टुकडे टुकडे पाकिस्तान-2

प्रशांत पोळ

पाकिस्तान का, अफगानिस्तान से सटा हुआ राज्य, जिसे आज ‘खैबर पख्तूनख्वा’ कहा जाता है, पाकिस्तान की झोली में आया, नेहरू के कारण। यह राज्य, पाकिस्तान की किस्मत का तारा हैं, जिसके कारण अमरीका ने अफगानिस्तान के रुसी सैनिकों से लोहा लेने के लिए, पाकिस्तान पर पैसों की बारिश की थी।

तब इसका आधिकारिक नाम ‘खैबर पख्तूनख्वा’ नहीं था। यह North West Frontier Province के नाम से जाना जाता था। पश्तूनों या पठानों का यह प्रदेश, तब भी मुस्लिम बहुल था। पश्तूनी या ‘हिंदको’ भाषा यहां चलती थी। हमारे चर्चित फ़िल्मी चेहरे, प्राण, राजकपूर, देवानंद आदि उन दिनों ‘हिंदको’ भाषा जानते थे, बोलते थे। पेशावर इस राज्य का बड़ा केंद्र था। व्यापार का, शिक्षा का और कुछ हद तक सांस्कृतिक गतिविधियों का भी।

इस पूरे क्षेत्र के सर्वमान्य नेता थे, खान अब्दुल गफ्फार खान। एक भारीभरकम नाम और ठीक वैसा ही भारीभरकम उनका व्यक्तित्व। पश्तूनी या पठानी लोग उन्हें ‘बादशाह खान’ नाम से पुकारते थे। उनके समर्थकों को ‘खुदाई खिदमतगार’ कहा जाता था। भारत इन्हें सीमांत गांधी के नाम से जानता था। वे थे ही गांधीजी के अनन्य असाधारण भक्त। पूर्णतः गांधीवादी जीवन जीनेवाले। और तो और, उन्होंने औसत छह/सात फीट ऊँचे, खूंखार माने जाने वाले पठानों को भी गांधीजी की शरण में लाने का जादू कर दिखाया था। लगभग सारे पठानों को उनका नेतृत्व मान्य था।

इसीलिए, अंग्रेजों ने जब 1945/46 में राज्यों के चुनाव कराए, तब नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ। यह एक आश्चर्य था। कारण 1946 तक, लगभग देश के विभाजन का स्वरूप स्पष्ट हो चुका था। जिन राज्यों में मुसलमानों का बहुमत है, वहां पर मुस्लिम लीग और जहां हिन्दुओं का बहुमत हैं, वहां कांग्रेस के हाथों में सत्ता आयी थी। ऐसे में मुस्लिम बहुल नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में कुल 50 सीटों में से 30 स्थानों पर कांग्रेस का जीतना एक आश्चर्य ही था। यह कर दिखाया था, बादशाह खान, अर्थात सीमांत गांधी ने और उनके खुदाई खिदमतगारों ने।

अब जबकि यह स्पष्ट हो गया कि भारत का विभाजन होने वाला है, तब पठानों के सामने सवाल खड़ा हुआ कि, वे किस तरफ जाएं? पठानों का और पाकिस्तान के पंजाबियों का आपस में बैर बहुत पुराना था। इस कारण इस प्रांत के सभी पठानों की इच्छा थी कि वे भारत में विलीन हों। प्रांतीय असेम्बली में बहुमत भी इसी पक्ष में था। केवल भौगोलिक निकटता का ही सवाल था, परन्तु तर्क यह दिया गया कि पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच भी तो हजारों मील की दूरी है। दूसरी बात यह भी थी कि यदि कश्मीर की रियासत भारत के साथ मिल जाती है, तो ये प्रश्न भी हल हो जाएगा, क्योंकि गिलगिट के दक्षिण वाला इलाका, नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर से सटा हुआ ही है।

परन्तु इस सबके बीच नेहरू ने अड़ंगा लगा दिया। उनका कहना था कि ‘हमें वहां सार्वमत (रेफरेंडम) से फैसला करना चाहिए’। कांग्रेस की कार्यकारिणी में भी यह मुद्दा गरमाया और सरदार पटेल ने इस कथित सार्वमत का जमकर विरोध किया। सरदार पटेल का कहना था कि ‘प्रान्तीय विधानसभाएं यह तय करेंगी कि उन्हें किस देश में शामिल होना है। देश के अन्य भागों में भी हमने यही किया है। इसीलिए जहां-जहां मुस्लिम लीग का बहुमत है, वे सभी प्रांत पाकिस्तान में शामिल होने जा रहे हैं। और जहां-जहां कांग्रेस का बहुमत हैं, वे राज्य भारत में मिल रहे हैं। इसी न्याय के आधार पर नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर राज्य को भारत में विलीन होना ही चाहिए, क्योंकि वहां कांग्रेस का बहुमत हैं’। परन्तु नेहरू अपनी बात पर अड़े रहे। नेहरू ने कहा कि ‘मैं लोकतंत्रवादी हूं। इसलिए वहां के निवासियों को जो लगता है, उन्हें वैसा निर्णय लेने की छूट मिलनी चाहिए’।

बादशाह खान को अखबारों के माध्यम से ही यह पता चला कि उनके प्रान्त में सार्वमत का निर्णय किया गया है। जिस व्यक्ति ने इस बेहद कठिन माहौल और मुस्लिम बहुल इलाका होने के बावजूद, पूरा प्रदेश कांग्रेसी बना डाला था, उन्हें नेहरू ने ऐसे अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर चर्चा करने लायक भी नहीं समझा। इसीलिए यह समाचार मिलते ही खान अब्दुल गफ्फार खान ने दुखी स्वर में कहा कि, “कांग्रेस ने यह प्रांत थाली में सजाकर मुस्लिम लीग को दे दिया है…!”

इस प्रांत में जनमत (सर्वमत– रेफेरेंडम) की प्रक्रिया 2 जुलाई 1947 से आरम्भ हुई। मतदान 6 जुलाई को प्रारंभ हुआ। जो लगभग दस दिनों तक चला। सार्वमत से पहले और सार्वमत जारी रहने के दौरान, मुस्लिम लीग ने बड़े पैमाने पर धार्मिक भावनाओं को भड़काया। यह देखकर कांग्रेस ने इस सार्वमत का बहिष्कार कर दिया। इधर जब बादशाह खान को पता चला की इस सार्वमत में पख्तूनिस्तान के अलग देश का पर्याय ही नहीं हैं, तो उन्होंने भी सार्वमत का बहिष्कार किया। उनके लिए भारत में जाना यही पहला विकल्प था। उस विकल्प के ना रहने पर वे स्वतंत्र पख्तूनिस्तान चाहते थे। लेकिन यह विकल्प तो अंग्रेज सरकार ने रखा ही नहीं। खुदाई-खिदमतगार पार्टी के बादशाह खान इस बात की चिंता कर रहे थे कि ‘नेहरू की गलतियों की हमें कितनी और कैसी सजा भुगतनी पड़ेगी।’

यह मतदान केवल और केवल एक धोखा भर था। जिन छह आदिवासी जमातों पर खान अब्दुल गफ्फार खान का गहरा प्रभाव था, उन्हें मतदान में भाग लेने से रोक दिया गया। पैंतीस लाख जनता में से केवल पांच लाख बहत्तर हजार लोगों को ही मतदान करने लायक समझा गया। सवत, दीर, अम्ब और चित्राल इन तहसीलों में मतदान हुआ ही नहीं।

जितने पात्र मतदाता थे, उनमें से केवल 51 फीसदी मतदान हुआ। पाकिस्तान में विलीन होने का समर्थन करने वालों के लिए हरे डिब्बे रखे गए थे, जबकि भारत में विलीन होने वालों के मतदान हेतु लाल डिब्बे थे। पाकिस्तान की मतपेटी में 289244 वोट पड़े और कांग्रेस के बहिष्कार के बावजूद भारत में विलीनीकरण के पक्ष में 2874 वोट पड़े। अर्थात, पैंतीस लाख लोगों में से केवल तीन लाख के आसपास वोट पाकिस्तान के पक्ष में पड़े थे।

बादशाह खान के मन में इसी बात को लेकर नाराजी थी। ‘नेहरू और गांधीजी ने हम लोगों को लावारिस छोड़ दिया। और वह भी इन पाकिस्तानी भेड़ियों के सामने…’ ऐसी भावना लगातार उनके मन में घर कर रही थी।

(अफगानिस्तान के विषय पर निरंतर लेखन करने वाली लेखिका प्रतिभा रानडे का एक लेख ‘अंतर्नाद’ के 2018 के दीपावली अंक में है– ‘आक्रोश का अवकाश’। इस लेख में उन्होंने अस्सी के दशक में (जब वे अफगानिस्तान में थीं), बादशाह खान उनके घर पर आए थे, उस घटना का विवरण लिखा है। इस भेंट में खान साहब ने प्रतिभा रानडे से कहा था, “वास्तव में हमें तो हिन्दुस्तान में ही रहना था…गांधीजी ने वैसा वचन भी दिया, परन्तु बाद में उन्होंने हमारे साथ विश्वासघात कर दिया। गांधी-नेहरू ने स्वतंत्रता तो हासिल कर ली, परन्तु हम लोगों को कुत्तों के (पाकिस्तान) सामने फेंक दिया। यह दुःख मैं कभी नहीं भूल सकता। गांधी-नेहरू ने हमें धोखा दिया।”)

इसीलिए पेशावर, कोहट, बानू, स्वात इलाकों से उनके कार्यकर्ता उनसे पूछ रहे थे कि ‘क्या हमें भारत में विस्थापित हो जाना चाहिए’? तब सीमान्त गांधी के पास इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था। वे क्या जवाब दें यह समझ नहीं पा रहे थे…! इसीलिए, बटवारे के कुछ दिनों तक इस नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में विस्थापितों का बड़ा विचित्र दृश्य दिख रहा था। इस प्रान्त के मुसलमान, शरणार्थी बनकर खंडित भारत की ओर जा रहे थे। उनकी संख्या कम थी। किन्तु शुरुआती दिनों में विस्थापन का यह उलटा क्रम तेज था। इस प्रान्त में खंडित भारत से आनेवाले मुस्लिम विस्थापितों की संख्या नगण्य थी।

पाकिस्तान को यह राज्य, मुस्लिम लीग का बहुमत ना होते हुए भी किस्मत से मिल गया। रणनीतिक और सामरिक रूप से यह प्रान्त अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसकी सीमाएं अफगानिस्तान, गिलगिट, पंजाब, कश्मीर आदि प्रान्तों से मिलती हैं। आज तक हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने आए सारे आक्रांता इसी प्रान्त से चलकर आए थे। हिन्दुकुश पर्वत इस प्रान्त को और अफगानिस्तान को जोड़ता हैं। उसमें ‘खैबर के दर्रे’ के नाम से प्रसिध्द जो घाटी हैं, उसे लांघकर आक्रमणकर्ता भारत में आते थे।

ऐसा प्रदेश पाकिस्तान को मिलना यह उसकी किस्मत ही थी। लेकिन पाकिस्तान ने इस प्रदेश को अपनाने के कुछ ख़ास प्रयास नहीं किये। बादशाह खान को पाकिस्तान की सरकार ने अनेक बार जेल में बंद रखा। उनकी मृत्यु के समय भी वे नजरबन्द थे। 98 वर्ष की आयु में, पाकिस्तान की सरकार ने सन 1988 में उन्हें घुट-घुट कर मरने के लिए मजबूर किया..!

इस नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस का ‘खैबर पख्तूनख्वा’ कैसे हुआ और कब हुआ यह इस शृंखला की अगली कड़ी में…