स्मृति शेष

राकेश अचल

जिंदगी में अच्छे लोगों से मिलना कम ही होता है। डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी का भला हो कि उन्होंने कुछ साल पहले एक बेहतरीन दोस्त के बारे में एक पत्रिका में ऐसा लेख लिखा कि मैं डॉ. अंजनी चौहान को तलाशता हुआ उनके अस्पताल में जा पहुंचा। डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी ने अपने कालेज के समय के इस दोस्त के बारे में जब आलेख लिखा था, तब वे पद्मश्री नहीं हुए थे। मेरे प्रिय प्रो. प्रकाश दीक्षित की वजह से मुझे डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी का डॉ. अंजनी के बारे में लिखा लेख पढ़ने का मौका मिला था।

भोपाल आना-जाना मेरे लिए एक नियमित कर्म था, डॉ. चतुर्वेदी ने डॉ. अंजनी के बारे में कुछ इस तरह से लिखा था कि मैं चौहान साहब से मिलने के लिए अकुला उठा। अपने तमाम सूत्र खंगाले और डॉ. अंजनी चौहान का मोबाइल नंबर हासिल किया। बात की तो लगा कि जैसे वे डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी के नहीं मेरे बचपन के दोस्त हैं। बोले-‘’जब भोपाल आओ तब सीधे अस्पताल आ जाना।‘’ और हुआ भी यही। एक दिन मैं भोपाल में उनसे सरकारी अस्पताल में ही मिलने जा धमका। पूछते-पाछते उनके चैंबर तक गया तो वे अस्पताल कि परिक्रमा पर थे। कुछ ही देर में झूमते हुए प्रकट हो गए।

डॉ. अंजनी चौहान डॉक्टरों वाली पोशाक में थे यानि उन्होंने एप्रिन पहन रखा था। आँखों पर धूप का काला चश्मा, मुंह में पान-तम्बाखू की पूरी खुराक और सर का एक-एक बाल रंगा-पुता देखकर मैं चकित था। डॉक्टर साहब ने अपने कक्ष के फ्रिज में रखी शीशी से एक शर्बत निकाला, पिलाया, खुद पिया और शुरू हो गए। उनसे बातचीत में बुंदेली की गमक ने मुझे और सहज कर दिया। मजे की बात ये कि तब से अब तक जब भी भोपाल गया विद्यानगर में डॉ. अंजनी से मिले बिना नहीं लौटा। वे घर में सपत्नीक रहते थे। बेटा दूसरे प्रदेश में नौकरी पर था, बड़ा सा घर और केवल दो प्राणी फिर भी वे चहकते ही रहते थे। हर बार खुद अपने हाथ से चाय बनाकर पिलाते थे।

सेवानिवृत्त होने के बाद उनका पुराना व्यंग्य लेखक पुनर्जीवित होने के लिए अकुला रहा था। उन्होंने समय बिताने के लिए अपना प्रकाशन संस्थान भी जीवित कर लिया था। वे बड़े शौक से अपने जिगरी मित्र डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी की पहली पुस्तक के प्रकाशन का सुख आपस में बांटते थे। वे डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी को प्यार से ज्ञानू कहते थे। मेडिकल की पढ़ाई के दिनों में वे डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी से सीनियर थे, लेकिन उन्होंने ज्ञान चतुर्वेदी की तरह खुद को कभी गंभीरता से एक व्यंग्य लेखक के रूप में लिया नहीं।

एक जमाना था जब डॉ. अंजनी मोटर साइकल से रीवा टू इलाहाबाद ऐसे जाते थे जैसे कोई पान खाने बगल के बाजार में जा रहा हो। स्वभाव से अख्खड़ और निडर डॉ. अंजनी यदि सरकारी नौकरी में जाकर लापरवाही न बरतते तो तय मानिये कि पद्मश्री उनके हिस्से में भी आती। उन्‍होंने सरकारी नौकरी में आने के बाद व्यंग्य लेखन को समय दिया ही नहीं, हाँ उनके जीवन से व्यंग्य आखिर तक मरा भी नहीं। बुढ़ापा भी ऐसा नहीं था लेकिन अकेलापन और अर्धांगनी की बीमारी उन्हें परेशान भी करती थी और उनकी एकाग्रता को भंग भी करती थी। वे व्यंग्य के लिए बहुत कुछ करने के लिए व्यग्र थे। मेरी पहली किताब ‘खबरों का खुलासा’ का पुन: प्रकाशन करना चाहते थे। मेरी गजलों के मुरीद थे। हम घण्टों गप्पें मारते। ‘हरि अनंत, हरि कथा अनंता’ की तरह उनकी गप्पों का अंत नहीं था।

उनके हर संस्मरण में ज्ञानू (डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी) और प्रभु (प्रभु जोशी) मौजूद होते थे। वे मुझे डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी से मिलवाना चाहते थे लेकिन मेरा दुर्भाग्य कि ऐसा हो नहीं सका। प्रभु जोशी से उन्होंने फोन पर मेरी बात कराई थी लेकिन वे भी असमय साथ छोड़कर चले गए। पिछले कुछ दिनों से वे फेसबुक पर अपने बुझे-बुझे से फोटो लगा रहे थे, मैंने उनसे फोन कर ऐसा न करने के लिए कहा भी था लेकिन वे हंसकर रह गए। उन्हें अभी जाना नहीं चाहिए था। मैं तो उनके प्रति अगाध श्रद्धा से भरा ही रहता था, अब उनके प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए बेहद दुखी हूँ। अब भोपाल में मेरा एक और अड्डा उजड़ गया है।