एक हद अनुशासन की भी होती है इसका ध्‍यान कौन रखेगा?

मध्‍यप्रदेश ने अपने यहां पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कुछ समय पहले एक धुंआधार प्रचार अभियान चलाया था जिसकी टैग लाइन थी- एमपी गजब है सबसे अजब है लेकिन मध्‍यप्रदेश के अजब और गजबहोने की यह तासीर केवल पर्यटन के क्षेत्र में ही नहीं, हर क्षेत्र में दिखाई देती है। यहां की राजनीति अजब-गजब है, यहां की नौकरशाही अजब-गजब है…

इस अजब-गजब तासीर का एक किस्‍सा गुरुवार को राज्‍य मंत्रालय में दिखाई दिया। मौका था जमीनी स्‍तर पर सरकारी योजनाओं और जनकल्‍याणकारी कार्यक्रमों का लेखा जोखा लेने वाले कार्यक्रम ‘परख’ के तहत रखी गई वीडियो कान्‍फ्रेंसिंग का। परख के तहत आमतौर पर मुख्‍यमंत्री अफसरों से मैदानी स्‍तर का फीडबैक लेते हैं और यदि वे उपलब्‍ध न हों तो यह काम मुख्‍य सचिव करते हैं।

गुरुवार को मुख्‍य सचिव ने परख के तहत मैदानी अफसरों की वीडियो कान्‍फ्रेंसिंग ली। लेकिन इससे पहले जो हुआ वह गजब था। जैसे ही मुख्‍य सचिव बसंत प्रताप सिंह परख कार्यक्रम के लिए पहुंचे तो उन्हें सीट पर ज्‍यादातर कलेक्‍टर नादरद मिले। यह देखकर मुख्य सचिव को भी आश्चर्य हुआ। उन्होंने स्क्रीन पर दिख रहे एक जिले के डिप्टी कलेक्टर से पूछा कि तुम ही बता दो, सब कहां हैं?

मुख्‍य सचिव को बताया गया कि ग्रामीण विकास विभाग के एसीएस राधेश्याम जुलानिया सभी कलेक्टर की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग ले रहे हैं। और सारे कलेक्‍टर उसी वीडियो कान्‍फ्रेंसिंग में हैं। यह सुनकर मुख्य सचिव तमतमा गए। उन्होंने कहा कि अच्छी बात है कि आप लोग ग्रामीण विकास को इतना महत्व दे रहे हो,लेकिन जब मैंने परख कार्यक्रम बुलाया था तो क्या वहां जिला पंचायत सीईओ को नहीं भेज सकते थे?

इतनी देर में कुछ कलेक्टर मुख्‍य सचिव की वीडियो कान्‍फ्रेंसिंग में पहुंच गए। वहां मुख्य सचिव ने कलेक्टर्स से जो सवाल किया उस पर ध्‍यान देने की जरूरत है। उन्‍होंने पूछा मुझसे ज्यादा जुलानिया से डर लगता है क्या?’ आज के बाद ऐसा हुआ तो सख्त कार्रवाई करूंगा। बताते हैं कि मुख्य सचिव की नाराजगी का पता चलने के बाद अतिरिक्‍त मुख्‍य सचिव राधेश्याम जुलानिया भी बैठक में पहुंचे, हालांकि मुख्य सचिव ने उनसे इस बारे में कोई बात नहीं की।

उसके बाद जो माहौल बिगड़ा तो उसका असर अंत तक दिखाई दिया। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की शुरुआत भी मुख्य सचिव की डांट से हुई और उसका अंत भी डांट से ही हुआ। बैठक खत्म होते होते सिंगरौली कलेक्टर अनुराग चौधरी ने कहा कि जिले में अपर कलेक्टर का एक पद खाली है। यह सुनते ही मुख्य सचिव का पारा चढ़ गया उन्‍होंने कुर्सी से उठकर कलेक्टर को डांट लगाई।

मुख्य सचिव ने कहा कि यह बात परख में करने की नहीं है। पूरे प्रदेश में तहसीलदार से लेकर कई बड़े पद खाली हैं, फिर भी काम हो रहा है। कई कलेक्टर मुझे अपर कलेक्टर को हटाने का कह चुके हैं, तुम कहो तो उन्हें भेज दूं। फिर मत कहना कि सर, किसे भेज दिया। इसके बाद अनुराग चौधरी ने मुख्य सचिव से माफी भी मांगी।

लेकिन यहां मुद्दा परख कार्यक्रम के दौरान हुई अन्‍य बातों का नहीं बल्कि मुख्‍य सचिव के उस सवाल का है जो उन्‍होंने एसीएस राधेश्‍याम जुलानिया को लेकर कलेक्‍टरों से पूछा। वह सवाल बताता है कि मध्‍यप्रदेश में नौकरशाही के क्‍या हाल हैं। और बड़े एवं छोटे अथवा प्रभारी एवं मातहत अधिकारियों के बीच तालमेल की क्‍या स्थिति है।

मुख्‍य सचिव तो सवाल करके रह गए, लेकिन एक मुद्दा छोड़ गए कि क्‍या प्रदेश की नौकरशाही में अनुशासन जैसी कोई चीज बची है या नहीं? क्‍या नौकरशाही केवल डंडे या डांट फटकार की भाषा ही सुनने या उससे चमकने की आदी हो गई है? क्‍या प्रदेश में सौम्‍य और शालीन व्‍यवहार की कोई कीमत नहीं बची है?

ऐसा हो ही नहीं सकता कि एसीएस राधेश्‍याम जुलानिया को यह पता न हो कि आज ही मुख्‍य सचिव की परख कार्यक्रम के तहत वीडियो कान्‍फ्रेंसिंग भी है। उन्‍हें यह भी मालूम रहा होगा कि उस कार्यक्रम में सारे कलेक्‍टरों को मौजूद रहना है। लेकिन इसके बावजूद वे अपने विभाग की वीडियो कान्‍फ्रेंसिंग में कलेक्‍टरों को उलझाए रहे।

क्‍या थोड़े से सामंजस्‍य के साथ दोनों बैठकों के समय में अंतर नहीं रखा जा सकता था?  और यदि एसीएस जुलानिया ने अपने ग्रामीण विकास विभाग की वीडियो कान्‍फ्रेंसिंग बुला भी ली थी तो क्‍या यह उनका दायित्‍व नहीं था कि वे कलेक्‍टरों को सीएस की वीडियो कान्‍फ्रेंस के पहले मुक्‍त कर देते ताकि वे वहां अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकें।

लेकिन ऐसा लगता है कि मध्‍यप्रदेश में कुछ अफसरों ने अपनी हेकड़ी को कुछ ज्‍यादा ही ऊंचा कर लिया है। उन्‍हें न अपने मातहतों की परवाह है और न वरिष्‍ठों की। बेशक जुलानिया सख्‍त अनुशासन में काम करने और करवाने वाले और परिणाम देने वाले अफसर हैं लेकिन उनका व्‍यवहार कई बार अनुशासन और सामान्‍य शिष्‍टाचार की हदों को भी पार कर जाता है।

अभी कुछ ही दिन पहले की बात है जुलानिया ने विधानसभा के बजट सत्र के दौरान पंचायती राज आयुक्‍त संतोष मिश्रा को जमकर डांट पिलाई थी। हालत यह हो गई थी कि उसके बाद मिश्रा की तबियत खराब हो गई और उन्‍हें अस्‍पताल ले जाना पड़ा। इसी तरह पिछले साल आईएएस मीट के दौरान उन्‍होंने खाना खा रहे बड़वानी कलेक्‍टर तेजस्‍वी नायक से पूछ लिया था कि यहां क्‍या खाना खाने आए हो? और उसके बाद नायक को खाना छोड़कर उठना पड़ा था।

दरअसल इन सारे ‘लूज स्‍क्रू’ को टाइट करने का काम राजनीतिक नेतृत्‍व का है। कोई भी अफसर चाहे वह कितना ही काम करने वाला या चहेता क्‍यों न हो, उसे अनुशासन की हदों से बाहर जाने की इजाजत कैसे दी जा सकती है। लेकिन फिलहाल तो ऐसा ही होता दिखाई दे रहा है।

 

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here