शिवकुमार विवेक

मिड घाट की ख़ूबसूरत वादी को ट्रेन से उतरकर निहारने की साध अधूरी ही है। चार-पाँच बोवदों (गुफ़ा-सुरंगों) से गुज़रकर रेलगाड़ी जब अपनी सीटी से इस सन्नाटे को तोड़ती है और इंजन सांसें फुलाकर भक-भककर रुकता है तो सोते हुए यात्री की आँखें भी खुल जाती हैं। ऐसे ही जाग-जागकर इसे निहारा। ऊँचाई से नजर फैलाई तो चौतरफ़ा प्रकृति का अनुपम सौंदर्य बिखरा पाया। रेल की पटरियों से सैकड़ों मीटर नीचे गहरी खाई, उसमें से गुज़रते पतले पगडंडियों वाले रास्ते, उसमें बहती एक पहाड़ी नदी और कल-कल बहते झरने। दूर आसमानी धुँध में डूबे गाँव और बलखाती पटरियों पर नागिन सी मुड़ी रेलगाड़ी यादों की उस मंजूषा में समा जाती है जिसे हम गाहे-बगाहे झरोखे की तरह खोलकर ताज़ा हवा ले लेते हैं। यादों को अपने पास रखने का यही तो आनंद है।

मैंने कई बार मिडघाट पार कर आने वाले स्टेशन होशंगाबाद में अपने मित्र से कहा कि हमें मोटर साइकल पर बैठकर और कुछ पाँव-पाँव चलकर इन पतले रास्तों पर चलना है और यह देखना है कि ये रास्ते कहाँ ले जाते हैं? इन सुंदर और हवादार रास्तों पर कौन लोग चलते हैं? उनकी जिंदगी की ख़ुशी कैसी दिखती है? पर हम कभी न जा सके।

मित्र कहते रहे कि इन रास्तों के राहगीरों की रहगुज़र उतनी मौज की नहीं है जितनी आप जैसे साहित्यजीवी सोचते हैं। वे इन पर पाँव के छालों के साथ चलते हैं और सिरबोझा ढोकर बसर करते हैं। बसें और जनता की सहूलियत के दूसरे साधन तो यहाँ हैं नहीं। हाँ, हमने मिडघाट में घंटों रुकी रेलगाड़ी से इन रास्तों पर चलती कोई दूसरी गाड़ी नहीं देखी। मैने मित्र से कहा- जीवन का वही निस्‍पृह, शांत और संतोषी स्वरूप तो हमें देखना है। मित्र ने चुटकी ली कि सुख-सुविधाओं को बढ़ाकर संतोष को बढ़ाने की जगह कुछ लोग जीवन में असंतोष घोल रहे हैं।

मिडघाट नाम हमें पहला अटपटा लगता था। आधी अंग्रेज़ी-आधी हिंदी। मिड का मतलब बीच होता है तो यह भोपाल व होशंगाबाद स्टेशनों के बीच में पड़ने वाला पहाड़ी घाट है। होशंगाबाद से भोपाल की तरफ आते बुदनी से जब ट्रेन चलती है तो इस घाट को चढ़ते हुए हाँफ जाती है और बीच-बीच में साँस भरकर चढ़ती है। घाट चढ़ने के बाद बरखेड़ा स्टेशन पर पहुँचकर यह सुस्ताती है। पहले कई दफे ट्रेनों को दो इंजनों के सहारे चढ़ाते हुए देखा है।

तो यह नाम जरूर अंग्रेज़ों ने दिया होगा। बेशक। अंगरेजों ने ही यह रेललाइन डाली थी। दक्षिण और मुंबई से दिल्ली जाने वाली रेललाइन पर यह घाट पड़ता है। जब हम ट्रेन से इस लाइन से गुज़रते है तो जंगल के सन्नाटे में पटरियों पर फावड़े-कुदाल लेकर चलते कुछ लोग नजर आते हैं जो रेलवे के कामगार होते हैं। बीच में एक सिरे पर मिडघाट और दूसरे पर चौका स्टेशन पड़ता है। नाम के स्टेशन हैं। केवल रेलवे की हट बनी हैं। लेकिन आजकल मिडघाट के एक शिखर पर रेलवे ने इतनी सुंदर हट बनाई है कि ऐसा लगता है जैसे हम शिमला की टॉयट्रेन के रास्ते में हैं। बारिश में इन वादियों का कहना ही क्या!

घने जंगल हैं तो बाघ भी होंगे। दो-तीन बरस पहले एक बाघ ने पटरियों पर जान देकर यह बता दिया था। हाल की गणना में सीहोर जिले (जिसमें मिडघाट की हरी-भरी पहाड़ियाँ हैं) के जंगलों में 32 बाघ हैं जो दस साल पहले महज़ 2 थे। भगवान करे कि ये ऐसे ही फलें-फूलें। उस बदकिस्मत बाघ की नियति पर न पहुँचें। इन्हें बचाने के लिए उन रास्तों, नदियों, झरनों और घाटियों को महफ़ूज़ रखना होगा। हालाँकि बढ़ती आबादी और होशंगाबाद व भोपाल के बीच दैनिक यात्रियों के इज़ाफ़े ने यहाँ से आवाजाही को पिछले कुछ सालों में कई गुना कर दिया है। यहां से गुज़रने वाली सड़क फ़ोरलेन की जा रही है, जिसमें सैकड़ों पेड़ कट गए। इस मार्ग पर हालाँकि रेलवे जैसा रोमांच नहीं है, लेकिन यहाँ भी गाड़ियों को घाट चढ़ाने की समस्या रही है। चढ़ पाने में असमर्थ वाहनों के लिए निपट जंगल में एक सरदारजी (सच में ऐसे जोखिम भरे काम करने की बहादुरी वे ही कर पाते है!) ने क्रेन्स रख छोड़ी थीं। फ़ोरलेन ने उनका रोज़गार छान लिया।

यहाँ रेलवे तीसरी लाइन डाल रहा है जिसमें पाँच नए टनल बन रहे हैं। हाल में 1080 मीटर लंबी सुरंग की तस्वीरें तब प्रसारित की गईं जब रेलवे के आला अफसर इसका जायज़ा लेने के लिए पहुँचे। 27 किमी लंबी यह तीसरी रेल लाइन यहाँ से गुज़रने वाली है। भोपाल से होशंगाबाद की दूरी 70 किमी है। जैसे ही मिडघाट उतरते हैं, नर्मदा की विशाल जलधारा शीतल समीर से निकलकर आने वालों के मन को पवित्र स्नान करा देती है। पर ये हरे-भरे जंगल और सदानीरा नर्मदा क्या ऐसे ही बनें रहेंगे?