अजय बोकिल

अमेरिकी संसद ‘कैपिटल हिल’ परिसर के बाहर निवर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों की शर्मनाक हिंसा और लोकतंत्र पर हमले का भारत जैसे अपेक्षाकृत ‘युवा’ लोकतंत्र के लिए क्या सबक है? व्यक्तिनिष्ठ समर्थन को राजनीतिक उन्माद में बदलने का नतीजा क्या होता है? झूठ और अर्द्धसत्य का असली चेहरा कौन-सा है? और यह भी कि क्या अमेरिकी सभ्यता और संस्कृति का अब तेजी से पतन शुरू हो चुका है? ये तमाम सवाल दुनिया के हर उस देश के नागरिक के मन में घुमड़ रहे हैं, जहां लोकतंत्र है और जहां लोगों का मन लोकतां‍त्रिक मू्ल्यों का आग्रही है। जो लोकशक्ति को ही सर्वोपरि मानता है। अमेरिका में इसे ‘काला दिवस’ कहा जा रहा है। खुद अमेरिकी भी अपने समाज का यह चेहरा देखकर हतप्रभ हैं।

कैपिटल हिल की हिंसा के बाद आए तीन बयान महत्वपूर्ण हैं। पहला तो चुनाव में जीते अमेरिका के भावी राष्ट्रपति जो बाइडन का है, जो ने कहा कि यह केवल हिंसा, आक्रोश या विरोध प्रदर्शन नहीं है। यह तो अमेरिकी लोकतंत्र सीधा हमला है। दूसरा है अमेरिका में फ्लोरिडा के सांसद मार्क रुबियो का ट्वीट-“कैपिटल हिल पर जो हो रहा है, उसमें देशभक्ति जैसा कुछ भी नहीं है। यह तीसरी दुनिया की अमेरिका-विरोधी अराजकता है।” और तीसरा है भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की संयत ‍प्रतिक्रिया कि सत्ता का हस्तांतरण शांतिपूर्वक होना चाहिए। वहां हुए हिंसा और हंगामे पर पीएम नरेंद्र मोदी ने चिंता जताते हुए बिना नाम लिए ट्रंप को सलाह दी कि वे शांतिपूर्वक तरीके से सत्ता छोड़ दे और बाइडन के हाथों में उसे सौंप दें।

कैपिटल हिल की हिंसा इसलिए भी उद्वेलित करने वाली है कि यह उस अमेरिका में हुई है, जो स्वयं को लोकतंत्र, मानवता और लोकतांत्रिक मूल्यों का ठेकेदार समझता आया है। आदर्श लोकतंत्र कैसा हो, इसकी नसीहतें अमेरिकी लोग पूरी दुनिया को देते रहते हैं। लेकिन कैपिटल हिल की शर्मनाक घटना के बाद उन्होंने यह नैतिक अधिकार भी गंवा दिया है। यूं अमेरिकी समाज में मूल्यों की गिरावट तो काफी पहले शुरू हो चुकी थी, क्योंकि पूंजीवादी व्यवस्था के रसगुल्ले खाने के बाद अब उसे उसका धीमा जहर भी पीना पड़ रहा है।

इसके बाद भी यह माना जाता रहा है कि अमेरिकी लोकतंत्र अपने अडिग लोकतांत्रिक आग्रहों और मजबूत लोकतां‍त्रिक संस्थाओं के दम पर टिका है। बावजूद इसके कि कई बार वहां भी लोकतंत्र को चुनौती देने वाली घटनाएं होती रही हैं। फिर भी अमेरिकियों ने व्यक्ति की स्वतंत्रता और संस्थााओं की स्वायत्तता को गिरवी रखने नहीं दिया। लेकिन बुधवार की घटना ने इस गौरवपूर्ण विरासत पर ऐसा पानी फेरा है कि उससे उबरने में भी अमेरिका को बरसों लगेंगे।

डेमोक्रेटिक जो बाइडन के राष्ट्रपति निर्वाचित घोषित हो जाने के बाद भी निवर्तमान राष्ट्र‍पति डोनाल्ड ट्रंप के अंध समर्थकों का यही मानना रहा है कि वो चुनाव हारे नहीं हैं, उन्हें हरवाया गया है। लिहाजा लोकतंत्र को ठोकतंत्र की तरह ही चलाया जाना चाहिए। अपनी इस सोच का डेमो उन्होंने केपिटल हिल पर हमला करके दिया। दरसअल ये वो लोग हैं, जो उस झूठ में ही जीना चाहते हैं कि जो दिख रहा है, वह सांझ की लाली नहीं उषाकाल की लालिमा है।

चौतरफा आलोचना के बाद अब भी ट्रंप गद्दी भले छोड़ दें, अमेरिका को सीधे बांटकर वो अपने घर चले भी जाएं, लेकिन अमेरिकी समाज में विभाजन की जो विष बेल वो बो गए हैं, वह मरने वाली नहीं है। उलटे यह विष बेल अंधभक्ति के रूप में धीरे-धीरे उन सभी खंभों को खोखला कर देगी, जिस पर अमेरिकी समाज और संस्कृति अब तक इतराती आई है। खास बात यह है कि इस क्षुब्ध कारक घटना की आलोचना में किए गए ट्वीट और प्रतिक्रियाओं में भी एक घृणा का भाव बरकरार है।

फ्लोरिडा के सांसद मार्क रुबियो का यह कहना कि यह ‘तीसरी दुनिया’ की अमेरिका विरोधी अराजकता है’ बहुत मायने रखता है। इसमें निहित भाव यह है कि सत्तांतरण को लेकर ऐसी हिंसा अमूमन ‘तीसरी दुनिया’ के उन देशों में होती है, जो कम विकसित, गरीब और लोकतांत्रिक जीवन शैली से या तो महरूम हैं या फिर सामाजिक दृष्टि से ऊपर से नीचे तक विभाजित हैं, जिसमें भारत जैसे देश भी शामिल हैं।

अलबत्ता केपिटल हिल पर हमले के बाद हमें इतना तो मानना ही पड़ेगा कि भले ही हमारे यहां चुनावों में हिंसा होती हो, बहुत निचले स्तर पर जाकर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी एक दूसरे कोसते हों, मतदान के समय भी कई बार मारकाट होती हो, मतदान और मतगणना में धांधली के आरोप भी लगते हों, लेकिन अंतत: मिले जनादेश को हम विनम्रता से स्वीकार करते आए हैं। इस देश में विभाजन के वक्त भयंकर साम्प्रदायिक हिंसा हुई, फिर भी किसी ने उन्माद में संसद भवन पर हमला नहीं किया। और जब आतंकियों ने संसद पर हमला किया तो हम उससे निपटे भी।

क्यों‍कि चुनावी लोकतंत्र मान्य करने का ही अर्थ है कि जो भी जनादेश आएगा, वह स्वीकार्य होगा। फिर चाहे वह पक्ष में आए या विपक्ष में। क्योंकि लोकतंत्र में जनता ही सर्वो‍परि है। बड़े से बड़ा नेता भी जनादेश को शिरोधार्य करता है, क्योंकि उसे स्वीकार करना ही नेता के फिर चुनकर आने आ सकने की संभावनाओं को जिंदा रखता है। अगर हम फौजी तख्तापलट और रक्तरंजित क्रांतियों को अलग रखें तो तीसरी दुनिया के अधिकांश देश जनतांत्रिक संस्कारों में इतना तो ढल ही गए हैं कि भीतरी नाखुशी के बाद भी सत्ता का हस्तांतरण उन हाथों को कर दें, जिन्हें जनता ने वरण किया है।

यह संस्कार केवल व्यक्ति स्वातंत्र्य की पराकाष्ठा, तकनीकी प्रगति, संस्थाओं के मजबूत खंभों से ही नहीं आता बल्कि उस बुनियादी प्रतिबद्धता से भी आता है, जिसमें तमाम खामियों के बावजूद अपना सिर ऊंचा रखने का आग्रह कायम रहता है। तो क्या केपिटल हिल की घटना अमेरिकी सभ्यता के क्षरण का बड़ा लोकतांत्रिक अलार्म है? जनादेश पर लठैती से कब्जा करने की यह बहुत बड़ी लेकिन असफल कोशिश है? विश्व इतिहास को बारीकी से समझें तो हर देश में नैतिक, उदारवादी सांस्कृतिक मूल्यों की बुलंदी का समय अपेक्षाकृत बहुत थोड़ा होता है।

नापतौल की भाषा में कहें तो किसी भी देश या सभ्यता का स्वर्णकाल तोले में ही मापा जाता है, ज‍बकि अंधायुग टनों में तुल सकता है। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उच्चता के शिखरों को कब्जाने के बाद उतार का हिमयुग शुरू होता है। चार सौ साल पुरानी अमेरिकी सभ्यता के इतिहास में वो दौर शायद अब शुरू हो चुका है।

इसी संदर्भ में हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यह बयान कि सत्तांतरण शांतिपूर्वक ही होना चाहिए, इसलिए अहम है, क्योंकि मोदी पिछले साल अमेरिका यात्रा के दौरान वहां रहने वाले प्रवासी भारतीयों से ट्रंप को जिताने की खुली अपील कर आए थे। जिस ट्रंप को जिताने की वो अपील कर रहे थे, वो ट्रंप इतने सत्तालोलुप होंगे और उनके अंध समर्थक सत्ता के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों को भी लात मारने में नहीं हिचकेंगे, इसका अंदाजा मोदीजी को तब था या नहीं, कहना मुश्किल है।

बहरहाल मोदी ने परोक्ष रूप से अपने मित्र ट्रंप को जो सलाह दी, वह शुद्ध मन से ही दी होगी, ऐसा मान लेने में हर्ज नहीं है। यह सलाह किसी भी देश में किसी भी नेता के उन अंध समर्थकों के लिए नसीहत है, जो अपनी सोच और समझ को हर नैतिक, राजनैतिक और सामाजिक मूल्यों तथा हर लोकतां‍‍त्रिक मर्यादा से खुद को ऊपर मानने लगते हैं। यह वो मानसिकता है, जो मानती है कि राजा कभी गलत हो ही नहीं हो सकता। उसे चुनौती देने वाला ही गलत होगा।

नेता के प्रति अडिग आसक्ति होना बुरा नहीं है, लेकिन उसके लिए दिमाग के दरवाजों पर ताले डाल देना भी परले दर्जे की मूर्खता है। कैपिटल हिल की घटना का हमारे लिए यही सबक है कि हम हर मामले में अमेरिका अंधानुकरण न करें। अगर हमें कम्युनिस्ट चीन की तरह निरंकुश पूंजी प्रेरित तानाशाही नहीं चाहिए तो ट्रंप शैली की बेलगाम लोकशाही भी हमें नहीं चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो कहा, उसे न केवल ट्रंप बल्कि भारत में उन तत्वों को एक नसीहत के रूप में लेना चाहिए, जो भारतीय लोकतंत्र को ट्रंप शैली के निरंकुश लोकतंत्र में बदलने के हामी हैं।

यह बात अलग है कि भारत में अब तक होती आई सत्ता के लोकतां‍‍त्रिक और गरिमामय हस्तांतरण की परंपरा कितने दिन कायम रहेगी, यह कोई नहीं कह सकता। क्योंकि यहां भी लोकतांत्रिक आग्रहों पर निरंकुशता की परत चढ़ती जा रही है। उत्साह और उन्माद के बीच की सीमा रेखा भी धुंधलाती जा रही है। खुदा न खास्ता भारत में भी सत्ता परिवर्तन की ऐसी कोई स्थिति बनी तो हम क्या करेंगे?  इन नसीहतों का ध्यान रखेंगे या मनमर्जी को ही लोकतंत्र की ध्वजा मनवाना चाहेंगे? जरा सोचिए!