राकेश अचल

खुश होइए कि खुश होने के मामले में हम एक छोटे से देश फिनलैंड से 138 पायदान पीछे है। फिनलैंड भारत के मुकाबले एक बहुत छोटा देश है,  भारत में फिनलैंड के बराबर के अनेक शहर हैं। अकेली मुंबई में ही दो फिनलैंड हो सकते हैं। दिल्ली भी दो फिनलैंड के बराबर ही समझिये। यानि फिनलैंड की आबादी के भरपूर खुश रहने का राज उसकी कम आबादी है।

चूंकि ख़ुशी के मुकाबिले में फिनलैंड दुनिया में नंबर वन है इसलिए उसके बारे में थोड़ा-बहुत जान लेना आवश्यक है। फिनलैंड के बारे में मैं आपको उतना ही बता सकता हूँ जितना मैंने अपने छात्र जीवन में पढ़ा था। दरअसल लगभग 53 लाख की आबादी वाले इस देश के ज्यादातर लोग दक्षिणी क्षेत्र में रहते हैं। क्षेत्रफल के हिसाब से यह यूरोप का आठवां सबसे बड़ा और जनघनत्व के आधार पर यूरोपीय संघ में सबसे कम आबादी वाला देश हैं। देश में रहने वाले बहुसंख्यक लोगों की मातृभाषा फ़िनिश है,  वहीं देश की 5.5 प्रतिशत आबादी की मातृभाषा स्वीडिश है।

अतीत बताता है कि फिनलैंड ऐतिहासिक रूप से स्वीडन का एक हिस्सा था और 1809 से रूसी साम्राज्य के अंतर्गत एक स्वायत्त ग्रैंड डची था। रूस से गृहयुद्ध के बाद 1917 में फ़िनलैंड ने स्वतंत्रता की घोषणा की। फिनलैंड 1955 में संयुक्त राष्ट्र संघ में,  1969 में ओईसीडी और 1995 में यूरोपीय संघ और यूरोजोन में शामिल हुआ। एक सर्वेक्षण में सामाजिक,  राजनीतिक,  आर्थिक और सैन्य संकेतकों के आधार पर फिनलैंड को दुनिया का दूसरा सबसे अधिक स्थिर देश करार दिया गया है। यानि फिनलैंड की ख़ुशी का राज उसकी कम आबादी और राजनीतिक स्थिरता में छिपा है। भारत से कोई चार दशक बाद आजाद हुए फिनलैंड से हमें ही नहीं दुनिया को बहुत कुछ सीखना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र की वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट में फिनलैंड लगातार चौथी बार दुनिया का सबसे खुशहाल देश बना है। वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट में डेनमार्क दूसरे नंबर पर है। इसके बाद स्विटज़रलैंड और आइसलैंड की बारी है। नीदरलैंड्स को पांचवा स्थान मिला है। टॉप 10 देशों में न्यूज़ीलैंड एकमात्र गैर-यूरोपीय देश है जिसे इस रिपोर्ट में जगह मिली है। इसके अलावा ब्रिटेन 13वें पायदान से गिरकर 17वें नंबर पर पहुंच गया है। फिनलैंड भी दुनिया के दूसरे देशों की तरह कोरोना की गिरफ्त में आया, लेकिन यहां के लोगों ने अपने रहन-सहन और बर्ताव से इस आपदा के बावजूद अपनी ख़ुशी के स्तर में कोई कमी नहीं आने दी।

फिनलैंड खुश है क्योंकि उसे अपने बच्चों से प्रेम है। फिनलैंड में बच्चे सातवें साल स्कूल भेजे जाते हैं, यानि वहां बच्चों की पीठ पर तीन साल की उम्र से किताबों का बोझ डालकर उनकी खुशी नहीं छीनी जाती। यहां के बच्चे डोनल्ड डक की कॉमिक्स नहीं पढ़ते, फिनलैंड की खुशी का एक बड़ा कारण यहां का प्लास्टिक मुक्त होना है। फिनलैंड वाले 10 में से 9 प्लास्टिक बोतलें रीसाइकल कर लेते हैं और शीशे की बोतलें तो शत-प्रतिशत रीसाइकल की जाती हैं। कोई 1.87 लाख झीलों वाले फिनलैंड में लोग रोजाना 4 से 5 कप काफी पीते हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि यहाँ कोई बेघर नहीं है।

इन तमाम तथ्यों को देखते हुए हमें लगता ही नहीं है कि खुशहाली के मामले में हम कभी भी फिनलैंड का स्थान उससे छीन सकते हैं। हम गाल बजाने के मामले में विश्व गुरु हैं और आगे भी रहेंगे। हमसे ये स्थान कोई नहीं छीन सकता,  क्योंकि विश्व गुरु बनने के लिए जनता को खुशहाल रखना जरूरी नहीं होता,  उन्हें रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए निरंतर लटकाये रखना ही हमारी राजनीति और सत्ता का ध्येय है। हम अच्छे दिनों के आश्वासन दे सकते हैं लेकिन अच्छे दिन ला नहीं सकते। ये बात केवल मौजूदा सत्तारूढ़ दल पर लागू नहीं होती,  बल्कि सभी पर होती है।

खुशहाली एक संयुक्त प्रयास है,  हमारे यहां राजनीतिक स्थायित्व लगातार दस साल भी रहा और चार दशक भी लेकिन खुशहाली के कदम आगे नहीं बढ़े,  बढ़े भी तो इतने कि हम खुशहाली के मामले में 156 देशों की फेहरिस्त में 139 नंबर पर हैं। बीते साल हमारा स्थान 144 वां था, इस लिहाज से हमने तरक्की की है और इसके लिए हम अपने चौकीदार प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को श्रेय दे सकते हैं। हमारे यहां श्रेय लूटना एक राष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धा है।

आपको बता दें कि वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट के लिए गैलप डेटा का इस्तेमाल किया गया। गैलप ने 149 देशों में लोगों से अपनी हैप्पीनेस को रेट करने को कहा था। इसके अलावा इस डेटा में जीडीपी,  सोशल सपोर्ट, आजादी और भ्रष्टाचार का स्तर भी देखा गया और फिर हर देश को हैप्पीनेस स्कोर दिया गया। ये स्कोर पिछले तीन सालों का औसत है। सर्वे में शामिल एक तिहाई से अधिक देशों में कोरोना महामारी की वजह से नकारात्मक भावनाएं बढ़ी हैं।

लब्बो-लुआब ये है कि खुशी के लिए महाबली होना आवश्यक नहीं है। आप संख्या में कम होकर भी औरों से ज्यादा खुश रह सकते हैं। खुशी की इस सूची में महाबली अमेरिका तक 20वें स्थान पर है। डेनमार्क,  स्विट्जरलैंड,  आइसलैंड,  नीदरलैंड,  नॉर्वे,  स्वीडन,  लक्जमबर्ग और न्यूजीलैंड भी शीर्ष 10 में शामिल थे। अमेरिका 20वें,  रूस 77वें,  चीन 85वें स्थान पर था। खुश रहने के लिए जो करना चाहिए वो हम कर नहीं पा रहे। हम अभी तक पहनावे, खानपान और मंदिरों की घंटियों, मसजिदों की अजानों की आवाजों को लेकर आपस में उलझ रहे हैं। इनसे उबरे बिना हम खुशी के बारे में कैसे सोच सकते हैं।

दुर्भाग्य ये है कि हमारे राष्‍ट्रभक्‍त नेता कभी खुशी के इस मुद्दे पर बात नहीं करते,  कर नहीं सकते। हमारे मध्यप्रदेश की मौजूदा मामा सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में खुशी तलाशने के लिए पृथक से एक आनंद मंत्रालय बनाया था। हमें लगा कि पूरे देश में नहीं किन्तु कम से कम हमारे प्रदेश में तो खुशी का स्तर बढ़ ही जाएगा, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं पाया। पहले मामा की सरकार चली गयी और जब एक साल बाद मामा जी ने दोबारा सरकार बनाई तो ये आनंद विभाग प्राथमिकताओं में बहुत नीचे खिसक गया।

हमारी सरकारें सोचती हैं कि ख़ुशी सरकार के इशारे पर नाचती हुई हर आंगन में आकर अपनी हाजरी लगा देगी। लेकिन ऐसा न हुआ है न होगा। आनंद विभाग बनने के बाद कुछ नौकरशाहों और कुछ हमारी बिरादरी के लोगों को जरूर आनंद आ गया। ख़ुशी के मामले में 20वें स्थान पर आये अमेरिका में रहने वाले हमारे सपूत का कहना है कि पापा अब हमें फिनलैंड के लिए मूव हो जाना चाहिए। वहीं किसी झील के किनारे एक छोटा सा घर बनाकर रहेंगे। न हाय-हाय और न किच-किच। आप भी अगर खुशी की तलाश में हैं तो चलिए! फिनलैंड चलने की तैयारी कर लीजिये।