अजय बोकिल

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले दौर के मतदान में एक हफ्ता बाकी है, लेकिन चर्चा में सबसे ज्यादा ‘खेला होबे’ जुमला है। इसे चलाया तो तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी ने था, लेकिन लगता है अमल भाजपा खेमे में ज्यादा हो रहा है। यूं तो टिकट को लेकर मारामारी टीएमसी में भी है, लेकिन भाजपा में जिस तरह घमासान मचा है, उससे आला कमान भी चितिंत है। डर है कि चुनावी जीत के लिए अब तक सजाई गई रणनीति कहीं ऐन वक्त पर न गड़बड़ा जाए। चूंकि बंगाल में भाजपा का संगठन पहले ही कमजोर था, अब चुनाव प्रत्या‍शियों के टोटे ने उसे और उजागर कर दिया है।

विधानसभा की 294 सीटों में से भाजपा ने अब तक 157 सीटों पर अपने प्रत्याशियों के नामों का ऐलान कर दिया है, लेकिन इनको लेकर जबर्दस्त बवाल मचा है। पार्टी के पास योग्य प्रत्याशियों की कमी का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि भाजपा ने केन्द्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो सहित 4 सांसदों और 3 विधायकों को चुनाव मैदान में उतारा है। एक और ‘हेवीवेट’ स्वप्न दासगुप्ता ने व्यापक आलोचना के बाद राज्यसभा सांसदी छोड़कर विधायक चुनाव का नामांकन भरा है।

पार्टी में सबसे ज्यादा असंतोष इस बात को लेकर है कि भाजपा उन लोगों को ज्यादा टिकट दे रही है, जो जुमा-जुमा चार दिन पहले ही पार्टी में आए हैं। जो बरसों से भाजपा का काम कर रहे थे, उन्हें दरकिनार कर दिया गया है। इस कारण भाजपा के प्रदेश कार्यालय के आगे जमकर हंगामा और पथराव भी हुआ। हुगली के पूर्व जिला अध्यक्ष शोभन चटर्जी ने तो टिकट न मिलने से दुखी होकर पार्टी ही छोड़ दी। पार्टी द्वारा घोषित उम्मीदवारों में तीन नाम ऐसे भी हैं, जिन्होंने कहा कि वो तो बीजेपी में हैं ही नहीं।

नामों की घोषणा के कुछ देर बाद ही पूर्व कांग्रेस नेता स्वर्गीय सोमेन मित्रा की पत्नी शिखा मित्रा ने कह दिया कि वह चुनाव नहीं लड़ेंगी। इसी तरह टीएमसी विधायक माला साहा के पति तरुण साहा को भी भाजपा ने टिकट दे दिया। तरुण ने बीजेपी के सिम्बल पर नामांकन भरने से इंकार कर दिया। इस अफरातफरी पर टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने तंज किया कि बीजेपी को कुछ होमवर्क की जरूरत है। ममता बनर्जी ने तो यहां तक कह दिया कि बीजेपी ‘गद्दारों और मीरजाफरों को टिकट देती है।‘

पर इसका मतलब यह नहीं कि टीएमसी में कोई ‘खेला’ नहीं हो रहा। वहां भी भारी असंतोष के चलते कई टिकट बदलने पड़ रहे हैं। नाराज नेताओं का पार्टी से टूटकर भाजपा में जाने वालों का ‘खेला’ अभी भी जारी है। उधर लेफ्ट-कांग्रेस-आईएसएफ का ‘संजुक्तो मोर्चा’ एक अलग ‘खेला’ से परेशान है। मोर्चे के मुख्य घटक माकपा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर ‘नारा चोरी’ का आरोप लगाया है। माकपा ने कहा कि प्रधानमंत्री ने पुरुलिया की चुनाव सभा में जनता से जुड़े उन बुनियादी मुद्दों को उठाया, जो हमारे मुख्य मुद्दे रहे हैं। जैसे कि बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, विकास आदि।

माकपा पोलिट ब्यूरो के सदस्य मोहम्मद सलीम ने कहा कि तृणमूल कह रही है कि ‘खेला होबे।‘ हम कहते हैं कि ‘लड़ाई होबे।‘ बहरहाल, यह ‘खेला’ पूरी ताकत से हो, इसके लिए इस चुनाव में भाजपा कोई कसर नहीं छोड़ रही है। हालांकि पिछली विधानसभा में मिली 3 सीटों से सत्ता प्राप्ति के लिए जरूरी 148 सीटों तक पहुंचना कोई हंसी खेल नहीं है। लिहाजा ‘इहलोक’ से लेकर ‘देवलोक’ तक के मुद्दे और प्रतीकों का वह चुनाव में इस्तेमाल कर रही है। ऐसे में राज्य में ‘नई रामायण’ भी गढ़ी जा रही है।

भाजपा अस्सी के दशक में दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले बेहद लोकप्रिय धार्मिक सीरियल ‘रामायण’ के हीरो और भगवान राम का किरदार निभाने वाले अरुण गोविल को पार्टी में ले आई है। अरुण चुनाव तो नहीं लड़ेंगे, लेकिन पार्टी का प्रचार जरूर करेंगे। यह बात अलग है कि ‘राम’ एक जमाने में कांग्रेस का प्रचार भी कर चुके हैं। इस बार उन्हें भाजपा का प्लेटफार्म सबसे सुटेबल लगा। उनका ‘खेला’ यह है कि वो ‘जय श्रीराम’ के नारे के साथ साथ भाजपा को वोट देने की अपील करेंगे।

दीदी इस ‘खेला’ की क्या काट लाती हैं, देखने की बात है। हालांकि वो चंडी पाठ आदि करके अपना ‘खेला’ बनाए रखे हैं। वैसे राजनीति के मंच पर अच्छे-बुरे चरित्रों का खास मतलब नहीं होता। क्योंकि वो कब बाघ और बकरी की तरह एक घाट का पानी पाीने लगेंगे, कोई नहीं कह सकता। बीजेपी तो पूर्व में  रामायण सीरियल के खलनायक रावण यानी अरविंद त्रिवेदी और सीता यानी दीपिका चिखलिया को भी टिकट देकर जिता चुकी है। अलबत्ता इस ताजा राजनीतिक रामायण में राम की पूछ-परख जरा देर से हुई है।

भाजपा को पूरी उम्मीद है कि स्वयं श्रीराम के चुनाव प्रचार में उतरने से ममता बनर्जी को तगडी शह मिलेगी। उन्हें अपनी लंका बचाना मुश्किल हो जाएगा। कहते हैं कि ममता ‘श्रीराम’ शब्द के उच्चारण से भी उखड़ जाती हैं। यही नहीं श्रीराम यानी अरुण गोविल के प्रचार से अयोध्या में निर्माणाधीन श्रीराम मंदिर का संदेश भी अपने आप मतदाताओं में जाएगा। भाजपा में कई लोग मानते हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव में उसके द्वारा बंगाल में 18 सीटें जीतने के पीछे राम नाम का चमत्कार भी था।

बहरहाल इतना तय है कि बंगाल में ‘खेला’ कई स्तरों पर हो रहा है। दलबदल से लेकर टिकट बदल तक। हालांकि भाजपा नेता मानने को तैयार नहीं है कि टिकट वितरण के नाम पर उनके यहां जारी ‘खेला’ गंभीर रूप लेता जा रहा है। पश्चिम बंगाल बीजेपी के प्रवक्ता समिक भट्टाचार्य का दावा है कि  ‘पूरे राज्य में कोई विरोध नहीं है। कुछ जगहों पर लोगों ने असंतोष जाहिर किया है। पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी की नीतियों से आकर्षित होकर बहुत से लोगों ने पार्टी जॉइन की है। यह पश्चिम बंगाल में असली बदलाव का संकेत है।’

दूसरी तरफ आला कमान असंतुष्ट कार्यकर्ताओं को समझाने की पूरी कोशिश कर रहा है। डर यह है कि टिकट न मिलने से नाराज कार्यकर्ता अगर घर बैठ गए तो ‘राम’ भी ज्यादा कुछ नहीं कर पाएंगे। राजनीति में कहा जाता है कि चुनाव के समय टिकटार्थियों का गदर अमूमन उसी पार्टी के दर पर ज्यादा होता है, जिसके जीतने की संभावना ज्यादा होती है। इस एंगल से देखें तो भाजपा में टिकटों को लेकर सबसे ज्यादा मांग और मारामारी है।

सियासत में एक प्रजाति (बकौल पीएम ‘आंदोलनजीवियों की तर्ज पर) ‘टिकटजीवियों’ की होती है। येन-केन-प्रकारेण किसी भी पार्टी का चुनाव टिकट हासिल करना और पूरी बेशरमी से  चुनावी अखाड़े में लंगोट घुमाना इनकी फितरत है। ये वो नस्ल है, जिसकी पार्टी निष्ठा टिकट पाने से शुरू होकर टिकट न मिलने पर खत्म हो जाती है। दरसअल ये चुनावी राजनीति के ऐसे खानाबदोश हैं, जो टिकट देता है, उसी का हुक्का भरने लगते हैं। ऐसे लोग हर पार्टी में हैं। चुनाव टिकट की खातिर राजनीतिक वफादारियों की नीलामी इनका शगल होता है।

तकरीबन सभी पार्टियों को ऐसे ‘काबिल’ नेताओं की जरूरत भी होती है। भारतीय राजनीति का अब यह स्थायी ‘खेला’ बन गया है। मजे की बात यह भी है कि बंगाल में लगभग हर पार्टी ‘खेला होबे’ की चेतावनी दे रही है और ‘भीतरी खेला’ से डरी हुई भी है। बंगाली में ‘खेला होबे’ का अर्थ है ‘खेल जारी है।‘ लेकिन यह खेला,  कौन, किसके साथ और किस रूप में कर रहा है, यह समझने की बात है। दरअसल ‘खेला होबे’ बंगाली रेप सांग है, जो गीतकार देबांशु भट्टाचार्य ने ममता के समर्थन में लिखा है। आशय यह है कि इस ‘खेला’ में अकेली दीदी ही बचेंगी। बाकी सारे दुश्मन धराशायी होंगे।

ममता इस जुमले का उद्घोष इस अंदाज में कर रही हैं कि बंगाल की जनता ‘बाहरी बीजेपी’ को उसकी जगह दिखा देगी। जबकि बीजेपी को लग रहा है कि ‘असली खेला’ ममता और उनकी पार्टी के साथ होने वाला है। बंगाली मतदाता इस बार ‘पोरिबर्तन’ के पक्ष में वोट देगा, जो भाजपा के कंधों पर चलकर आने वाला है। उधर कांग्रेस और लेफ्ट का ‘खेला’ इतना ही है कि टीएमसी और बीजेपी जैसे सांडों की लड़ाई में बागड़ की खुरचन उनके हाथ भी लगे। लेकिन आठ चरणों में होने वाली इस चुनावी रामायण में जीत का ‘असली खेला’ वो ही कर पाएगा, जिसके घर के भीतर कोई ‘खेला’ न हो।(मध्‍यमत)
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