राकेश अचल 

केंद्रीय विद्यालय ग्वालियर के छात्र दिव्यांशु और आशीर्वाद के किसी अज्ञात वाहन से टकराकर बेमौत मारे जाने का हादसा अखबारों की सुर्खी बनकर रह गया। सड़क हादसे तो हमारे शहर की नियति बन चुके हैं, लेकिन हम और हमारी व्यवस्था शहर को इस अभिशाप से मुक्त कराने के लिए कुछ करने को तैयार नहीं है। हम इन दोनों बच्चों की मौत नहीं हत्या के लिए जिम्मेदार हैं, क्योंकि हम हृदयहीन हो चुके हैं और ऐसे हादसों से हमारा रोम तक नहीं फड़कता।

मैं जब से पत्रकारिता में आया हूँ शहर के यातायात को लेकर लिखता आ रहा हूं। इसी शहर में जब मध्य प्रदेश राज्य परिवहन निगम की सिटी बसें बंद कर मिनी बसों को सड़कों पर उतारा गया था तब शहर में अचानक सड़क हादसों की बाढ़ सी आ गयी थी। तब भी मैंने लिखकर शोर मचाया था। तब रोज कोई न कोई इन मिनी बसों की चपेट में आकर अकाल मौत का शिकार होता था। इन मिनी बसों में तमाम बसें वे थीं जो अंत्यवसायी निगम ने बेरोजगारों को कर्ज के जरिये मुहैया कराई थीं। जब अति हो गयी तब ये मिनी बसें सड़कों से बेदखल की गयीं।

इसी शहर में मिनी बसें गईं तो ऐसे टेम्पो आ गए जो कहीं भी सड़क पर पसर कर यातायात को बाधित करने के साथ ही पूरे शहर को धुंएँ से काला कर रहे थे। पूरे शहर को बीमार करने के बावजूद परिवहन विभाग और पुलिस की कृपा से वर्षों तक ये टेम्पो जनजीवन के लिए खतरनाक बने रहे। एक लम्बी लड़ाई के बाद ये जानलेवा टेम्पो हटे तो उनकी जगह दूसरे तिपहिया वाहनों ने ले ली। डीजल और मिट्टी के तेल के बाद गैस और बैटरी से चलने वाले वाहन शहर की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को सम्हाल रहे हैं, लेकिन स्मार्ट सिटी परियोजना में शामिल होने के बाद भी ग्वालियर के भाग्यविधाता आईएएस अफसर अभी तक शहर के लिए सिटी बसों की समुचित व्यवस्था नहीं कर पाए हैं। मैंने तब भी लिखा।

स्मार्ट सिटी वाले मुश्किल से आधा दर्जन सिटी बसें सड़कों पर लाये भी लेकिन वे छोटे सार्वजनिक यात्री वाहनों का विकल्प नहीं बन सकीं। शहर में यात्री बसें भले न आयी हों लेकिन नगर निगम और स्मार्ट सिटी वालों ने शहर में सैकड़ों बस स्टाप जरूर बनवा दिए। नेताओं के मुंह लगे ठेकेदारों की रोजी रोटी का जिम्मा जो है इन संस्थाओं के ऊपर। इस अराजक स्थिति का ही कारण है कि शहर में आये दिन न जाने कितने दिव्यांशु और आशीर्वाद अकाल मौत मारे जाते हैं।

ग्वालियर में प्रदेश के परिवहन आयुक्त का कार्यालय है लेकिन इसी कार्यालय की नाक के नीचे परिवहन के लिए बनाये गए ढेरों कानूनों का पालन नहीं होता। पूरा विभाग नोट छापने की मशीन बनकर रह गया है। पुलिस और नगर निगम चालान का कोटा तय कर वसूली के अलावा आजतक शहर का यातायात सुधारने के लिए अपने आपको तैयार नहीं कर पाए हैं। हर नया पुलिस अधीक्षक और कलेक्टर आकर शहर की यातायात व्यवस्था सुधारने के लिए कसमें खाता है, शुरुआत भी करता है, फिर कुछ दिनों में सब कुछ रामभरोसे छोड़कर अपने काम में लग जाता है।

दिव्यांशु और आशीर्वाद की अकाल मौत के बाद भी शहर का जमीर जागने का नाम नहीं ले रहा। किसी ने इस हादसे को सार्वजनिक संकट नहीं माना, यानि जिसका मरे, वो ही रोये, शहर को क्या पड़ी ऐसे हादसों पर रोने की? सड़कों पर रोज तो ऐसे ही लोग मरते हैं लेकिन जब कोई प्रतिक्रिया ही नहीं होती तब स्थितियों में सुधार कैसे हो सकता है? शहर नियमित रूप से सालाना सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाता है,  सलाहकार समितियों की बैठक करता है, निर्णय भी करता है लेकिन उन पर कभी अमल नहीं करता। क्योंकि ऐसा न करने के लिए कोई शहर के भाग्यविधाताओं के कान खींचने वाला नहीं है।

अगर ऐसा न होता तो दिव्यांशु और आशीर्वाद की जान लेने वाले अज्ञात वाहन की तस्वीर किसी न किसी कैमरे में जरूर कैद होती, लेकिन ये कैमरे हैं कहाँ? किसको इनकी फ़िक्र है? कैमरे लगाने वालों और स्थानीय संस्थाओं के बीच भुगतान को लेकर होने वाले स्थाई विवाद के कारण शहर में कभी भी कोई कैमरा ढंग से काम ही नहीं करता।

दुनिया के तमाम शहरों में जहाँ 95 फीसदी लोगों के पास वाहन हैं, इतनी दुर्घटनाएं नहीं होतीं जितनी कि 30 फीसदी से भी कम लोगों के पास वाहन होने के बावजूद भारत में होती हैं। हमारा शहर भी भारत का ही एक ऐतिहासिक शहर है। हमें अपने शहर पर हमेशा गर्व करना सिखाया जाता है किन्तु दिव्यांशु और आशीर्वाद की अकाल मौत के बाद कोई अपने शहर पर गर्व करे तो कैसे करे? हम न चेते तो एक दिन कहीं न कहीं किसी दिव्यांशु और किसी आशीर्वाद की जानें जाती रहेंगीं, कोई उन्हें बचा नहीं पायेगा। शहर को एकांगी मार्गों के बिना अगर यातायात के लिए खुला रखा जाएगा तो भगवान भी इस शहर के यातायात को निरापद नहीं बना सकता। शहर की चिंता आपको ही करना है क्योंकि ये शहर है आपका ही।