अजय बोकिल

दिल्ली प्रदेश में आम आदमी पार्टी की कल्याणकारी केजरीवाल सरकार के ताजा फैसले का असल मकसद आखिर क्या है? सतही तौर पर यह फैसला (पीने के शौकीन) आम आदमी और सरकारी खजाने के हित में ही है कि राज्य में शराब पीने की उम्र 25 से घटाकर 21 कर दी गई है। सरकार के इस ऐलान के खिलाफ औपचारिक राजनीतिक विरोध के अलावा कोई मुखर आवाज नहीं सुनाई दी। उलटे बार के धंधे से जुड़े लोगों ने इसे ‘बहुप्रतीक्षित फैसला’ ही बताया। शायद इसलिए भी क्योंकि अपने देश में विभिन्न राज्यों में शराब पीने की न्यूनतम उम्र अलग-अलग है। यानी कुछ राज्यों में 25, कुछ में 21 तो कई में 18 साल का होते ही शराबखोरी कानूनन जायज है।

पिछले दिनों एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार में छपी कैंटर और एनएफएक्स की स्टडी में कहा गया था कि भारत में 46 फीसदी लोग शराब पीने के लिए कानूनी उम्र एक समान करने के पक्ष में हैं, क्योंकि अलग-अलग राज्यों में यह आयुसीमा अलग-अलग होने से पीने वालों को ‘दिक्कत’ होती है। और फिर उम्र के हिसाब से शराब पीने की क्षमता में भी फर्क पड़ता है। इस लिहाज से केजरीवाल सरकार का यह फैसला देश में शराबखोरी न्यूनतम आयु समानीकरण की पुरानी मांग को पूरा करने की दिशा में एक बड़ा कदम भी माना जा सकता है। इसके पीछे मासूम तर्क यह है कि जब इस मुल्क में 18 साल की उम्र में वोट देने का अधिकार मिल जाता है तो शराब पीने का हक पाने के लिए 3 या 7 साल का (लंबा) इंतजार क्यों?

यकीनन केजरीवाल सरकार के फैसले से देश की राजधानी के हजारों शराब प्रेमियों ने राहत महसूस की होगी। दिल्ली में अभी तक कानूनी मद्यपान की न्यूनतम उम्र 25 साल थी। यह बात अलग है कि पीने-पिलाने वाले कानून की फिकर नहीं करते। उम्र चाहे जो हो, जिन्हें पीना है, वो पी ही रहे हैं। थोड़ा खतरा पुलिस केस बनने का रहता था। लेकिन पुलिस भी ऐसे मामले में अक्सर ‘संवेदनशीलता’ से काम लेती है। इसके अलावा शराब दुकानदारों, बार और पब वाले तो कभी उम्र के फेर में पड़ते ही नहीं है। भई जिसको पीनी हो, छक कर ‍पीए। बस बिल चुकाता जाए।

केजरीवाल सरकार के इस ‘शराबी फ्रेंडली’ फैसले का राज्य में विपक्ष में बैठी भाजपा और कांग्रेस ने रस्मी विरोध जरूर किया, लेकिन खुद इन दोनों पार्टियों द्वारा शासित ज्यादातर राज्यों में शराबखोरी की न्यूनतम उम्र पहले ही दिल्ली के बराबर या उससे भी कम है। ऐसे में उन्हें विरोध का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। वैसे भी संविधान में शराब राज्यों का विषय है। अगर राज्यों में मदिरापान की कानूनी उम्र के प्रावधान देखें तो आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, गोवा, जम्मू कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल आदि राज्यों में 18 साल का होते ही कानूनन शराब पी जा सकती है। जबकि मध्यप्रदेश, यूपी, पश्चिम बंगाल, असम, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना आदि राज्यों में यह एज बार 21 साल है।

केरल में यह सीमा 23 बरस तो बाकी अन्य राज्यों में 25 साल है, जिसमें कल तक दिल्ली भी शामिल था। देश के चार राज्यों गुजरात, बिहार, नागालैंड तथा मिजोरम में पूर्ण शराबबंदी तो मणिपुर में आंशिक शराबबंदी है। यह बात अलग है कि इन राज्यों में भी शराब के मामले में ‘जहां चाह, वहां राह’ की यथार्थ स्थिति है। संयोग से शराबबंदी वाले राज्य भी शराबखोरी वाले राज्यों से घिरे हुए हैं। इसलिए ‘गरजमंदों’ को ज्यादा परेशानी नहीं होती।

यूं शराब में लाख बुराइयां हों, लेकिन दुर्भाग्य से यह कटु सत्य है कि कोरोना लॉकडाउन जैसे महासंकट में राज्यों की लड़खड़ाती आर्थिक स्थिति को भी शराब ने ही बड़ा सहारा दिया है। कड़े लॉकडाउन में भी किराने और दूध-सब्जी के अलावा सरकारों ने जो दुकाने खोलीं वो शराब की थीं और शराबियों ने भी ‘देशहित’ में सरकारों की इस पहल को भरपूर प्रतिसाद दिया। उनके खाली खजाने भर दिए। दिल्ली सरकार का ताजा फैसला भी राज्य का खजाना भरने के साथ साथ शराबनोशी की कानूनी उम्र ‘एट पार’ लाने के मकसद से लिया गया लगता है।

वर्ष 2019-20 में दिल्ली सरकार ने शराब पर आबकारी कर से करीब 6500 करोड़ रुपये कमाए थे। ताजा फैसले के बाद केजरीवाल सरकार को उम्मीद है कि खजाने में डेढ़ से दो हजार करोड़ रुपये और आएंगे। यूं भी दिल्ली सरकार कल्याणकारी सरकार होने का दावा करती है। लिहाजा सरकार का यह ‘राबिनहुडी फैसला’ है। यानी ‘अमीरों को लूटो, गरीबों को बांटो’ टाइप का। यह बात अलग है कि शराब पीने के मामले में अमीर-गरीब का फर्क नहीं होता। सब एक पांत में ही पीते हैं।

दिल्ली ही क्यों, इधर मध्यप्रदेश सरकार भी अपनी आय बढ़ाने के लिए शराब के प्यालों में संभावनाएं तलाश रही है। पिछली कमलनाथ सरकार ने तो आबकारी आय बढ़ाने के लिए नई नीति की घोषणा भी कर दी थी, जिसके तहत दारू की घर पहुंच सेवा, शराब की उप दुकानें खोलना, ऑन लाइन शराब डिलीवरी, महिलाओं को शराब विक्रय का अवसर देना जैसे कई नवाचारी कदम शामिल थे। क्योंकि लक्ष्य शराब से सालाना 13 हजार करोड़ रुपये जुटाने का था। इस नीति के क्रियान्वयन को लेकर सरकार में अभी भी ऊहापोह चल रही है।

ताजा खबर यह है ‍कि मप्र सरकार ने राज्य में बार रेस्टोरेंट, क्लब आदि रात 2 बजे तक खुले रखने की इजाजत दे दी है। बस इसके‍ लिए ज्यादा फीस देनी होगी। यह एक तरह से राज्य में नाइट लाइफ को मान्यता देने जैसा है। दूसरी तरफ प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने राज्य में शराबबंदी लागू करने की मांग शुरू कर दी है, जिसे मानना पहले ही भारी कर्जे में डूबी सरकार के लिए बहुत मुश्किल है। यह भी विडंबना है कि शराबी इंसान पीने के लिए कर्ज में डूबता चला जाता है जबकि सरकारें कर्ज चुकाने के लिए शराब को आम-ओ-खास के लिए सुलभ बनाने की कोशिश में मरी जाती हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा पैसा आए।

शराबबंदी लागू करना सामाजिक दृष्टि से भले हितकारी निर्णय हो, लेकिन राजसत्ताओं के लिए वह नैतिक प्रश्न अब नहीं रह गया है। यह मान लिया गया है कि जनता को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं देने के लिए भी सरकारों को पैसा चाहिए और यह पैसा शराब की बोतलों से बड़ी आसानी से निकलता है। और देश में शराब की खपत लगातार बढ़ती जा रही है। इस मामले में शराब से एक कदम आगे केवल पेट्रोल डीजल हैं, जो अभी भी सरकारों के बड़े आर्थिक स्रोत बने हुए हैं।

बहुत से जानकारो का मानना है कि केजरीवाल सरकार का यह फैसला देश में ‘शराब पीने की कानूनी उम्र के एकीकरण’ की दिशा में बड़ा कदम है। तर्क वही कि जब 18 बरस की उम्र में व्यक्ति बालिग होकर राजसत्ता के भाग्य का फैसला कर सकता है तो उसे शराब पीने का कानूनी हक देने में क्या दिक्कत है? जब देश में ‘हर चीज का एकीकरण’ हो रहा है या उस दिशा में ठोस कदम उठाए जा रहे हैं तो इसे पेंडिंग क्यों रखा जाए? देश के सभी राज्यों में शराबखोरी की न्यूनतम आयु एक-सी होगी तो पीने वालों, शराब बेचने वालों और उससे टैक्स उगाही करने वालों की भी बल्ले बल्ले होगी। मुमकिन है कि जिन चंद राज्यों में शराबबंदी लागू है, वो भी कल को अपने निर्णय पर पुनर्विचार के लिए बाध्य हों। कुलमिलाकर ‘एक भारत, मदिरापान न्यूनतम आयु सेम भारत..!’(मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं।
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