राकेश दीवान 

कमाल है, चार महीने पहले आए सुप्रीम कोर्ट के एक ऐसे फैसले ने ‘एनजीओ’ (नॉन गवर्न्मेंटल ऑर्गेनाइजेशन, गैर-सरकारी संगठन) जमात में कोई खलबली पैदा नहीं की जिसमें पहली बार अदालत ने उन प्रतिबंधों को खारिज कर दिया था जिनके मुताबिक कोई ‘एनजीओ’ राजनीतिक गतिविधियों में भाग नहीं ले सकते थे। मानवाधिकार आंदोलनों में भी शिरकत करने की छूट देते हुए न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की खंडपीठ के इस फैसले में कहा गया है कि देशी-विदेश दान लेने, न लेने का इस फैसले के क्रियान्वयन पर किसी तरह का, कोई असर नहीं पडेगा।

एक ‘एनजीओ’ ‘इंडियन सोशल एक्शन फोरम’ (इंसॉफ) की याचिका का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल मार्च की छह तारीख को ‘विदेशी अंशदान विनियमन कानून-2010’ (एफसीआरए) की कई धाराओं को संविधान के विभिन्न प्रावधानों के विपरीत पाया था और उन्हें  खारिज कर दिया था। बात-बात पर जरूरी, गैर-जरूरी पुस्तिकाएं, प्रचार-सामग्री छापने को उतारू विशालकाय ‘एनजीओ’ से लगाकर मामूली अनुदान लेकर किसी तरह कठिन समाजसेवा के मिशन को पूरा करने में लगे ‘एनजीओ’ तक, किसी ने भी बड़ी अदालत के इस फैसले को लेकर, कोई अच्छी-बुरी प्रतिक्रियाएं नहीं दीं।

तो क्या यह चुप्पी सोच-समझकर, अपनी राजनीति के तहत लगाई गई थी? या फिर देशभर की ‘एनजीओ’ जमात ने राजनीति को सचमुच तिलांजलि दे दी है? इस फैसले पर जनांदोलनों और वाम-राजनीति के वरिष्ठ नेताओं ने टिप्पणियां जरूर की थीं। तो क्या ‘एनजीओ’ और जनांदोलन दो भिन्न समझ, तेवर और उद्देश्यों वाली इकाइयां हैं?

इन सवालों पर गहराई से विचार करने के पहले ‘एनजीओ’ की पहचान रखने वालों के बारे में थोडा-बहुत जान लेना चाहिए। जैसा कि हम सबको पता है कि किसी भी लोकतंत्र में बदलाव की धुरी सत्ता यानि ‘पक्ष’ और उसकी समीक्षा या विरोध करने वाले ‘विपक्ष’ के हाथों में होती है। इसके अलावा समाज के बदलाव के स्थानीय, बुनियादी और ‘निचले’ स्तर पर एक तीसरी ताकत नागरिकों की भी होती है। आमतौर पर ‘सत्ता,’ ‘विपक्ष’ और सरकार से परे नागरिकों के गठबन्धन से बनती इस ताकत को विनोबा ‘सज्ज‍न शक्ति’ कहा करते थे।

भारत में आजादी के आंदोलन से ही देखें तो कई नागरिक समूह आंदोलन से इतर, जनता की सेवा में लगे थे। महात्मा गांधी की पहल पर हरिजन सेवा, खादी, अछूतोद्धार, वनवासी सेवा, कुष्ठरोगियों की सेवा, इलाज आदि की मार्फत देश की आम, वंचित आबादी की सेवा करने के लिए ऐसे अनेक नागरिक समूह गठित हुए थे, लेकिन इन ईमानदार प्रयासों के बावजूद वंचितों के हालात में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हो पा रहा था।

वजह थी, बदहाली की जड़ों तक नहीं पहुंच पाना। ‘सेवा’ गरीबों, वंचितों को तात्कालिक राहत तो मुहैय्या करवा सकती है, लेकिन उनकी बुनियादी परिस्थितियों में कोई बदलाव नहीं कर पाती। यह लगभग ऐसा ही है जैसे बार-बार होने वाले मलेरिया के इलाज के लिए बार-बार कुनैन की गोली दी जाती रहे, लेकिन मलेरिया की मूल वजह मच्छर को खत्म करने के कोई उपाय नहीं हों।

समाज की ‘सेवा’ में लगे गैर-सरकारी लोगों के काम की इस सीमा ने गरीबों के ‘विकास’ का एक नया आयाम खोला। आजादी के बाद 50-60 के दशकों में गरीबों, वंचितों को विकास की तालीम और उसे कर पाने की जरूरी सहायता उपलब्ध करवाई जाने लगी। उस जमाने में कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि के क्षेत्रों में विकास के तरह-तरह के काम शुरू किए गए, लेकिन वर्गों और जातियों में विभाजित हमारे समाज में विकास के नतीजे गरीबों की बजाए समाज में ऊंचाई पर विराजे सम्पन्नों की तिजोरियों में जाने लगे।

जाहिर है, ‘विकास’ एक नारा भर बनकर रह गया और उससे गरीबी हटने की बजाए अमीरी में इजाफा होने लगा। साठ के दशक की ‘हरित क्रांति’ इसका एक उदाहरण है, जिसमें भारी लागत और लाभ की खेती के मॉडल ने ग्रामीण अमीरी और गरीबी को एक साथ बढावा दिया। यही दौर है जिसमें आजादी की लडाई में देखे, दिखाए गए सपने चकनाचूर हुए थे और नतीजे में साठ के दशक के अंत और सत्तर की शुरुआत में नक्सलबाडी आंदोलन पनपा, फैला और कई राज्यों में प्रभावी भी हुआ था।

गैर-सरकारी समूहों के विचार और व्यवहार की इस रुकावट ने सत्तर का दशक आते-आते उन्हें एक बार फिर अपने काम के तौर-तरीके बदलने पर मजबूर कर दिया। इस दौर में तत्कालीन सामाजिक ताने-बाने में अंतर्निहित गैर-बराबरी और संसाधनों के अन्यायपूर्ण वितरण की समझ विकसित की गई। सत्तर, अस्सी के दशकों में देशभर में ‘राजनीतिक प्रशिक्षण’ एक नारा उभरा। इसी जमाने में अनेक गैर-दलीय राजनीतिक समूह उभरे और उन्होंने समाज में अन्याय, गरीबी, मानवाधिकारों के हनन, महिलाओं, आदिवासियों की अहमियत और पर्यावरण जैसे मसलों की समझ बनाई।

गौरतलब है कि यही वह दौर था जब गुजरात में रविशंकर महाराज और बिहार में जयप्रकाश नारायण जैसे गैर-दलीय राजनेताओं की अगुआई में आजादी के बाद के सबसे बडे और प्रभावी जनांदोलन हुए और उनके दमन के लिए पहली बार आपातकाल लगाया गया। सत्तर के इसी दशक में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार भी बनी थी। यही वह दौर भी था जिसमें गैर-दलीय राजनीतिक समूहों ने अपनी-अपनी समझ और जरूरतों, मुद्दों के आधार पर देशभर में जगह-जगह प्रतिकार के आंदोलन छेडना शुरू किया था। ख्यात समाजशास्त्री प्रोफेसर रजनी कोठारी द्वारा मानी गई इस ‘गैर-दलीय राजनीति’ ने अस्सी के दशक में नर्मदा घाटी के ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन,’ उत्तराखंड के ‘चिपको आंदोलन,’ बिहार में जमीन के मुद्दे पर खड़े हुए ‘बोधगया आंदोलन,’ केरल के ‘साइलेंट वैली’ जैसे प्रतिकार, आंदोलन खडे किए।

‘सेवा,’ ‘विकास,’ ‘राजनीतिक प्रशिक्षण’ और ‘गैर-दलीय राजनीति’ के इन विभिन्न सोपानों से गुजरे और मौजूदा भेडियाधसान में ‘एनजीओ’ पुकारे जाने वाले इन व्यक्तियों, समूहों के बीच समझ, तेवर और उद्देश्यों को लेकर गहरी भिन्नता रही है। अव्वल तो, परिभाषा से ‘एनजीओ’ ‘राज्य’ का विस्तार है। यानि जो काम ‘एनजीओ’ करता या कर सकता है, वह कोई भी आम, अच्छा, ईमानदार अधिकारी, अपनी सत्ता और संसाधनों के बल पर आसानी से निपटा सकता है। ‘एनजीओ’ की यह भूमिका तत्काल राहत, सेवा और सहायता के मौकों पर बेहद जरूरी और कारगर होती है।

हाल का उदाहरण है जब मजदूरों की ‘घर-वापसी’ के दौरान अनेक ‘एनजीओ’ उनकी जरूरी मदद करते रहे। अलबत्ता, वे कभी यह सवाल नहीं उठा पाए कि आखिर इतने बड़े जबरिया पलायन की वजह और जरूरत क्या थी? या ‘घर वापस’ लौटकर मजदूर क्या करेंगे? ‘मनरेगा’ को लेकर एक स्वतंत्र संगठन की जरूरत बरसों से महसूस की जा रही है, लेकिन ‘एनजीओ’ बिरादरी खुद को इससे दूर ही रखती रही। कभी-कभार दानदाताओं के दबाव, तीखी असहमति और ‘राइट्स-मोड’ के चलते ‘राज्य’ या सत्ता का विरोध जरूर होता है, लेकिन वह आपस की ‘नूरा-कुश्ती‘ से अधिक नहीं होता।

दूसरी तरफ, ‘गैर-दलीय राजनीतिक संगठन’ लगातार ‘राज्य’ की समीक्षा और जरूरत पडने पर विरोध में जुटते हैं। आजादी के बाद बुनियादी मुद्दों को लेकर जितने जनांदोलन हुए हैं उनमें वामपंथी, समाजवादी पार्टियों के अलावा ‘गैर-दलीय राजनीतिक संगठन’ ही प्रमुखता से सामने आए हैं। ‘एनजीओ’ की राजनीति से बेजारी की एक वजह, जैसा कि ‘ऑक्सफैम (इंडिया)’ के ‘मुख्य कार्यकारी अधिकारी’ अमिताभ बेहार ने भी बताया है,  भूमंडलीकरण की शुरुआत के सालों में भरपूर बढ़ी, फली-फूली, देशी-विदेशी ‘फंडिंग’ है।

हालांकि खुद ‘फंडिंग’ की भी अपनी असरदार राजनीति है। एक तरफ ‘फंडिंग’ संस्थाओं को इतना भारी-भरकम बना देती है कि उन्हें ‘चलाए’ रखने में अच्छा-खासा समय और संसाधन खर्च हो जाता है। नतीजे में वैचारिक तैयारी, सैद्धांतिक पहल और आपसी समीक्षा आदि के लिए समय ही नहीं बचता। दूसरी तरफ, अबाध ‘फंडिंग’ की मजबूरी के चलते सत्ता और सरकारों से पंगा लेने में संकोच होता है। सब जानते हैं कि सरकारों से नाराजी का मतलब कई बार ‘फंडिंग’ की रुकावट भी होता है। ऐसे में कभी, किसी से, किसी तरह के सवाल पूछने की भोंथरी पड़ती आदत की बजाए ‘पेशेवराना’ तरीकों यानि मिल-जुलकर काम निकालने की पद्धति का उपयोग किया जाता है।

कुल मिलाकर राजनीति से ‘एनजीओ’ जमात की इस विमुखता ने एक बड़े सामाजिक, राजनीतिक संकट को बढ़ाने में हाथ बंटाया है। राजनीति से मुंह-बिचकाने के नतीजे में ऐसे साम्प्रदायिक, कठमुल्ले और बुद्धिहीन तत्वों ने राजनीति पर कब्जा जमा लिया है जिनकी उदार लोकतंत्र में सीमित जगह होनी चाहिए। जाहिर है, राज, समाज और सत्ता की मौजूदा बदहाली सामाज में सक्रिय होने का दावा करने वाले उन निष्क्रिय लोगों की वजह से भी हुई है, जो राजनीति को मौका पाते ही धक्का मारने पर उतारू हो जाते हैं।