अजय बोकिल

पुस्तक ‘जो कहूंगा सच कहूंगा’ भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली (आईआईएमसी) के महानिदेशक, पत्रकार, शिक्षाविद प्रो. (डॉ.) संजय द्विवेदी के साक्षात्कारों का ऐसा संकलन है, जो उनकी ‘मन की बात’ का परत दर परत खुलासा करता है। यह मीडिया का एक मीडिया विशेषज्ञ के साथ सार्थक संवाद है। पुस्तक में शामिल ज्यादातर इंटरव्यू उनके आईआईएमसी महानिदेशक बनने पर लिए गए हैं। लेकिन प्रकारांतर से यह द्विवेदीजी की प्रोफेशनल यात्रा का दस्तावेज है।

संजयजी ने शिक्षा क्षेत्र में आने से पहले बाकायदा प्रोफेशनल पत्रकार के रूप में कई दैनिक अखबारों और कुछ टीवी चैनलों में काम किया। इस मायने में उनकी यह यात्रा व्यावहारिक पत्रकारिता से सैद्धांतिक पत्रकारिता की ओर है तथा यही इस यात्रा की प्रामाणिकता को सिद्ध करती है, क्योंकि अक्सर प‍त्रकारिता का अध्यापन करने वाले पर यह आरोप लगता है कि उन्हें व्यावहारिक पत्रकारिता का ज्यादा ज्ञान नहीं होता। जबकि पत्रकारिता एक व्यावहारिक अनुशासन ही है।

एक साक्षात्कार में स्वयं संजय द्विवेदी इसका खुलासा करते हैं- ‘मेरे पास यात्राएं हैं, कर्म हैं और उससे उपजी सफलताएं हैं। मैं खुद को आज भी मीडिया का विद्यार्थी ही मानता हूं। ‘दैनिक भास्कर’, ‘स्वदेश’, ‘नवभारत’, ‘हरिभूमि’ जैसे अखबारों से शुरू कर के ‘जी 24 छत्तीसगढ़’ चैनल, फिर कुशाभाऊ ठाकरे प‍त्रकारिता विवि, रायपुर में प‍त्रकारिता विभाग का संस्थापक अध्यक्ष, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि में दस साल प्रोफेसर, कुलपति व कुलसचिव जैसे दायित्वों का निर्वहन। बचपन में ‘बाल सुमन’ पत्रिका निकाली।’

खास बात यह है कि संजय द्विवेदी का यह यात्रा अनुभव सिद्ध होने के साथ निरंतर सक्रियता का संदेश भी देता है। इस पुस्तक में डॉ. द्विवेदी द्वारा विभिन्न माध्यमों को दिए गए 25 साक्षात्कार संकलित हैं और इनके‍ ‍शीर्षक अपने भीतर के कंटेट और उद्देश्य को स्वत: बयान करते हैं। मसलन ‘हर पत्रकार हरिश्चंद्र नहीं होता’, ‘सोशल मीडिया हैंडलिंग सीखने की जरूरत’, ‘मीडिया को मूल्यों की ओर लौटना होगा’, ‘जर्नलिस्ट और एक्टिविस्ट का अंतर समझिए’। इसी प्रकार ‘आईआईएमसी से निकलेंगे कम्युनिकेशन की दुनिया के ग्लोबल लीडर’, ‘एकता के सूत्रों को तलाश करने की जरूरत’ या फिर ‘सरस्वती के मंदिर में राजनीति के जूते उतार कर आइए’ तथा ‘बहती हुई नदी है हिंदी’ आदि। इस पुस्तक का संपादन पं. माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय संचार विवि के प्राध्यापकों डॉ. सौरभ मालवीय और लोकेन्द्र सिंह ने किया है।

बात जब साक्षात्कार की होती है, तो उसकी कसौटी होती है साक्षात्कार देने वाले की मुक्त मन से और खरी-खरी बात। एक सार्थक इंटरव्यू संबंधित व्यक्ति के समूचे व्यक्तित्व और उसकी सोच को खोल कर रख देता है। इस अर्थ में पुस्तक में शामिल सभी इंटरव्यू समकालीन पत्रकारिता से जुड़े तमाम सवालों और चुनौतियों का उत्तर तलाशने में मददगार लगते हैं। साथ ही संजय द्विवेदी की सोच, समझ, संकल्प और प्रतिबद्धता को भी प्रकट करते हैं। बकौल उनके-आज की पत्रकारिता दो आधारों पर खड़ी है, एक भाषा, दूसरा तकनीकी ज्ञान। तकनीक माध्यमों के अनुसार लगातार बदलती रहती है। लेकिन एक अच्छी भाषा में सही तरीके से कही गई बात का कोई विकल्प नहीं है।

भारतीय जन संचार संस्थान के स्थापना दिवस के उपलक्ष में दिए एक इंटरव्यू में समकालीन पत्रकारिता के सामने मौजूद चुनौतियों के बारे में द्विवेदी कहते हैं- ‘हमे सवाल खड़े करने वाला ही नहीं बनना है, इस देश के संकटों को हल करने वाला पत्रकार भी बनना है। मीडिया का उद्देश्य अंतत: लोकमंगल ही है। यही साहित्य व अन्य प्रदर्शनकारी कलाओं का उद्देश्य भी है। इसके साथ देश की समझ आवश्यक तत्व है। देश के इतिहास, भूगोल, संस्कृति, परंपरा, आर्थिक सामाजिक चिंताओं, संविधान की मूलभूत चिंताओं की गहरी समझ हमारी प‍त्रकारिता को प्रामाणिक बनाती है। समाजार्थिक न्याय से युक्त, न्यायपूर्ण समरस समाज हम सबका साझा स्वप्न है। पत्रकारिता अपने इस कठिन दायित्वबोध से अलग नहीं हो सकती। इसमें शक नहीं कि आज मीडिया एजेंडा केन्द्रित पत्रकारिता और वस्तुनिष्ठ और निरपेक्ष पत्रकारिता के बीच बंट गया है। यह स्थिति स्वयं मीडिया की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगाती है।’

वैचारिक आग्रह कुछ भी हों, लेकिन एक प्रोफेशनल और प्रामाणिक पत्रकार की बुनियादी प्रतिबद्धता तथ्य और सत्य के पक्ष में होती है तथा होनी भी चाहिए। संजय द्विवेदी एक इंटरव्यू में इसी बात को बहुत साफगोई के साथ कहते हैं- ‘पत्रकार का तथ्यपरक होना जरूरी है। सत्य का साथ पत्रकार नहीं देगा तो कौन देगा। समस्या यह है कि आज जर्नलिस्ट के साथ तमाम एक्टिविस्ट भी पत्रकारिता में चले आए हैं। जर्नलिज्म और एक्टिविज्म दो अलग अलग चीजे हैं। जर्नलिज्म का रिश्ता फैक्ट फाइंडिंग से हैं। एक्टिविस्ट का काम किसी विचार या विचारधारा के लिए लोगों को मोबिलाइज करना और सरकार पर दबाव बनाना है। जर्नलिस्ट का यह काम नहीं है। उसका काम है तथ्य और सत्य के आधार पर चीजों  का विश्लेषण करना। सोशल मीडिया के आने से अराजकता पैदा हो रही है और तथ्‍यों के साथ खिलवाड़ हो रहा है। पत्रकारिता को ऑब्जेक्टिव होने की जरूरत है।’

आज पत्रकारिता की साख पहले जैसी नहीं रह गई है, उसका मुख्य कारण है खबरों में ‍मिलावट। संजय द्विवेदी इसके खिलाफ बहुत साफ तौर पर बात करते हैं। वो कहते हैं- ‘आज सबसे बड़ी चुनौती खबरों में मिलावट की है। खबरें परिशुद्धता के साथ कैसे प्रस्तुत हों, कैसे लिखी जाएं, बिना झुकाव, बिना आग्रह कैसे वो सत्य को अपने पाठकों तक सम्प्रेषित करें। प्रभाष जोशी कहते थे कि ‍पत्रकार की पॉलिटिकल लाइन तो हो, लेकिन पार्टी लाइन न हो।’

एक शिक्षाविद होने के नाते डॉ. द्विवेदी नई शिक्षा नीति की खूबियों और चुनौतियों को व्याख्यायित करते हैं। कुछ लोगों के मन में नई शिक्षा नीति को लेकर सवाल भी हैं, लेकिन संजय द्विवेदी एक साक्षात्कार में कहते हैं- ‘नई शिक्षा नीति बहुत सुविचारित और सुचिंतित तरीके से प्रकाश में आई है। इसे जमीन पर उतारना कठिन काम है, इसलिए शि‍क्षाविदों, शिक्षा से जुड़े अधिकारियो और संचारकों की भूमिका बहुत बढ़ गई है। लेकिन इस कठिन दायित्व बोध ने हम सबमें ऊर्जा का संचार भी किया है।’

पत्रकारिता के बदले परिदृश्य और भावी चुनौतियों को लेकर डॉ. संजय द्विवेदी का नजरिया बहुत साफ है। आज मल्टीमीडिया का जमाना है। इसलिए पत्रकार को अपनी बात भी कई माध्यमों से कहना जरूरी हो गया है, क्योंकि पाठक या श्रोता के भी अब कई स्तर और प्रकार हो गए हैं। संजयजी इसे कन्वर्जेंस का समय मानते हैं। अपने एक साक्षात्कार में वो कहते हैं- ‘अब जो समय है कन्वर्जेंस का है। एक माध्यम पर रहने से काम नहीं चलेगा। अलग-अलग माध्यमों को एक साथ साधने का समय आ गया है। जो व्यक्ति प्रिंट पर है, उसे वेब पर भी होना है। मोबाइल एप पर भी होना है। टेलीविजन पर भी होना है। आज वही मीडिया संस्थान ठीक से काम कर रहे हैं, जो एक साथ अनेक माध्यमों पर काम कर रहे है।’

अध्यापन के साथ साथ डॉ. द्विवेदी विभिन्न और सोद्देश्य पत्रिकाओं का नियमित संपादन भी करते हैं। यह उनकी अखूट ऊर्जा और सक्रियता का परिचायक है। ऐसा ही एक प्रकाशन है ‘मीडिया विमर्श।’ यह त्रैमासिक पत्रिका अपने आप में अनूठी है। संजय द्विवेदी कहते हैं- जहां तक ‘मीडिया‍ विमर्श’ की बात है, मेरे मन में यह था कि मीडिया पर हम लोग बहुत बातचीत करते हैं, पर कोई ऐसी पत्रिका नहीं है, जो मीडिया और उसके सवालों के बारे में बातचीत करे, तो मीडिया विमर्श नाम की एक पत्रिका का प्रकाशन हमने 14 साल पहले रायपुर से शुरू किया। यह त्रैमासिक पत्रिका है और एक विषय पर पूरा संवाद रहता है। भाषाई पत्रकारिता पर हमने कई अंक निकाले। उर्दू, गुजराती, तेलुगू, मलयालम आदि।’

संजय द्विवेदी मूलत: उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से हैं। उनके पिता भी हिंदी के प्राध्यापक थे और घर में शुरू से ही साहित्यिक माहौल था। लिहाजा हिंदी से उनका प्रेम स्वाभाविक है। आईआईएमसी जैसे संस्थान में भी वो हिंदी का झंडा बुलंद करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। एक साक्षात्कार में वो कहते हैं- ‘हिंदी का पाठ्यक्रम मूल हिंदी में ही तैयार होगा। आजकल नई हिंदी आई है। बोलचाल की हिंदी। भाषा को जीवन के साथ रहने दीजिए, उसे पुस्तकालयों में मत ले जाइये। हिंदी जैसी उदार भाषा कोई नहीं है। हिंदी को शास्त्रीय बनाने के प्रयासों से हमे बचना चाहिए। हिंदी एक बहती हुई नदी है। इसका जितना प्रवाह होगा, वह उतनी ही बहती जाएगी।’                                                                                                                     द्विवेदी अब तक दो दर्जन से ज्यादा पुस्तकें लिख चुके हैं या उन्हें संपादित कर चुके हैं। इनमें राजनीतिक विश्लेषण भी हैं। आपने अपराध पत्रकारिता पर भी डॉ. वर्तिका नंदा के साथ मिलकर एक पुस्तक का संपादन किया है। पत्रकार और पत्रकारिता शिक्षक के रूप में उनकी यह यात्रा अनवरत है। दरअसल पत्रकार होना अपने समय से भिड़ना भी है। यह भिड़ंत साहित्य की तुलना में ज्यादा जोखिम भरी भी है। इसीलिए पत्रकारिता का असर बहुत व्यापक पैमाने पर देखने को मिलता है।

महान लेखक ऑस्कर वाइल्ड ने कहा था- ‘अमेरिका में एक राष्ट्रपति तो चार साल साल के लिए ही शासन करता है, लेकिन पत्रकारिता तो हमेशा-हमेशा के लिए शासन करती है।’ प्रस्तुत ‍पुस्तक ‘जो कहूंगा सच कहूंगा’ की प्रासंगिकता इसी में है कि यह पत्रकार और पत्रकारिता से जुड़ी शंकाओं और सवालों का जवाब देने की पूरी कोशिश करती है।