चाह थी सिर्फ तुम्हारी…

गिरीश उपाध्‍याय

चाह थी सिर्फ तुम्हारी
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एक समय था
जब सिर्फ और सिर्फ
चाह थी तुम्हारी
केवल तुम ही तुम
बसी थी सपनों में
तुम ही थीं
मेरी प्रियतमा
सिर्फ तुम्हारी ही
हसरत थी जिंदगी में
कितने ख्वाब संजोए थे
तुम्हारे लिए
और
तुम्हारे सहारे
जिंदगी आगे बढ़ाने के
खींचे थे न जाने कितने खाके
दूसरों के पास देखकर तुम्‍हें
होती थी कितनी जलन
शायद पता ही नहीं होगा तुम्हें
और जब
‘ब्लैक एंड व्हाइट’ को पीछे छोड़
तुम भी रंग गई थीं
‘ईस्टमेन’ कलर में
तब तो और बढ़ गया था
तुम्हारा आकर्षण
क्या दिन थे वो
जब होता था मन
तुम्हारा हाथ थामे
धीरे-धीरे टहलने का
तुम्हें साथ लेकर
हवा से बातें करने का
और जब तुम आईं जिंदगी में
तो मानो
दुनिया ही बदल दी थी तुमने
गति आ गई थी जीवन में…
फिर बदला जमाना
जाने कहां खो गईं तुम
ढूंढता है मन आज भी
पुराने दिनों में जाकर तुम्हें
मेरी प्रिय सायकल...

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