अरुण पटेल

मध्यप्रदेश में एक लोकसभा और तीन विधानसभा क्षेत्रों के उप चुनाव में सबकी सुनने के बाद मतदाताओं ने अपना फैसला इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में बंद कर दिया है तथा 2 नवंबर को जो जनादेश निकलेगा वह प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस की राजनीतिक दिशा और दशा को रेखांकित करने की दृष्टि से अत्यंत ही महत्वपूर्ण होगा। इससे पता चलेगा कि मतदाताओं ने किसके वायदों और इरादों पर अपने विश्वास की मोहर लगाई है। इन नतीजों से यह भी पता चल सकेगा कि राज्य के दो प्रमुख राजनीतिक दलों भाजपा और कांग्रेस में से किसके असंतुष्ट महाबली साबित हुए।

जिस दल के उम्मीदवार विधानसभा और लोकसभा में पहुंचेंगे उसकी तुलना में हारने वाले उम्मीदवार के दल के असंतुष्ट अधिक बलवान साबित हो जाएंगे। भले ही कोई कितना ही दावा क्यों न करे लेकिन यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है कि भाजपा और कांग्रेस में कहीं ना कहीं किसी न किसी स्तर पर असंतोष व्याप्त है और चुनाव नतीजों के बाद असंतुष्ट नेताओं को नए सिरे से अपनी राजनीतिक विसात बिछानी होगी। उनकी आगे की रणनीति क्या होगी यह भी बहुत कुछ चुनाव नतीजों पर ही निर्भर करेगा।

जहां तक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का सवाल है तो उनके खाते में सबसे ज्यादा चुनाव पार्टी को जिताने का रिकार्ड दर्ज है। वहीं दूसरी ओर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व का सवाल है तो उनके ही नेतृत्व में डेढ़ दशक की भाजपा सरकार को उखाड़ कर कांग्रेस सरकार बनाने का रिकॉर्ड दर्ज हो चुका है। डेढ़ दशक के बाद डेढ़ साल तक ही कमलनाथ सरकार चल पाई और दलबदल के कारण गिर गई और फिर से शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी।

ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में चले जाने और केंद्रीय मंत्री बनने के बाद अब प्रदेश में कांग्रेस के बड़े नेताओं में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह हैं तथा प्रदेश की कांग्रेस की राजनीति पर अब इन दोनों की मजबूत पकड़ है। अन्य नेता जिनमें पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी, पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव तथा पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह आदि शामिल हैं फिलहाल  हाशिए पर नजर आ रहे हैं ।

लोकसभा उप चुनाव में क्या दिखेगा असर
राज्य में लोकसभा का उप चुनाव खंडवा सीट पर हो रहा है। भाजपा सांसद नंदकुमार चौहान के निधन के कारण इस सीट पर उपचुनाव हो रहा है। अरुण यादव इसी सीट से चुनाव लड़ते रहे हैं लेकिन उनके खाते में जीत से ज्यादा हार दर्ज हैं। अरुण यादव प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में दिग्विजय सिंह और कमलनाथ के विरोधी माने जाते रहे हैं परंतु बीते कुछ माह में उनके रिश्ते दिग्विजय सिंह से मधुर हो गए हैं और दिग्विजय यह कह चुके थे कि अरुण यादव ही सबसे उपयुक्त उम्मीदवार हैं लेकिन बाद में यादव ने पारिवारिक कारणों से चुनाव मैदान से हटना बेहतर समझा क्योंकि उन्हें और उनके समर्थकों को इस बात का भरोसा था कि असंतुष्ट कुछ गुल खिला सकते हैं।

कांग्रेस ने इस सीट पर क्षेत्र के पुराने नेता राजनारायण सिंह पूनिया को मैदान में उतारा है जो दिग्विजय सिंह के समर्थक हैं। चुनाव संचालक अरुण यादव ही हैं। चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में पहुंचते ही कांग्रेस विधायक सचिन बिडला पार्टी से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए। बिडला गुर्जर समुदाय के हैं। नतीजा यह हुआ है कि कांग्रेस चुनाव मैदान में मनोवैज्ञानिक तौर पर कमजोर दिखाई देने लगी। पार्टी ने क्षेत्र के गुर्जर वोटरों को साधने के लिए सचिन पायलट की सभा भी प्रचार के आखिरी दिन कराई। क्षत्रिय वोटरों को बांधे रखने के लिए दिग्विजय सिंह को मैदान संभालना पड़ा। चुनाव नतीजे से पता चलेगा कि कांग्रेस विधायक के दलबदल का चुनाव परिणाम पर क्या असर पड़ा।

राजी-नाराजी का प्रबंधन कितना असरकारक रहा इसका पता भी नतीजों से ही चलेगा। यह दावा भाजपा का कोई भी नेता करने की स्थिति में नहीं था कि भितरघात उनकी पार्टी में नहीं हो रहा। भाजपा ने ज्ञानेश्वर पाटिल को मैदान में उतारा है। वे ओबीसी से हैं। क्षेत्र भी ओबीसी बाहुल्य है। इस सीट पर मजबूत दावेदारी स्वर्गीय नंदकुमार चौहान के पुत्र हर्ष सिंह चौहान की थी। शिवराज सिंह चौहान भी अपने मित्र के पुत्र के ही पक्ष में थे लेकिन परिवारवाद के आधार पर टिकट न देने की पार्टी की नीति आडे आ गई। हर्ष चौहान का रूठना और पार्टी नेताओं का मानना रस्मी दिखाई दिया। दूसरी मजबूत दावेदार पूर्व मंत्री अर्चना चिटनीस ने भी अपनी सुविधा के अनुसार प्रचार किया।

भाजपा को अपनी सीट को बचाए रखने के लिए पूरा दम लगाना पड़ रहा है जिसका कारण क्षेत्र के आदिवासी वोटर हैं। इन वोटों के लिए ही घर-घर अनाज की योजना शुरू की गई। देखने वाली बात यही होगी कि उप चुनाव के परिणामों पर इसका क्या असर हुआ। आदिवासी वोटर का झुकाव धीरे-धीरे कांग्रेस की ओर हुआ है और उस वोट बैंक में शिवराज की ताबड़तोड़ घोषणाओं की झड़ी कितनी सफल हुई या आदिवासी वोट बैंक में सेंध लगाने में मददगार साबित हुई यह भी परिणाम से पता चलेगा। पूरे प्रदेश में अनेक क्षेत्रों में आदिवासी मतदाता निर्णायक भूमिका में रहता है और उसके रुख में कुछ बदलाव आया या नहीं यह भी देखने वाली बात होगी।

इन उपचुनावों में यदि कांग्रेस को अपेक्षा के अनुसार सफलता नहीं मिलती और वह अपनी जीती हुई सीटों कब्जा बनाए रखने में सफल नहीं होती है तो मौजूदा कांग्रेस नेतृत्व के विरुद्ध अरुण यादव सक्रिय हो सकते हैं और उन्हें अजय सिंह के समर्थन मिलने की संभावना को भी नहीं नकारा जा सकता है ।

विंध्य प्रदेश में अपने पैर जमा पाएगी कांग्रेस?
पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह के प्रभाव वाले विंध्य अंचल में 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को अत्यधिक निराशा हाथ लगी थी और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ की यह टीस रह-रह कर सामने आती रही है कि यदि इस अंचल ने कांग्रेस का साथ दिया होता तो फिर दलबदल से उनकी सरकार को गिरा पाना संभव नहीं होता। इसलिए रैगांव विधानसभा सीट का उपचुनाव भी कांग्रेस के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

विधानसभा के आमचुनाव में विंध्य क्षेत्र में कांग्रेस की बुरी तरह से  दुर्गति हुई थी। अजय सिंह खुद भी चुनाव हार गए थे। इससे पार्टी में उनकी राजनीतिक हैसियत भी प्रभावित हुए बिना नहीं रही। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित रैगांव विधानसभा क्षेत्र सतना जिले में है।

यह भाजपा की मजबूत पकड़ की सीट मानी जाती रही है और कांग्रेस यहां पर बसपा के कारण अक्सर चुनाव हारती रही है। उप चुनाव में बसपा उम्मीदवार के न होने से भाजपा-कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला हो गया। सतना शहर से विधानसभा सीट की सीमाएं लगे होने के बाद भी यहां पर मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। इस कारण हवा में परिवर्तन की बात भी तैर रही है।

बागरी परिवार के असंतोष ने भी कांग्रेसियों में उम्मीद का दिया जला दिया है। जुगल किशोर बागरी इस क्षेत्र के विधायक थे। उनका निधन कोरोना में हो गया। भाजपा ने उनके परिवार के किसी सदस्य को टिकट नहीं दिया। उम्मीदवार बनाई गईं प्रतिभा बागरी नजदीकी रिश्तेदार हैं। कांग्रेस की उम्मीदवार कल्पना वर्मा हैं।

गैरों पर भरोसा क्या गुल खिलाएगा?
भाजपा का संगठन देश में सबसे मजबूत और आदर्श संगठन माना जाता है। लेकिन तीन में से दो विधानसभा क्षेत्रों में उसे अपने उम्मीदवार अन्य दलों से आए चेहरों को बनाना पड़ा है। निवाड़ी जिले की पृथ्वीपुर विधानसभा सीट पर भाजपा ने शिशुपाल यादव को मैदान में उतारा है। आम चुनाव में वे समाजवादी पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़े व दूसरे नंबर पर रहे थे।  भाजपा के लिए यह सीट हमेशा मुश्किल भरी रही है। कांग्रेस के बृजेंद्र सिंह राठौर के निधन के कारण यहां चुनाव हो रहा है। कांग्रेस उम्मीदवार नितेन्द्र सिंह राठौर उनके पुत्र हैं इस कारण कहीं-कहीं सहानुभूति भी देखी जा रही है।

पृथ्वीपुर की तरह जोबट में भी भाजपा उम्मीदवार अन्य दल से लाया हुआ है। सुलोचना रावत कांग्रेस की पुरानी नेता हैं और अब भाजपा रावत के अपने जनाधार को अपनी बड़ी उपलब्धि मान रही है। जोबट आदिवासियों के लिए सुरक्षित सीट हैं। कांग्रेस अपनी इस सीट को बचाने के लिए सभी समीकरण बैठाने की कोशिश कर रही है। कांतिलाल भूरिया के लिए भी यह सीट महत्वपूर्ण हैं।

और यह भी…
चारों उपचुनाव बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं क्योंकि यहां पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। राज्य के सभी अंचलों की राजनीतिक फिजा का पता चुनाव नतीजों से चलेगा क्योंकि राज्य के अलग-अलग अंचलों में यह चुनाव हो रहे हैं। खंडवा चुनाव निमाड़ तथा मालवा अंचल में, जोबट मध्य भारत अंचल और पृथ्वीपुर बुंदेलखंड तथा विंध्य अंचल में हैं।

यह नतीजे जहां एक और कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के प्रभाव पर असर डालने वाले हैं तो वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी की सरकार और शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता भी  देखने को मिल सकती है।(मध्यमत)
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