अजय बोकिल

बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने आत्महत्या की थी या उनकी हत्या हुई, इस बारे में संदेह के बादल सीबीआई जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही छंटेंगे। यह भी तभी तय होगा कि इस हाई प्रोफाइल मामले में पीडि़त परिवार को न्याय मिला या नहीं और जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा ‍कि सीबीआई जांच के बाद ही दिवंगत सुशांत सिंह की आत्मा चैन से सो सकेगी या नहीं। लेकिन हमारे राजनेताओं ने अदालत द्वारा जांच एजेंसी तय करने के फैसले को ही ‘न्याय की जीत’ बताना शुरू कर दिया है। अलबत्ता इतना तय है कि सुशांत मामले में ‘न्याय की जीत’ हो न हो, राजनीति जरूर जीत गई है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से एक पक्ष बल्लियों उछल रहा है तो दूसरा पक्ष आत्मरक्षा की मुद्रा में है। यह बॉलीवुड का शायद ऐसा पहला मामला है, जिसके तार कई पॉइंट से जुड़ रहे हैं। इसमें सियासत तो है ही, फिल्म जगत की बेनकाब हो रही अंधेरी तस्वीर भी है। इसमें पैसे का खेल है, तो खुला भाई-भतीजावाद भी है। इसमें जायज-नाजायज रिश्तों की छुपी कहानियां हैं, तो समाज के नैतिक पतन की क्षुब्धकारक दास्तान भी है। इस हमाम में शायद ही किसी के शरीर पर कपड़ा बचा हो।

इन सबसे ऊपर वो सियासी दावंपेंच हैं, जो सुशांत की संदिग्ध मौत को लेकर खेले जा रहे हैं। इस माया जाल में मीडिया की भूमिका भी हु्क्म बजाने वाले जिन्न की माफिक है। टीवी चैनल सुशांत की मौत पर टीआरपी भी बटोर रहे हैं तो अदृश्‍य आका को भी खुश कर रहे हैं। हमें यह समझाने की जी तोड़ कोशिश हुई कि सुशांत को मारा गया है। हत्यारा कौन हो सकता है, इसके इशारे बार-बार किए गए।

गहराई से समझें तो सुशांत की मौत पर एक छाया युद्ध पिछले दो माह से टीवी चैनलों पर लड़ा जा रहा है। जिसका एक मकसद महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार को कठघरे में खड़ा करना है, तो दूसरा टारगेट भाजपा के लिए सत्ता का पिज्जा बेस तैयार करना भी है। क्योंकि कथित अन्याय केवल सुशांत के साथ ही नहीं हुआ है बल्कि, महाराष्ट्र में एनडीए में हिस्सेदार रही शिवसेना द्वारा कुर्सी के लिए दुश्मनों की गोद में जा बैठने के कारण विपक्ष में बैठी भाजपा के साथ भी हुआ है।

यह बात अलग है कि उद्धव ठाकरे सरकार ने बीते 10 माह में कोई तमगे लायक काम शायद ही किया हो। उसकी उपलब्धि यही है कि वह सह्याद्रि की तरह डटी है और शरद पवार का सुरक्षा चक्र उसे बचाए हुए है। इस मामले में कई राजनेताओं का हर्षवात हैरान करने वाला है। मसलन भाजपा प्रवक्ता डॉ. संबित पात्रा ने #महाराष्ट्रसरकाररोरिया_है’ से ट्वीट किया- ‘पहले महाराष्ट्र सरकार सो ‘रिया’ था, फिर संजय राउत सुशांत परिवार को धो ‘रिया’ था, अब मुंबई में सरकार रो ‘रिया’ है, दोस्तों जल्दी ही सुनेंगे महाराष्ट्र सरकार जा ‘रिया’ है।’ यहां ‘रिया’ से इशारा‍ किसकी ओर है, साफ समझा जा सकता है।

महाराष्ट्र में भाजपा विधायक नितेश राणे ने ट्वीट किया ‘अब तो बेबी पेंग्विन गयो।’ यहां ‘बेबी’ से आशय शिवसेना से जुड़े महाराष्ट्र के शीर्षस्थ नेता के उस मंत्री पुत्र से है, जिसका दखल सरकार में काफी ज्यादा है। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने इस फैसले के बाद ठाकरे सरकार को आत्मचिंतन की सलाह दी। जबकि केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कोर्ट के आदेश को ही ‘न्याय की जीत’ बता दिया। इसलिए क्योंकि अब सुशांत की मौत की ‘निष्पक्ष’ जांच होगी और उनके परिवार को इंसाफ मिलेगा।

चौंकाने वाला एक ट्वीट राकांपा नेता और उद्धव सरकार के बैक सीट ड्राइवर शरद पवार के पोते पार्थ पवार का था। पार्थ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कहा ‘सत्यमेव जयते।‘ इसका निश्चित तौर पर क्या मतलब है, समझना कठिन है, लेकिन ये वही पार्थ हैं, जिनके द्वारा सीबीआई जांच के पक्ष में पूर्व में दिए बयान को दादा शरद पवार ने ‘बचपना’ बताया था। शरद पवार और उद्धव ठाकरे सुशांत मामले की जांच मुंबई पुलिस से करवाने के पक्षधर रहे हैं।

उधर शिवसेना के संजय राउत ने बिहार पुलिस के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे पर यह आरोप तक लगा दिए थे कि उनको चुनाव में भाजपा का टिकट लेना है। उन्होंने सुशांत के पिता की दो शादी का मुद्दा भी उछाला। वैसे पांडेजी ने भी अपने बयानों से यह संकेत देने में कोताही नहीं कि उनकी मंशाएं क्या हैं।

पर इतना जरूर है कि 14 जून को सुशांत राजपूत की संदिग्ध मौत के बाद मुंबई पुलिस ने जिस सुस्ती से काम किया, उससे उन लोगों के मन में भी संदेह पैदा होने लगा, जिनका सुशांत से कोई लेना देना नहीं था। इसी का नतीजा था कि सुशांत के परिजनों ने इस मामले में बिहार में पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाकर मामले की जांच बिहार पुलिस या सीबीआई से करवाने की मांग की। इसे भी बीजेपी ने खुला समर्थन दिया, क्योंकि दिवंगत सुशांत के एक रिश्तेदार बिहार में भाजपा विधायक हैं।

बाद में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी सुशांत के परिजनों के पक्ष में खड़े दिखे, क्योंकि यह एक बिहारी के साथ न्याय का सवाल था। जब बिहार पुलिस जांच के लिए मुंबई पहुंची तो स्थानीय पुलिस ने उसे जिस तरह असहयोग किया, वह भी असामान्य बात थी। अंतत: मांग सीबीआई जांच तक पहुंची, जिसे मामले की मुख्य आरोपी रिया चक्रवर्ती ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने बिहार पुलिस की बात को सही ठहराया। इसने दो राज्यों के बीच राजनीतिक और पुलिसिया टकराव को और बढ़ा दिया।

सियासी चांदमारी से हटकर इस पूरे प्रकरण के फोरें‍सिक और न्यायिक पक्ष को देखें तो सीबीआई के लिए मामले की तह तक पहुंचना आसान नहीं है, क्योंकि कहा जा रहा है कि सुशांत की मौत के बाद कई फोरेंसिक सबूत जो तत्काल सहेजे जाने थे, अब शायद मिटा दिए गए हैं या मिट चुके हैं। ऐसे में यह साबित करना आसान नहीं है कि सुशांत ने खुदकुशी की, किसी ने उन्हें ऐसा करने के लिए उकसाया या फिर उनकी हत्याकर उसे सुसाइड की शक्ल देने की सुनियोजित कोशिश की गई। अगर ऐसा था तो इसके पीछे कौन है? दूसरे, खुद फरियादी पक्ष ने भी यह आशंका नहीं जताई है कि सुशांत की हत्या की गई है। ऐसे में सीबीआई किसी ठोस नतीजे पर कैसे पहुंचेगी, यह देखने वाली बात है।

गहराई से देखें तो बीते पांच महीनों में मनोरंजन उद्योग से जुड़े जिन 8 लोगों ने मौत को गले लगाया, उनकी खुदकुशी पर किसी ने सवाल नहीं उठाया। मान लिया गया कि लॉक डाउन में आर्थिक तंगी और डिप्रेशन के कारण उन्होंने असमय ही दुनिया छोड़ दी। ये लिस्ट भी डरावनी है। यानी प्रेक्षा मेहता, मनमीत ग्रेवाल, कन्नड अभिनेत्री चांदना, मनजोत सिंह, मराठी एक्टर आशुतोष भाकरे, समीर शाह, सुशील गौड़, भोजपुरी अभिनेत्री अनुपमा पाठक और टिकटॉक स्टार सिया कक्कड़। एक दिन सुसाइड की खबर छप जाने के बाद उनका क्या हुआ, किसी को नहीं पता। सुशांत से जुड़ी हर खबर पाताल तक से निकाल लाने वाले चैनलों में से किसी ने यह चिंता नहीं की कि सुसाइड करने वाले इन कलाकारों की मौत पर आंसू बहाने वाला भी कोई है या नहीं।

बहरहाल इस पूरे सुशांत मामले में बिहार के आसन्न विधानसभा चुनाव की आहट को साफ सुना जा सकता है। भाजपा और जद-यू के सुशांत के पक्ष में खड़े होने के पीछे अघोषित मंशा यह मैसेज देने की है कि दोनों पार्टियां हर बिहारी और पूरे बिहार के हितों को लेकर कितनी व्याकुल और सजग हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो अगर बिहार के हितों की रक्षा करना है तो विस चुनाव में भी जदयू-भाजपा गठबंधन को जिताना है। इस मामले का साइड इफेक्ट यह हुआ कि बिहार में राजद, कांग्रेस जैसी विपक्षी पार्टियां अपने लिए कोई स्पेस नहीं ढूंढ पा रही हैं।

यह बताना गैर जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी बिहार के आसन्न विधानसभा चुनाव में ‘पार्टी की जीत’ के रूप में प्रचारित किया जाएगा। दूसरी तरफ पहले ही विवादों में घिरी महाराष्ट्र की महाआघाड़ी सरकार में अंतर्कलह और बढ़ सकती है। क्योंकि उस पर भाजपा के साथ-साथ सत्ता में साझेदार कांग्रेस के नेताओं ने भी हमले तेज कर दिए हैं। संक्षेप में कहें तो सुशांत की आत्मा को भले शांति मिल जाए, नेताओं की आत्मा कभी शांत नहीं होती!