गिरीश उपाध्‍याय 
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पिता उम्मीद करता है
उम्मीद को पूरी होते
देखना चाहता है
पिता सपने देखता है
सपनों को सच होते
देखना चाहता है
पिता चिंता करता है
चिंता को
दूर करना चाहता है
पिता चलना सिखाता है
देखना चाहता है
आगे निकलते हुए
पिता उंगली छोड़ देता है
ताकि हाथ छू सकें आकाश
पिता आगे चलता है
राह के कांटे दूर करता हुआ
समय बीतता है
… फिर पिता पीछे चलता है
उम्मीद करता हुआ
कोई पीछे मुड़कर देखेगा
उसके पास सिर्फ उम्मीद ही होती है