्रेंड करते रहते हैं। राम मंदिर मामले में अमिताभ पर उंगली उठाकर इस अभिनेत्री ने एक नए विवाद को जन्म दे दिया। इसके अलावा कंगना ने तापसी पन्नू को भी सोशल मीडिया में घेरने की कोशिश की। पर, तापसी ने उसी अंदाज में जवाब भी दिया।

अपनी आदत और बगावती अंदाज़ के कारण कंगना बॉलीवुड में अकसर अकेली पड़ जाती हैं। कभी देखा नहीं गया कि कोई कंगना के समर्थन में ज्यादा देर खड़ा रहा हो। उनकी तुनकमिज़ाज, मुंहफट, दबी बातों को उजागर करने और बड़े कलाकारों के साथ फिल्मों के ऑफर ठुकराने के कारण बॉलीवुड में उनकी नकारात्मक छवि बन गई है। यही कारण है कि ज्यादातर फ़िल्मकार और कलाकार अब कंगना से कन्नी काटने लगे। क्योंकि, वे कब, किस बात पर किसको कठघरे में खड़ा कर दें, कहा नहीं जा सकता।

इन आदतों के कारण मीडिया भी कंगना का साथ नहीं देता। भारतीय मनोरंजन पत्रकार गिल्ड ने एक पत्रकार के साथ बदतमीजी को लेकर कंगना रनौत के बहिष्कार तक का फैसला किया था। बॉलीवुड में नेपोटिज्‍म स्वाभाविक है। लेकिन, ये सिर्फ बॉलीवुड में ही नहीं, राजनीति और बिज़नेस वर्ल्ड में भी उतना ही है। ये आज की बात भी नहीं है। बॉलीवुड में राज कपूर परिवार और भट्ट कैम्प आज नहीं पनपे। लेकिन, परदे पर वही लम्बी रेस का घोड़ा बन पाता है, जिसमें क़ाबिलियत होती है। राज कपूर का एक ही बेटा ऋषि कपूर चला, देव आनंद का बेटा अभिनय में नहीं चला, राकेश रोशन दूसरे दर्जे के नायक थे, पर उनका बेटा रितिक आज सफल हीरो है।

शशि कपूर का बेटा नहीं चला, अमिताभ बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा और जीतेंद्र के बेटे भी आउट हो गए, क्योंकि उनमें क़ाबलियत नहीं थी। बड़े अभिनेताओं के बच्चों की असफलताओं की लिस्ट बहुत लम्बी है। लेकिन, औसत हीरो जैकी श्रॉफ़ का बेटा टाइगर आज स्टार है। शत्रुघ्न सिन्हा की बेटी सोनाक्षी भी औसत दर्जे की हीरोइन है, पर महेश भट्ट की बेटी आलिया का जलवा है। इसलिए नेपोटिज्‍म जैसी बहस बॉलीवुड के लिए बेमतलब है।

कंगना को नेपोटिज्‍म के बहाने अपनी व्यक्तिगत कुंठा निकालने का मौका जरूर मिल गया और वे वही कर रही हैं। क्या कंगना के पास इस बात का जवाब है कि यदि वास्तव में बॉलीवुड में नेपोटिज्‍म इतना हावी होता तो खुद उन्हें कोई काम देता? क्योंकि, कंगना का तो कोई गॉड फादर नहीं है। फिर भी उनकी अभिनय क्षमता को पहचाना गया और उन्हें काम मिला। कंगना को नजदीक से जानने वालों का ये निष्कर्ष काफी हद तक सही है कि ये कंगना का राजनीतिक एजेंडा है, जिसे वे नेपोटिज्‍म की आड़ में स्थापित करना चाहती हैं।