अजय बोकिल

अयोध्या में राम मंदिर शिलान्यास की शुभ घड़ी जैसे-जैसे करीब आती जा रही है, वैसे-वैसे समारोह‍ निमंत्रण सूची भी बढ़ती जा रही है, वहीं ‘राम परिवार’ का अघोषित सियासी बंटवारा भी होता जा रहा है। यानी अयोध्या में राम तो मप्र में राम भक्त हनुमान और छत्तीसगढ़ में राम की जननी कौशल्या की प्रतिष्ठापना हो रही है। आस्था के सागर में सियासी नैया खेने, जिसके हाथ जो पतवार लग रही है, वो उसी को मजबूती से थामने में लगा है। अलबत्ता राम भक्त गदगद हैं कि राम ही नहीं, अब उनके परिवार के अन्य सदस्यों का भी नए सिरे से स्वीकार-पुरस्कार हो रहा है।

दूसरे शब्दों में कहें तो यह उसी राजनीति का विस्तार है, जिसने भाजपा जैसी धर्माग्रही पार्टियों को सत्ता के सिंहासन तक पहुंचा दिया और सेक्युलर राजनीति को अपने ही भंवर में फंसा दिया है। वह यह तय नहीं कर पा रही कि मंदिर निर्माण की व्याख्या किस रूप में करे। और यह भी कि इस तरह मंदिर का निर्माण देश की एक नई और खतरनाक विभाजन रेखा है, या फिर यह नए सद्भाव सूत्रपात है?

यह विडंबना ही है कि देश में कोरोना संक्रमण सुरसा की तरह फैल रहा है। जिस उत्तर प्रदेश के अयोध्या में यह भव्य आयोजन होने जा रहा है, उस प्रदेश की एक महिला मं‍त्री की जान कोरोना ने ले ली है। केन्द्रीय मंत्री अमित शाह भी ‘पॉजीटिव’ हो गए हैं। मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार तो पहले ही ‘अस्पताल सरकार’ बन चुकी है। यहां तो प्रदेश भाजपा भी कोरोना ग्रस्त है। और तो और अयोध्या में राम मंदिर के पुजारी और गार्ड तक कोरोना राक्षस से नहीं बच पाए हैं। इन सबके बावजूद आस्था का अंबार और राजनीतिक आग्रह ऐसा है कि राम मंदिर शिलान्यास समारोह की तैयारियां धूमधाम से जारी हैं।

बीच में मीडिया में ये खबरें उछलने के बाद कि किन-किन को नहीं बुलाया जा रहा है, अब चर्चा है कि आमंत्रितों की सूची 200 से बढ़ाकर 600 की जा रही है। इसके बाद भी राम मंदिर आंदोलन के राजनीतिक हरकारे लालकृष्‍ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी इस विधि का डिजिटल दर्शन ही कर सकेंगे। उधर भाजपा के स्थायी असंतोषी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने सवाल उछाला ‍कि राम मंदिर आंदोलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का क्या योगदान है? स्वामी ने यह दावा भी किया कि यदि राजीव गांधी दूसरी बार प्रधानमंत्री बन जाते तो राम मंदिर तभी बन जाता, क्योंकि राम लला मंदिर के ताले भी उन्हीं ने खुलवाए थे।

हालांकि यह दावा उस मराठी कहावत की तरह है कि बुआ की मूंछें होती तो उन्हें काका कहते। वैसे शिलान्यास समारोह के लिए लोगों को न्योतने का उत्साह इतना जबर्दस्त है कि तेलंगाना में भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता कृष्ण सागर राव ने एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन औवेसी को भी कार्यक्रम का निमंत्रण दे डाला है। औवेसी की इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है कि एक ‘असंवैधानिक कार्यक्रम’ के सौजन्यपूर्ण निमंत्रण को वे स्वीकार करेंगे या नहीं? औवेसी मंदिर का शिलान्यास पीएम नरेन्द्र मोदी के हाथों कराने पर संवैधानिक मर्यादा के उल्लंघन का खुला आरोप लगा चुके हैं।

सुब्रमण्यम स्वामी की बयानबाजी का अहम पहलू ये है कि कांग्रेस आज छाती ठोककर यह कहने की स्थिति में भी नहीं है कि हां, मंदिर बनवाने का श्रेय भले भाजपा ले रही हो, लेकिन ताले खुलवाकर भविष्य में राम मंदिर निर्माण की राजनीतिक आधारशिला तो हमने ही रखी थी। शायद यही आत्मग्लानि है कि कांग्रेस और उसके नेता राम न सही, राम दरबार और राम परिवार के दूसरे सदस्यों पर अपना हक जता रहे हैं।

अयोध्या में राम जन्म भूमि शिलान्यास के कुछ घंटों पहले मध्यप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने ऐलान किया कि वे भोपाल स्थित अपने आवास पर मंगलवार को हनुमान चालीसा का पाठ करवाएंगे। इसमें सभी कांग्रेस कार्यकर्ता शामिल होंगे। पाठ सोशल डिस्टेंसिंग के साथ होगा। आयोजन को पूरी तरह से ‘आध्यात्मिक’ कार्यक्रम बताया जा रहा है। उधर छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार ने ऐलान किया कि वह राज्य के चंदखुरी में भगवान राम की माता कौशल्या का मंदिर बनवाएगी।

कहते हैं कि कौशल्या का जन्म यहीं हुआ था और राम का ननिहाल भी छत्तीसगढ़ में था। यह भी मान्यता है कि भगवान राम ने वनवास की अवधि का काफी समय छत्तीसगढ़ में ही व्यतीत किया था और बाद में यहीं से राम दक्षिण की ओर गए थे। लिहाजा छत्तीसगढ़ सरकार ने भी ‘राम वन गमन पथ’ के विभिन्न पड़ावों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का भी महत्वाकांक्षी प्लान बनाया है। यूं मप्र में भी इसी राम वन गमन पथ को विकसित करने तथा इसके रोड मैप पर काम करने की बात सभी सरकारें करती आ रही हैं, लेकिन ठोस काम अभी तक शुरू नहीं हुआ है। घोषणाओं के बाद यह ‘राम वन गमन पथ’ राजनी‍ति के जंगल में न जाने कहां खो जाता है।

राम भक्ति का दायरा राजनीतिक स्वार्थों को लांघते हुए और विस्तृत हो, इस पर किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? विरोध के लिए विरोध अपनी जगह है। इस लिहाज से कांग्रेस का पूरे राम मंदिर आंदोलन में पहले नायक फिर खलनायक और अब कोरस गायक बन जाना चकित नहीं करता है। कांग्रेस की वैचारिक दुविधा यही है कि धर्म और राजनीति को लेकर उसकी कोई स्पष्ट नीति नहीं है। कभी वह दोनों के बीच लक्ष्मण रेखाएं खींचती दीखती है तो कभी अपने ही हाथों से उसे मिटाती नजर आती है।

लेकिन यह भी सही है कि जो सियासी पार्टी जनमानस की नब्ज ठीक से नहीं पकड़ पाती, उसे अपना वजूद बचाने के लिए दूसरे सहारे खोजने पड़ते हैं। कांग्रेस की पीड़ा यह है कि मंदिर निर्माण का शुरुआती मंतर फूंकने के बाद भी उसके हिस्से में पूरे राम मंदिर आंदोलन का राजनीतिक प्रसाद चुटकी भर पंजीरी जितना भी नहीं आया है। शायद यही कारण है कि वह आरएसएस और भाजपा को कोसते रहकर भी राम मंदिर के राजनीतिक लाभ में किसी न किसी रूप में हिस्सेदारी चाहती है। ऐसे में राम चरित के बाकी पा‍त्रों का स्वीकार ही पार्टी के पास एकमात्र विकल्प है।

इसकी पहली कड़ी के रूप में हमने राम दरबार का ‘राजनीतिक विभाजन’ देखा। मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने राम भक्त हनुमान के महात्म्य को स्वीकार किया। हालांकि इसके काफी पहले आरएसएस ने रामभक्‍त हनुमान को आदिवासियों के अधिदेव के रूप में स्थापित करने में पूरी ताकत लगा दी थी। लेकिन पवनपुत्र की महिमा यह है कि उनकी कृपा हो तो ‘बाहरी’ तो क्या ‘भीतरी’ भूत पिशाच भी निकट नहीं आते। इस मायने में हनुमानजी  हर तरीके से मददगार हैं, इसीलिए आराध्य हैं।

कांग्रेस के राजनीतिक कैनवास में जब हनुमान मध्यप्रदेश के ‍लिए ‘रिजर्व’ हो गए तब छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार ने राजधानी रायपुर के पास राम की माता कौशल्या का भव्य मंदिर बनाने का ऐलान किया। हो सकता है कि ‍भविष्य में बाकी पार्टियां लक्ष्मण, भरत पर भी दावे करें और उनके भी भव्य मंदिर हमे नजर आएं।

बहरहाल, यह असाधारण स्थिति है। देश का मन कोरोना से डरा हुआ है, लेकिन उसकी आंखें अयोध्या पर टिकी हैं। कहीं ‘राजा’ और ‘राम’ को एक ही फ्रेम में देखने पर आपत्ति है तो कहीं राम ही राजनीतिक उद्धार के कारक हैं। यानी राम सबके हैं। उनके भी, जिनके लिए अब राम ही आसरा हैं और उनके भी, जो ‘राम’ शब्द का उल्टा जाप कर अपनी अलग अयोध्या बसाना चाहते हैं।