आदर्श गुप्‍ता

एक प्यार का नगमा है मौजों की रवानी है 
जिंदगी और कुछ भी नही तेरी मेरी कहानी है
इस और इस जैसे कई और गीतों के गीतकार सन्तोष आनन्द  को रविवार को सोनी टीवी के कार्यक्रम इंडियन आइडल में बदहाल देख कर दुख हुआ।  सन्तोष आनन्द जी को मैंने कई साल पहले मुरैना मेले में आयोजित होने वाले कवि सम्मेलन में सामने बैठ कर सुना है, उनसे मिला भी हूं। कभी देश भर के कवि सम्मेलनों के मंच सन्तोष आनन्द जी की उपस्थिति से अभिभूत हो उठते थे।

उनके लिखे गीतों को फिल्मों और रेडियो-टीवी पर लगातार सुनते रहने के बाद भी कवि सम्मेलन में लोग उनसे उनके उन्हीं गीतों को सुनाने की फरमाइश करते थे। अक्सर  होता था कि कई कवि तो इस बात से नाराज भी हो जाते थे कि लोग उनसे उनके उन  फिल्मी गानों को  सुनाने की फरमाइश करते हैं जो लाखों बार सुने जा चुके हैं। जैसे मुझे याद है एक बार मशहूर शायर जनाब कैफ भोपाली साहब मुरैना मेला मंच पर अपना कलाम पढ़ने खड़े हुए, तभी लोगों ने उनसे उनका लिखा फ़िल्म पाकीजा का गीत “चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो” के गाने की  फरमाइश कर दी, कैफ साहब अड़ गए कि लता जी ने इसे गा दिया है अब मैं उसे यहां बेसुर गाऊं यह जमेगा नहीं। लेकिन लोग  नहीं माने और उनसे यह गीत सुन कर ही माने। सन्तोष आनन्द जी के साथ ऐसा कुछ नहीं था, अबकी बरस तुझे हो या एक प्यार का नगमा हो, अपना लिखा कोई भी फिल्मी  गाना वे मंच पर झूम झूम के गाते थे वो भी ओरिजनल, पण्डित विश्वेसर शर्मा  की तरह नहीं जो हमेशा कवि सम्मेलन के  मंच पर अपने  मूल फिल्मी गाने की पैरोडी ही गाते थे।

बड़ा नाम था 70 – 80 के दशक में सन्तोष आनन्द जी का।  बताते हैं कि 1970 में उनका पहला गीत फ़िल्म शोर में आया था- ‘’एक प्यार का नगमा है’’  फ़िल्म और गीत दोनों ने धूम मचा दी थी। 70 से 84 तक उनका गीतकार का जीवन सफलता से भरा था जिसमें  प्रेम था, उल्लास था, लेकिन उनकी जिंदगी ने साबित किया कि किसी ने यह भी सही लिखा है “जिंदगी दो एक दिन की बात नही, रंजो गम  हैं सुहागरात नहीं” 2014 में उनके बेटे डॉ संकल्प आनन्द जो आईएएस अफसरों को सायकोलॉजी और क्रिमोनोलॉजी  की ट्रेनिंग देते थे ने अफसरों  के षड्यंत्र का शिकार होकर  मथुरा के पास कोसी कलां स्टेशन पर पत्नी सहित ट्रेन के आगे कूद कर आत्महत्या कर ली थी। इस घटना ने उन्हें तोड़ दिया।

काम छूटा, आमदनी छूटी, ऊपर से अनाथ नातिन को पालने की जिम्मेदारी उनके बुढ़ाते, पुत्र वियोग से टूटे कमजोर कन्धों पर आ पड़ी। इसे  निभाने की मजबूरी ने उन्हें जिंदा रखा। सोनी टीवी ने उन्हें उनके चाहने वालों के सामने प्रस्तुत किया  तो लोग आंसू नही रोक पाए। नेहा कक्कड़ के आंसुओं ने, उनकी 5 लाख की मदद की  पेशकश ने और सन्तोष आनन्द के जवाब ने कि अपनी खुद्दारी के चलते उन्होंने कभी किसी से  कुछ नही मांगा, लोगों को भावुक कर दिया।

यह दुनिया ऐसी ही है। यह लोगों को बहुत जल्दी भूल जाती है। तिकड़मबाज, बिना रीढ़ के लोग यहां मलाई रबड़ी खाते हैं और खुद्दार रोटी को भी मोहताज हो जाते हैं। उन्हें कोई देखता भी नहीं, उनकी मजबूरी में, उनकी बेबसी में, उनका सहारा भी नहीं बनता। उम्मीद करें कि फिल्मी दुनिया में कुछ लोग ऐसे निकलें जो सन्तोष आनन्द की मदद करने आगे आएं। गीत तो वे आज भी लिख सकते हैं, और वो भी उन लोगों से लाख बेहतर जो इन दिनों गीत के नाम पर कूड़ा लिख रहे हैं। फेसबुक पर कई पोस्टों में लिखा गया कि सन्तोष आनन्द भीख मांगने पर मजबूर। यह सही नहीं है। उनमें खुद्दारी अभी जिंदा है। नेहा कक्कड़ की सहृदयता को उन्होंने ठुकराया नहीं, लेकिन यह कहा कि उन्होंने जीवन में कभी किसी से कुछ मांगा नहीं है, उन्हें काम चाहिए। उन्हें आज भी अपनी कलम, अपने शब्दों पर भरोसा है। कोई  उनके इस हौसले इस भरोसे को मजबूती दे, यही उनकी बड़ी मदद होगी।