अजय बोकिल

बिहार चुनाव के बाद भाजपा का अगला लक्ष्य बंगाल फतह है, लेकिन विश्व का सबसे बड़ा राजनीतिक दल होने का दावा करने वाली यह पार्टी दक्षिण में क्या कर रही है, इस तरफ देश का ध्यान बहुत कम है। दक्षिण के राज्यों में भाजपा की सबसे न्यून उपस्थिति तमिलनाडु में है। वहां भी अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। अभी तक भाजपा कभी डीएमके तो कभी एआईएडीएमके का पल्ला पकड़कर आगे बढ़ने की कोशिश करती रही है। लेकिन अब उसके इरादे बदल रहे हैं। भाजपा तमिलनाडु में यह दिवाली ‘वेत्री वेल यात्रा’ के रूप में मना रही है। कहने को यह ‘आध्यात्मिक-धार्मिक यात्रा’ है। लेकिन इस यात्रा के राजनीतिक उद्देश्यो को भांपकर तमिलनाडु की एआईएडीएमके सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया है।

यह मामला मद्रास हाईकोर्ट भी पहुंचा। जहां सरकार ने कहा कि उसे इस यात्रा में ‘धार्मिक’ कुछ भी नहीं दिखाई देता। कोर्ट ने कोरोना काल में यह यात्रा निकालने पर भाजपा को फटकार भी लगाई। इसके बावजूद पार्टी प्रदेशाध्यक्ष एल. मुरुगन (ये भी मुरुगन हैं) इस आधार पर यात्रा जारी रखे हुए हैं क्योंकि ‘स्वयं भगवान मुरुगन का ऐसा आदेश है।‘ कानून तोड़ने के आरोप में पुलिस ने कई बार उन्हें गिरफ्‍तार भी किया।

एआईएडीएमके भाजपा की सहयोगी पार्टी है। भाजपा को भरोसा है कि एक माह तक चलने वाली यह धार्मिक यात्रा आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी को खासा राजनीतिक डिविडेंड देगी। भाजपा की यह यात्रा इस बात का भी साफ संकेत है कि शेष भारत में चला मर्यादा पुरुषोत्तम राम का भावनात्मक कार्ड तमिलनाडु में बेअसर है। तमिल राम को भगवान तो मानते हैं, पर उस रूप में नहीं, जिस रूप में वो भगवान मुरुगन को मानते हैं।

भगवान मुरुगन की 6 अधिष्ठानों (निवास) की यात्रा तमिलनाडु का महत्वपूर्ण धार्मिक इवेंट है। खासकर ओबीसी और दलितों में मुरुगन के प्रति अगाध श्रद्धा है। यकीनन इस यात्रा से बीजेपी का द्रविड़ पार्टियों के साथ पंगा बढ़ेगा। द्रविड़ पार्टियां भी भाजपा के इस नए ‘यात्रा कार्ड’ से चौकन्नी हो गई हैं। बीजेपी का ये दांव तमिलनाडु में राजनीतिक दृष्टि से कामयाब होता है या नहीं, देखने की बात है।

पहले भगवान मुरुगन के बारे में। मुरुगन दरअसल शिव पु‍त्र कार्तिकेय का ही तमिल नाम है। ऋग्वेद में उनका उल्लेख स्कंद के रूप में है। उन्हें तमिलभूमि का रक्षक भी माना जाता है। कहते हैं कि ब्रह्मांड की परिक्रमा की दौड़ में भाई गणेश से हार जाने के बाद कार्तिकेय तमिलनाडु चले आए थे। वो एक तरह से तमिल संस्कृति के आदि देवता हैं। उन्हें ‘युद्ध का देवता’ भी माना जाता है। शैव अय्यर ब्राह्मण भी उन्हें पूजते हैं।

तमिलनाडु में हर साल तमिल पंचांग के थाई माह (जनवरी-फरवरी के बीच) में ‘अरुप्पदई वीरू यात्रा’ का आयोजन होता है। इसके तहत भक्तगण लाखों की संख्‍या में पैदल ही नंगे पैर भगवान मुरुगन के मंदिरों में दर्शन के लिए पहुंचते हैं। तमिल साहित्य में भगवान मुरुगन का उल्लेख ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी से मिलता है। तमिलनाडु में भाजपा को मोटे तौर पर हिंदी पट्टी की और आर्य संस्कृति समर्थक पार्टी माना जाता है। द्रविड पार्टियां तो उसे ब्राह्मणवादी पार्टी ही बताती हैं।

तमिलनाडु में बीते पांच दशकों से द्रविड़ संस्कृति पोषक पार्टियां ही सत्ता में हैं। तमिल अस्मिता के अपने अडिग आग्रह में उन्होंने लोक लुभावन योजनाओं का तड़का भी लगा रखा है। ऐसे में वहां किसी तीसरी राष्ट्रीय चरित्र और सोच वाली पार्टी की गुंजाइश नहीं बन पा रही है। इस राजनीतिक गतिरोध को तोड़ने भाजपा और आरएसएस की कोशिशें वहां काफी समय से चल रही हैं। बावजूद इसके भाजपा का वोट ज्यादा नहीं बढ़ सका है।

2014 के लोकसभा चुनाव ने भाजपा ने मोदी लहर में 5.56 फीसदी वोट लेकर 1 सीट भी जीत ली थी। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में यही वोट घटकर 3.66 फीसदी रह गया। इसके पूर्व 2016 के विधानसभा चुनाव में पार्टी 134 सीटों पर लड़ी थी, लेकिन वोट उसे मात्र 2.8 फीसदी ही मिले थे। केन्द्र में मोदी सरकार के दूसरी बार सत्ता में लौटने के बाद भाजपा अपने राजनीतिक अश्वमेध यज्ञ का विस्तार तमिलनाडु तक करना चाहती है। इसीका परिणाम है कि वह सहयोगी एआईएडीएमके से भी पंगा लेने से नहीं चूक रही है।

इस तरह का पहला विवाद पिछले दिनों विनयार चतुर्थी (गणेश चतुर्थी) पर गणेश प्रतिमा विसर्जन पर लगी रोक के विरोध को लेकर हुआ। राज्य की ई. पलानीसामी सरकार द्वारा प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों की 7.5 फीसदी सीटें सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए आरक्षित करने के बिल को राज्यपाल ने अटका दिया था। यही नहीं, राम मंदिर‍ शिलान्यास को लेकर देश के अधिकांश हिस्सों में जैसा उत्साह था, वैसा तमिलनाडु में नहीं था। ऐसे में भाजपा को समझ आ गया कि तमिलनाडु में पैर जमाने के लिए स्थानीय प्रतीकों और आस्‍था केन्द्रों को लेकर ही आगे बढ़ना होगा। ‘वेत्री वेल यात्रा’ उसी का नतीजा है।

तमिल में ‘वेत्री वेल’ का अर्थ है ‘विजयी भाला।’ भाला भगवान मुरुगन का मुख्य अस्त्र है, जिससे वो असुरों का संहार करते हैं। भाजपा की यह यात्रा 6 नवंबर को थिरुवल्लूर जिले में स्थित थिरुत्तानी मुरुगन मंदिर से प्रारंभ हुई है। इसका समापन 6 दिसंबर को तूतुक्कुडी जिले में स्थित थिरुचेंदूर मुरुगन मंदिर में होगा। ध्यान रहे कि यह तारीख बाबरी मस्जिद ध्वंस की भी है। इस यात्रा में तमिलनाडु बीजेपी अध्यक्ष एल. मुरुगन हाथ में भाला लिए रथ पर निकले हैं। साथ में भाजपा के सौ कार्यकर्ता भी चल रहे हैं। भाजपा के मुताबिक यात्रा का मकसद तमिलनाडु में ‘हिंदू विरोधी’ नरेटिव और ‘अल्पसंख्यक तुष्टिकरण’ को बेनकाब करना है।

बताया जाता है कि शुरुआत में यात्रा को बहुत ज्यादा प्रतिसाद नहीं है। द्रविड़ पार्टियां इसका विरोध तो कर रही हैं, लेकिन सतर्कता के साथ। क्योंकि उनके अधिकांश समर्थकों के आराध्य भगवान मुरुगन ही हैं। द्रविड़ राजनीति की दृष्टि से भी भगवान मुरुगन का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि डीएमके के दिग्गज नेता स्व. के.करुणानिधि ने 1982 में मदुराई से थिरुचेंदुर (मुरुगन मंदिर) तक ऐसा ही लांग मार्च एआईएडीएमके तत्कालीन मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन के जमाने में निकाला था। तब उसका मकसद थिरुचेंदूर मंदिर के एक अधिकारी की संदिग्ध मौत पर परिजनों को न्याय दिलाना तथा भगवान मुरुगन के भाले में जड़ा हीरा गायब होने की जांच की मांग करना था।

सवाल यह है कि क्या यह ‘विजयी भाला यात्रा’ तमिल राजनीति को भाजपा के पक्ष में वेध पाएगी? क्योंकि अभी तक देश के बाकी हिस्सों में भाजपा के आराध्य धनुर्धारी राम ही रहे हैं। इस प्रश्न पर लोगों की दो अलग-अलग राय हैं। पहले के मुताबिक तमिल जनता में इसका राजनीतिक असर होने में बहुत समय लगेगा। क्योंकि वहां द्रविड़ पार्टियां गैर ब्राह्मण तमिल समाज में आर्य विरोध, हिंदी विरोध तथा तमिल अस्मिता की रक्षा के मुददों को लेकर जनता में गहरी पैठ बनाए हुए हैं।

मुख्य राजनीतिक प्रति‍द्वंद्वी डीएमके और एआईएडीएमके में कोई वैचारिक फर्क नहीं है। है तो केवल व्यक्ति निष्ठा का। ऐसे में ‘हिंदुत्व की संकल्पना से प्रेरित भाजपा जैसी पार्टी के लिए सियासी जमीन बनाना आसान नहीं है। दूसरा विचार यह है कि तमिल जनता अब इन द्रविड़ पार्टियों के शासन से ऊब कर किसी नए राजनीतिक विकल्प की तलाश में हैं। ऐसे में भाजपा की सभी हिंदुओं को एकसूत्र में बांधने, विकास और मुस्लिम तुष्टीकरण विरोधी राजनीति, तमिलों को आकर्षित कर सकती है।

अर्थात भाजपा उस राजनीतिक स्पेस को हथियाना चाहती है, जो तमिलों की नई पीढ़ी की आकांक्षा और जरूरतों से उपज रहा है। बहुत से युवा रोजगार की तलाश में तमिलनाडु से बाहर निकल रहे हैं और उन्हें समझ आ रहा है कि तमिल केन्द्रित रहकर प्रगति की राह पर ज्यादा आगे नहीं बढ़ा जा सकता। शायद इसीलिए सोशल डिस्टेंसिंग की चेतावनियों के बीच भी भाजपा अपनी ‘वेत्री वेल’ यात्रा पूरी करने पर अड़ी है। राजनीतिक प्रेक्षक इसे तमिल हिंदुओं के ध्रुवीकरण की कोशिश के रूप में देख रहे हैं तो कुछ के मुताबिक यह तमिलनाडु की राजनीति में पैठ बनाने भाजपा का ‘राजनीतिक-आध्यात्मिक पुनर्जागरण’ है। लेकिन क्या भाजपा की यह ‘वेत्री’ यात्रा भविष्य में ‘विक्ट्री’ यात्रा में तब्दील सकेगी?