टुकडे टुकडे पाकिस्तान- 3
प्रशांत पोळ

पाकिस्तान बना था इस्लाम की प्रेरणा से। उस समय के अखंड भारतवर्ष के मुसलमान एक अलग देश चाहते थे। इसलिए पाकिस्तान के नाम में ही इस्लाम है। ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ पाकिस्तान’ अर्थात ‘इस्लामी जम्हूरिया पाकिस्तान’ यह इस राष्ट्र का पूरा नाम है।

लेकिन प्रश्न यह है, क्या मात्र इस्लाम के नाम पर एक राष्ट्र खड़ा हो सकता है? इरान और ईराक, दोनों मुस्लिम राष्ट्र हैं। लेकिन दोनों के बीच कई युध्द हो चुके हैं। ईराक ने कुवैत पर कई बार हमले किये हैं। सीरिया को ध्वस्त करने में मुस्लिम संगठनों का बड़ा हाथ है। पाकिस्तान की अफगानिस्तान से नहीं पटती… ऐसे अनेक उदाहरण हैं। ये सभी इस्लामी राष्ट्र हैं, लेकिन आपस में झगड़ते हैं। अर्थात, मात्र मुस्लिम होना, यह किसी राष्ट्र को बांधे रखने का आधार नहीं हो सकता है।

पाकिस्तान बनाते समय, उसे बनाने वाले शायद इसी बात को भूल गए थे! इसीलिए आजादी के पच्चीस वर्ष पूरे होने के पहले ही, पाकिस्तान से, उसका बहुत बड़ा भूभाग, भाषा और स्थानिक संस्कृति को लेकर अलग हो गया था। पूर्व बंगाल की जनता और नेता, प्रमुखता से मुस्लिम ही थे। शेख मुजीबुर्रहमान पांच वक्त नमाज पढ़ने वाले मुस्लिम थे। लेकिन उनकी नहीं बनी। 1970-71 के दौरान, पश्चिम पाकिस्तान के शासकों ने लाखों की संख्या में पूर्वी बंगाल के हिन्दुओं को तो मारा ही, साथ ही, वहां के मुसलमानों को भी मारा। एक ही धर्म के मानने वालों ने ऐसा किया। कारण, मुस्लिम धर्म यह राष्ट्र को खड़ा करने का साधन या आधार हो ही नहीं सकता, यह पाकिस्तानी समझ ही नहीं पाए। और बांगला देश, एक अलग राष्ट्र के रूप में खड़ा हुआ।

यही बात पाकिस्तान के अन्य प्रान्तों में हो रही है। नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस के साथ भी यही हुआ, और यही हो रहा है। नेहरु और अंग्रेजों के कारण, गांधीजी को और कांग्रेस को मानने वाला यह महत्वपूर्ण प्रदेश पाकिस्तान में चला गया। उस पाकिस्तान में, जिसकी भाषा प्रमुखता से पंजाबी और उर्दू थी। बंगाली भी प्रारंभ में चलती थी। लेकिन इस NWFP में रहनेवाले अधिकतर, या तो पश्तो बोलते थे, या हिंदको। न तो भाषा की समानता थी, ना रीति-रिवाजों की। इसलिए 1947 में पाकिस्तान के बनने से ही, पठान, दिल से कभी भी पाकिस्तान के साथ नहीं रहे।

पठानों के सर्वमान्य नेता, बादशाह खान अर्थात खान अब्दुल गफ्फार खान को तो पाकिस्तान ने उनके मरने तक भरपूर अपमानित किया। बार बार उन्हें पकड़कर जेल में ठूंस दिया जाता था। 98 वर्ष की आयु में जब उनका इंतकाल हुआ, तब भी वे पेशावर में नजरबन्द थे।

ये सारा प्रदेश पहाड़ी है, जनजातियों से भरा है, अविकसित है, लेकिन गजब का सुन्दर है। ऐसा लगता है, निसर्ग ने अपनी सारी कृपा इस प्रदेश पर बरसाई है। पाकिस्तान में कुल 29 नेशनल पार्क हैं, जिनमें से 18 पार्क, इस प्रदेश में हैं। झेलम, सिन्धु, काबुल, कुर्रम, स्वात, पंजकोरा, कुनार, कुंहर.. इन नदियों ने इस पूरे प्रदेश को हरा-भरा और प्राकृतिक सुन्दरता से भरपूर बना दिया है। हिन्दूकुश की पर्वत श्रेणियों ने इसे दुर्गमता के साथ सृष्टि का वैभव दिया है। इस प्रदेश में प्रमुखता से पश्तूनी लोग रहते है, जो पाकिस्तान में पंजाबियों के बाद, दूसरा सबसे ज्यादा संख्या वाला समूह है।

पेशावर यह NWFP, जो आज खैबर पख्तुनख्वा कहलाता है, की राजधानी है। दक्षिण एशिया का प्राचीनतम शहर। ईसा पूर्व 539 वर्षों का इतिहास, इस शहर में मिलता है। किसी जमाने में यह हिन्दुओं की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक, ‘पुरुषपुर’ शहर था। वैभवशाली और संपन्न। बौध्दों के लिए भी यह एक पवित्र स्थल था। आज वही पेशावर शहर आतंकी हमलों से बदतर हो गया है। प्रदूषण की भरमार, तंग गलियां और आतंकी हमलों की आशंका। यह पेशावर का स्थायीभाव बन गया है।

पहले अमेरिकी जासूसों ने, अफगानिस्तान के रूसी सैनिकों से लड़ने के लिए इसका उपयोग किया। फिर रूसी सैनिक चले जाने के बाद, तालिबानी सैनिकों ने पेशावर को अपना ठिकाना बनाया। पाकिस्तान ने भी इस पूरे क्षेत्र को ‘आतंकवाद का अड्डा’ बनाए रखा। इसी प्रदेश के एबोटाबाद में पाकिस्तानी सेना ने ‘ओसामा बिन लादेन’ को अनेक वर्षों तक छुपाए रखा था। यहां पाकिस्तानी प्रशासन बिलकुल लचर है। 2014 में इसी शहर में तालिबानियों ने 132 स्कूली बच्चों को मौत के घाट उतारा था।

प्रारंभ से ही इस NWFP में पाकिस्तान के विरुध्द, विरोध का वातावरण रहा। लेकिन सीमावर्ती क्षेत्र और वनवासी जनजाति समुदाय होने के कारण पाकिस्तान ने कभी इस क्षेत्र पर ध्यान दिया ही नहीं। इसलिए विरोध के स्वर ज्यादा बुलंद नहीं हो सके। लेकिन नब्बे के दशक के बाद, अमेरिका ने, अफगानिस्तान के रूसियों से लड़ने के लिए इसी क्षेत्र को युध्दभूमि बनाया और सारे समीकरण बदलते चले गए। अमेरिका ने 9/11 होने के बाद तो इस प्रदेश को युध्दभूमि मान लिया था। पठानों पर अत्याचार होने लगे। पाकिस्तान, अमेरिकी सेना का समर्थन कर रहा था। सारे पठान, पाकिस्तान के विरोध में होते गए। विरोध का यह वातावरण ऐसा बढ़ता गया, की सन 2009 में इस NWFP प्रदेश के प्रमुख सड़कों पर चालीस फीट के बड़े से होर्डिंग्स लगे थे, पाकिस्तान के विरोध में। तब तक यह इलाका ‘आतंकवाद का गढ़’ बन चुका था।

सन 2010 में पाकिस्तानी प्रशासन ने इसे सुधारने के लिए कुछ करने का सोचा। उन्होंने इसका नाम बदल दिया। NWFP से यह ‘खैबर पख्तूनख्वा’ बन गया। सन 2018 में इस प्रदेश में पाकिस्तान का अर्धस्वायत्त प्रदेश, FATA (Federally Administered Tribal Areas) विलीन कर दिया। लेकिन अन्य कोई बदलाव नहीं हुआ। आतंकी गतिविधियाँ वैसे ही चलती रहीं। पुश्तैनी निवास करने वाले पठानों को यह सब सहन नहीं हो रहा था। उन्होंने अलग ‘पश्तुनिस्तान’ की मुहिम छेड़ रखी है।

‘उमर दौड़ खटक’ यह पश्तुनिस्तान समर्थक विद्रोही नेता है। ये पाकिस्तानी सेना में था। लेकिन अपने पश्तून प्रदेश में हो रहे पाकिस्तानी अत्याचार के विरोध में वो पाकिस्तानी सेना से भागा और अफगानिस्तान आ गया। वहां उसने ‘पश्तुनिस्तान लिबरेशन आर्मी’ बनाई है, जिसका वह ‘मिशन कमांडर’ है। उमर का कहना है, ‘उसके जैसे अनेक युवा, पाकिस्तानी अत्याचार के विरोध में देश छोड़कर, उसकी ‘पश्तुनिस्तान लिबरेशन आर्मी’ में शामिल हो रहे हैं।‘

उमर ने पाकिस्तानी सेना पर आरोप लगाया है, कि ‘वह (पाकिस्तानी सेना), वजीरिस्तान और स्वात इलाके की पश्तूनी महिलाओं को, ‘हवस का गुलाम’ बनाकर रखती है। उसका कहना है कि सैकड़ों की संख्या में पश्तूनी महिलाओं को पाकिस्तानी सेना ने, उनका काम होने के बाद, लाहौर के वेश्यालयों में भेज दिया है।’

उमर दौड़ खटक अनेक बार भारत आ चुका है। पूरे पश्तुनिस्तान में फैले विद्रोह का, पाकिस्तान के प्रति गुस्से का, वो प्रतीक है। इस्लामाबाद में बैठे पाकिस्तानी शासकों के खिलाफ, खैबर पख्तूनख्‍वा के लड़ाकू पठानों ने हमेशा ही आवाज बुलंद की है। और इस्लामाबाद की सरकार ने उन्हें हमेशा ही दबाने की कोशिश की है। पाकिस्तानी सरकार के विरोध के आंदोलनों की इस शृंखला में 2014 से एक जबरदस्त नाम सामने आ रहा है– ‘पख्तून तहफ्फुज मूवमेंट’ अर्थात ‘पख्तून रक्षा आंदोलन’। डेरा इस्माइल खान की ‘गोमल यूनिवर्सिटी’ में पढ़ने वाले आठ लड़कों ने, लगभग पांच वर्ष पहले यह आंदोलन खड़ा किया। पहले इसका नाम ‘महसूद तहफ्फुज’ था। महसूद यह वज़ीरिस्तान की एक जनजाति का नाम है, जिसके अधिकतर छात्र, गोमल यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे।

लेकिन 13 जनवरी, 2018 को इस आंदोलन के एक नेता, नकिबुल्लाह महसूद को पुलिस ने कराची में एक झूठे एनकाउंटर में मार गिराया। इससे छात्रों का गुस्सा भड़का और आंदोलन पूरे प्रदेश में फ़ैल गया। आंदोलन के इस फैलाव के बाद, इसके नाम में से महसूद शब्द हटाकर, ‘पख्तून’ कर दिया गया। आज यह आंदोलन खैबर पख्तूनख्‍वा के साथ, बलूचिस्तान प्रांत में भी फ़ैल रहा है। इसे पाकिस्तानी, ‘पीटीएम’ (Pashtun Tahafuz Movement) नाम से जानते है।

दिनांक 26 मई, 2016 को, नॉर्थ वज़ीरिस्तान जिले के खारकमर मिलिट्री चेक पोस्ट पर, पीटीएम के, शासन विरोधी प्रदर्शन चल रहे थे। आंदोलन में लग रहे नारों से बौखलाकर पाकिस्तानी सेना ने इन प्रदर्शनकारियों पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं। इसमें पीटीएम के 13 कार्यकर्ता मारे गए और 25 गंभीर रूप से जख्मी हुए। इसकी जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई। पाकिस्तानी सेना के विरोध में प्रदर्शन तीव्र होने लगे। पाकिस्तानी सेना ने पीटीएम के धाकड़ सांसद, अली वजीर और मोहसिन डावर को गिरफ्तार किया।

21 सितंबर तक ये दोनों, सेना की जेल में रहे। लेकिन विरोध का आंदोलन रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। आखिरकार पड़ोसी देश भारत, जब अपना गणतंत्र दिवस मना रहा था, अर्थात 26 जनवरी 2020 को, पाकिस्तानी पुलिस ने, पीटीएम के निर्विवाद नेता, ‘मंजूर पश्तिन’ को पेशावर से उठा लिया। मंजूर पश्तिन खैबर पख्तूनख्वा के लोगों की आवाज हैं। वे मानव अधिकार कार्यकर्ता हैं। उन्हें पाकिस्तान में तथा पाश्चात्य मीडिया मे, ‘नया फ्रंटियर गांधी’ कहा जाता है।

मात्र 26 वर्ष की आयु का यह लड़का, पूरे पीटीएम का नेतृत्व करता होगा, ऐसा लगता नहीं। मंजूर पश्तिन, उजबेकी टोपी पहनता है, उसे माझरी हैट कहते हैं। पशतूनी युवाओं में यह टोपी इतनी ज्यादा लोकप्रिय हो गई है, कि लोग उसे अब मंजूर के नाम से ‘पश्तिन टोपी (Pashtin Hat)  कहने लगे हैं। मंजूर पश्तिन को मानने वाले लाखों कार्यकर्ता खैबर पख्तूनख्‍वा में है। इसलिए 26 जनवरी की गिरफ्तारी के तुरंत बाद, पीटीएम के दो सांसद, अली वजीर और मोहसिन डावर ने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किए।

पाकिस्तान में 3 से 4 करोड़ पश्तून रहते हैं। आज उनका सर्वमान्य नेता, मंजूर पश्तिन है। पाकिस्तान की सरकार और पाकिस्तानी सेना, इस छब्बीस वर्षीय युवा नेता से इतनी ज्यादा डरी हुई हैं, कि वे उसे जेल के बाहर देखना पसंद नहीं करतीं। पाकिस्तान सरकार को लगता है कि शायद मंजूर पश्तिन को गिरफ्तार करके, वे पीटीएम का आंदोलन कुचल देंगे। लेकिन ऐसा संभव नहीं है। आज तक, पाकिस्तान की सेना और पुलिस से लड़ते हुए, पचास हजार से ज्यादा पश्तून, मारे गए हैं। पाकिस्तान की सेना, पूरी बर्बरता के साथ, इस आंदोलन को कुचलना चाहती है।

सारा वज़ीरिस्तान इस समय असंतोष की आग में उबल रहा है। पश्तूनों के मानव अधिकारों से प्रारंभ यह आंदोलन अब पुरजोर तरीके से, ‘स्वतंत्र पश्तूनिस्तान’ की मांग कर रहा है। ऐसे समय में मंजूर पश्तिन को गिरफ्तार करना, सन 1971 में बंगाल के ‘अवामी लीग’ के नेता, शेख मुजीबुर्रहमान की गिरफ्तारी की याद दिलाता है।

पिछले कुछ वर्षों में, खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में अलगाववाद के स्वर बुलंद होते जा रहे हैं। पाकिस्तानी सेना को और प्रशासन को, इस सीमावर्ती प्रदेश में अपना प्रशासन कायम करना, दिनों दिन कठिन होता जा रहा है।