रमेश रंजन त्रिपाठी

कथावाचक अपनी बात शुरू करने वाले थे कि एक भक्त ने टोक दिया- ‘महोदय, हमारे ग्रंथों में दुष्टों की पहचान और उनसे निपटने के तरीके भी बताए गए हैं या केवल भजन करना सिखाया गया है?’

सवाल सुनकर टीवी पर आतंकवादी हमले की खबर देख चुके कथावाचक का चेहरा खिल गया। वे भी इस विषय पर बोलना चाहते थे।

‘गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस में दुष्टों की तीन श्रेणियाँ बताई हैं।’ पंडितजी खुशी-खुशी बताने लगे-‘पहले होते हैं ‘मूर्ख’, जिनकी चेतना जगाना ब्रह्मा के लिए भी उसी प्रकार असंभव है जैसे बादलों से अमृत बरसने लगे तब भी बाँस फलता या फूलता नहीं है। कहा है कि मूरख हृदय न चेत जो गुरु मिलइ बिरंचि सम, फूलइ फरइ न बेंत जदपि सुधा बरसहिं जलद।’

सभी श्रोता ध्यान से सुन रहे थे। कथावाचक ने बोलना जारी रखा- ‘दूसरी श्रेणी है ‘सठ’ की जो अच्छी संगत मिलने पर सुधर सकते हैं। सठ सुधरहिं सत संगत पाई। और तीसरे ‘जड़’ होते हैं जो विनम्रता की भाषा नहीं समझते, वे प्रेम भी भय दिखाने पर करते हैं। ‘विनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीत, बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीत।’

अपनी बातों में भक्तों को आनंद आता देख पंडितजी का उत्साह बढ़ गया। वे अधिक सतर्क होकर समझाने लगे- ‘दुनिया में दुष्टों की कमी नहीं है। सबसे पहले इनकी श्रेणी तय करनी चाहिए फिर सुधारने के लिए उचित तरीका अपनाना चाहिए।’

‘क्या दया, करुणा, निवेदन इत्यादि मानवीय संवेदनाओं के माध्यम से ऐसे दुर्जनों को रास्ते पर नहीं लाया जा सकता?’ एक श्रोता ने पूछा।

‘सभी को नहीं।’ कथावाचक बोले- ‘तुलसीदास जी ने ‘मानस’ में समझाया है कि मूर्ख से विनय, कुटिल के साथ प्रीति, स्वाभाविक कंजूस से सुंदर नीति, ममता में फँसे हुए मनुष्य से ज्ञान की कथा, अति लोभी से वैराग्य का वर्णन, क्रोधी से शांति की बात और कामी से भगवान की कथा का वैसा ही परिणाम होता है जैसा ऊसर में बीज बोने का होता है यानी व्यर्थ जाता है।’

‘तो क्या सभी के साथ ऐसा बर्ताव जरूरी है?’ एक भक्त कुछ कन्फ्यूज लग रहा था।

‘जैसे केले को करोड़ों उपाय से सींचिए परंतु वह काटने पर ही फलता है इसी तरह अधम व्यक्ति विनय से नहीं डाँट-फटकार से ही रास्ते पर आता है।’ पंडितजी ने दोहा पढ़ा- ‘काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच, बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।’

‘क्या चेतावनी देने या डराने-धमकाने से भी काम नहीं चल सकता?’ एक सवाल फिर उछला।

‘गोस्वामी जी ने गुलाब, आम और कटहल जैसे तीन प्रकार के पुरुष बताए हैं।’ व्यास गद्दी पर बैठे उपदेशक ने जवाब दिया- ‘जैसे गुलाब केवल फूल देते हैं, आम फूल और फल दोनों देते हैं और कटहल में केवल फल लगते हैं इसी प्रकार पुरुषों में एक कहते हैं करते नहीं, दूसरे कहते और करते भी हैं तथा तीसरे केवल करते हैं पर वाणी से कहते नहीं। यह ज्ञान श्रीराम ने रावण को दिया था।’

‘परंतु श्रीराम ने भी तो पहले अंगद को दूत बनाकर भेजा था।’ एक भक्त ने टोका-‘वे सीधे लंका पर हमला भी तो कर सकते थे!’

‘इस उदाहरण में आम की उपयोगिता सबसे ज्यादा है इसलिए कथनी और करनी वाली नीति ही श्रेष्ठ मानी जाती है।’ कथावाचक मुस्कुराए- ‘जब शांति के सभी प्रयास विफल हो जाएँ तो कर्म करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।’

‘क्या सफल होने के लिए इतना ही पर्याप्त है?’ श्रोताओं की शंकाएँ समाप्त नहीं हो रही थीं।

‘जब जंग अनिवार्य हो जाए तब विजयी होने का फॉर्मूला श्रीमद् भगवद्गीता में बताया गया है। ‘यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः, तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।‘ अर्थात जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीवधनुषधारी अर्जुन हैं वहीं श्री, विजय और विभूति होना निश्चित है।’ कोई पूछे उसके पहले ही पंडितजी ने बात को स्पष्ट कर दिया- ‘यहाँ अर्जुन कर्म और उत्साह तथा श्रीकृष्ण सत्य एवं धर्म के प्रतीक हैं। वीरता और पूरी ताकत के साथ धर्म और सच्चाई के हाथों में अपनी बागडोर सौंपकर युद्ध के मैदान में उतरने वाले की विजय निश्चित होती है।’

‘क्या आज के छल-कपट भरे संसार में युद्ध के सदियों पुराने नियम किसी काम के हैं?’ एक श्रोता फिर बोल पड़ा।

‘प्रेम और युद्ध में सब जायज है।’ पंडितजी हँसे- ‘जंग कई तरह की होती है। आजकल आमने-सामने से ज्यादा गुरिल्ला और शीत युद्ध का भी खूब प्रचलन है। जीतने के लिए कूटनीति और तिकड़म का सहारा लेने की परंपरा प्राचीनकाल से है। पौराणिक हों या आधुनिक, युद्ध में छल-कपट तो होता ही है।’

‘क्या हम अपने पड़ोसी दुश्मन से निपटने के लिए भी इन नीतियों का सहारा ले सकते हैं?’ एक भक्त फिर खड़ा हो गया।

‘आपको क्या लगता है?’ कथावाचक ने गंभीरता ओढ़ ली- ‘भगवान के भक्तों को और किस मार्गदर्शन की आवश्यकता है?’

सभी ओर शांति छा गई थी।
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(मध्‍यमत)
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