अजय बोकिल

पड़ोसी देश म्यानमार में सैन्य तख्ता पलट के खिलाफ जारी देशव्यापी विरोध के बीच दो दिन पूर्व एक तस्वीर दुनिया भर में वायरल हुई, जिसमें एक निहत्थी कैथोलिक नन सशस्त्र सैनिकों से यह कह रही है कि चाहो तो मुझे मार दो, लेकिन सैन्य सत्ता का विरोध करने वाले बच्चों की जान बख्श दो। उस नन के इस साहस को पूरे विश्व में लोकतं‍त्रवादियों की आवाज के रूप में देखा गया। खास बात यह है कि वह नन म्यानमार में उस अल्पसंख्यक ईसाई समुदाय का प्रतिनिधित्व करती है, जिसकी आबादी कुल का महज 6 फीसदी है। नन की इस हिम्मत के आगे वो बर्मी सैनिक भी हाथ जोड़कर नतमस्तक होते दिखे, जिन्हें वहां की सैनिक सरकार ने ‘प्रदर्शनकारियों को मरने तक गोली मारने’ के आदेश दिए हुए हैं।

आलम यह है कि एक तरफ देश में सैनिक जुंता (जिसे बर्मी भाषा में तातमदाओ कहा जाता है) का जबर्दस्त विरोध हो रहा है तो दूसरी तरफ सैन्य सत्ता लोगों की आवाज दबाने भयंकर दमन चक्र चलाए हुए है। सरकार के खिलाफ अहिंसक प्रदर्शनों में अब तक 60 से अधिक लोकतंत्र समर्थक मारे जा चुके हैं और 2 हजार से अधिक लोगों को गिरफ्तार और नजरबंद किया जा चुका है, जिनमें देश की लोकप्रिय नेता और निर्वाचित चांसलर आंग सान सू की भी शामिल है। कई पत्रकारों को भी गिरफ्तार किया गया है।

दुनिया के अधिकांश देशों ने इस सैन्य क्रांति को अवैध माना है। लेकिन म्यानमार की इस सैनिक क्रांति को चीन समर्थन है। जबकि भारत की प्रतिक्रिया अभी सतर्कता से भरी है। इस बीच भारत में सिविल सोसाइटी के 30 बुद्धिजीवियों ने विदेश ‍मंत्री जे. जयशंकर को पत्र लिखकर म्यानमार में लोकतंत्र समर्थक ताकतों का खुलकर समर्थन करने की मांग की है। ध्यान देने की बात यह भी है कि म्यानमार में सैन्य सत्ता ने तमाम बड़े अखबारों के लायसेंस रद्द कर दिए हैं ताकि जनता के विरोध को मीडिया में जगह न मिल सके। वहां के सभी अंग्रेजी अखबारों ने इस आशय की सूचना डाली हुई है। इन अखबारों का आखिरी ऑनलाइन अंक 8 मार्च को निकला है।

बहरहाल पूरी दुनिया में सारी जिज्ञासा इस बात को लेकर रही कि दोनो हाथ फैलाकर सैन्य सत्ता का विरोध कर रही यह नन है कौन? जिस नन का यह फोटो वायरल हुआ है, वह म्यानमार के म्यितक्यिना न्यूज जर्नल के किसी फोटोग्राफर ने 8 मार्च को खींचा था, जो 9 मार्च को वायरल हुआ। घुटनों के बल सशस्त्र सैनिकों का विरोध कर रही इस नन का नाम है सिस्टर एन रोज नू तावंग। ये तस्वीर उत्तरी म्यानमार के जिस शहर में खींची गई, उसका नाम है- म्यितक्यिना।

म्यितक्यिना म्यानमार के एक प्रांत काचिन की राजधानी भी है। नन के पीछे वो युवा प्रदर्शनकारी थे, जो अपनी नेता आंग सान सू की रिहाई और सत्ता में वापसी की मांग कर रहे थे। सिस्टर नू के अनुसार उसने पहले एक प्रदर्शनकारी को अपने सामने सैनिको की गोली से मरते हुए देखा। उसके बाद आसूं गैस का धुंआ भर गया। उसने कहा कि ऐसे में मैं केवल तमाशबीन बन कर नहीं रह सकती थी। प्रदर्शनकारी बच्चों को बचाने के लिए मुझे जो सूझा, मैंने किया।

वैसे म्यानमार में सैन्य शासन कोई नई चीज नहीं है। पहले ‘बर्मा’ और बाद में ‘म्यानमार’ के 72 साल के इतिहास में वहां लोकतंत्र केवल 25 साल ही चल पाया है। बाकी समय सैन्य सत्ता ही काबिज रही है, भले ही उसने समाजवादी शासन व्यवस्था का मुखौटा पहन रखा था। म्यानमार ने अंग्रेजों से 1948 में आजादी पाई। उसमे आंग सान सू की पिता आंग सान की अहम भूमिका थी। आंग सान वाम पंथी थे और उन्हें ‘आधुनिक म्यानमार का पितामह’ कहा जाता है। नव स्वतंत्र देश की सत्ता सम्हालने के एक साल के भीतर ही उनकी हत्या कर दी गई। उसके बाद वहां 1962 में सेना ने लोकतांत्रिक सरकार का तख्तापलट कर सत्ता हथिया ली। 1988 में सेना ने सीमित लोकतंत्र लागू करते हुए ‘एक पार्टी शासन व्यवस्था’ लागू की, जिसका ध्येय समाजवादी कार्यक्रम पर अमल करना था।

आंग सान सू की शुरू से म्यानमार में पूर्ण लोकतंत्र के लिए संघर्ष करती रही हैं। 2008 में म्यानमार में नया संविधान लागू हुआ और जनता के दबाव के बाद 2010 में चुनाव कराए गए और आंग सान सू की पार्टी एनएलडी ( नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी) सत्ता में आई। सू की पार्टी ने पिछले साल नवंबर में हुए आम चुनाव में अभूतपूर्व जीत हासिल की। एनएलडी ने संसद की 476 में से 396 सीटें जीत ली थीं। यानी‍ विपक्ष का लगभग सफाया हो गया था। एनएलडी के नव निर्वाचित सांसद शपथ लेते, उसके पहले ही वहां 1 फरवरी को सेना ने तख्तापलट कर दिया। शुरू में इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से म्यानमार की जनता सकते में थी, लेकिन कुछ दिनो बाद ही उसके खिलाफ देशव्यापी विरोध शुरू हो गया, जो लगातार बढ़ रहा है।

अमेरिका सहित सभी पश्चिमी देशों ने म्यानमार में सैन्य सत्ता को खारिज करते हुए देश में लोकतं‍त्र बहाली की मांग की है। इसी मकसद से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव भी लाया गया था, जिसे चीन और रशिया ने रुकवा दिया। यहां सवाल उठ सकता है कि जब देश में सब कुछ ठीक चल रहा था, तब सेना ने यह तख्तापलट क्यों किया? इसका पहला कारण तो यही है कि म्यानमार में सेना की दाढ़ में (पाकिस्तान की तरह) सत्ता का खून लगा हुआ है, इसलिए वह बैरकों में नहीं रह सकती। आंग सान सू की सरकार सेना के हाथ बाधंना चाहती थी, जो सेना को कतई मंजूर नहीं था। शायद इसीलिए सेना ने आंग सान की बंपर जीत को चुनावों में भारी धांधली का नतीजा बताया और उसे अस्वीकार कर दिया। जो कि वास्तव में जनादेश को खारिज करना ही था।

इसी चुनाव में सेना ने भी अपनी एक प्रॉक्‍सी पार्टी यूएसडीपी (यूनियन सॉलिडेरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी) के माध्यम से प्रत्याशी खड़े किए थे। उनमें से केवल 33 ही जीत सके। इन नतीजों के बाद सेना अपनी राजनीतिक भूमिका को लेकर परेशान थी। जिसका नतीजा तख्ताापलट के रूप में सामने आया। देश की स्टेट कौंसिलर (प्रधानमंत्री) पचहत्तर वर्षीय सू की पर जो ‘गंभीर’ आरोप लगाए गए हैं, उनमें गैर लायसेंसी वाकी-टाकी रखना, कोरोना वायरस प्रतिबन्धों का उल्लंघन कर जन असंतोष को हवा देना भी शामिल है। जनरल मिन आंग ल्हाइंग की अगुवाई में हुए इस सैन्य तख्तापलट के पीछे म्यानमार के भीतरी अंतर्विरोध भी हैं।

भारत में प्राचीनकाल में म्यानमार को ‘ब्रह्म देश’ के रूप में जाना जाता था। लेकिन म्यानमार को ‘बर्मा’ नाम अंग्रेजों ने दिया। इसके पहले वहां राजवंशों के हिसाब से साम्राज्यों के नाम थे। आखिरी साम्राज्य कानबाउंग साम्राज्य था, जिसे अंग्रेजों ने खत्म कर 1885 में बर्मा को भारत का हिस्सा बना दिया। हालांकि बाद में उसे अलग प्रशासनिक इकाई बनाया गया। ‘बर्मा’ शब्द वहां के प्रमुख जातीय समुदाय बामर या बर्मन से बना है, जो देश की कुल आबादी का 85 फीसदी हैं। इनमे से अधिकांश बौद्ध हैं और कट्टर थेरवादी सम्प्रदाय के अनुयायी हैं। देश में इनके अलावा करीब सौ नस्ली समुदाय और भी हैं, जिनकी भाषा, धर्म और रीति रिवाज अलग-अलग हैं। इनमें हमेशा द्वंद्व और वर्चस्व का संघर्ष चलता रहता है। सैनिक सत्ता ने जब देश में लोकतंत्र मजबूत होते देखा तो कोई बहाना ढ़ूंढकर सत्ता हथिया कर देश में एक साल के लिए इमर्जेंसी लगा दी।

देश की सत्ता अब स्टेट एडमिनिस्ट्रेटिव कौंसिल के हाथो में है, जिसके प्रमुख जनरल ह्लाइंग हैं। लेकिन इस सै‍न्य तख्तापलट को बौद्ध धर्मगुरुओं ने भी अमान्य करते हुए लोकतंत्र बहाली की मांग की है। म्यानमार का आर्थिक बहिष्कार भी शुरू हो चुका है। अलबत्ता चीन इस स्थिति में भी अपना फायदा देख रहा है। क्योंकि म्यानमार चीन के आर्थिक जाल में पहले ही फंस चुका है। उधर सैन्य सत्ता को भी किसी बड़ी वैश्विक ताकत की समर्थन की जरूरत है ताकि वह जनविरोध के दमन को बेखौफ जारी रख सके।

भारत लोकतांत्रिक देश होने के नाते सैन्य तख्तापलट का कभी समर्थन नहीं कर सकता। लेकिन हमारे सामने विकल्प सीमित हैं। इसका एक बड़ा कारण वहां हमारा आर्थिक स्टेक भी है। साथ ही रोहिंग्या समस्या, पूर्वोत्तर राज्यों में अलगाववाद जैसी समस्याएं हैं, जिसका म्यानमार से भी सम्बन्ध है। हालांकि सू की सरकार से भारत के बहुत अच्छे रिश्ते रहे हैं। और वहां लोकतंत्र समर्थक भारत की ओर आशा की नजरों से देख रहे हैं। ऐसे में मोदी सरकार को कोई स्पष्ट स्टैंड जल्द लेना होगा।

यहां असली सवाल यह है कि क्या उस कैथोलिक नन का साहस पूरे म्यानमार की आवाज बनकर सैन्य सत्ता को हटने पर मजबूर कर सकेगा या नहीं? फिलहाल सैन्य सत्ता के जल्द हटने के आसार कम ही हैं। लेकिन ‘तातमदाओं’ का इतना व्यापक और तगड़ा विरोध म्यानमार में लंबे समय बाद देखने को मिल रहा है। और जनता अगर अपनी वाली पर उतर आए तो कोई तानाशाह या सैन्य सत्ता ज्यादा दिन नहीं टिक सकती। इस स्थापित सत्य की 21 वीं सदी में यह पहली परीक्षा है, ऐसा मान लें तो गलत नहीं होगा।