राकेश दीवान

प्रधानमंत्री को भगवान राम का अवतार बताने के बाद साथ बैठी महिला की फटी यानि ‘रिप्ड’ जीन्स और दो सौ साल की अमेरिकी गुलामी पर अपनी टिप्पणी से नाम कमा रहे उत्तराखंड के ताजे मुख्‍यमंत्री तीरथसिंह रावत को अपनी गलती का कोई अहसास नहीं है। यदि अहसास होता तो वे इसी श्रृंखला में ‘बीस बच्चे पैदा करके’ राशन की मार्फत अधिक अनाज प्राप्त करने का सुझाव नहीं दे रहे होते। वे अपने वक्तव्यों को सिरे से फूहड, गलत और बेहूदा मानने की बजाए, किसी को ठेस पहुंचने पर, अधिक-से-अधिक मुआफी के लायक भर मानते हैं। भगवान राम के प्रधानमंत्री अवतार से जुड़े नहीं होते तो शायद वे अपनी बयानबाजी को तोड़-मरोड़कर पेश करने के लिए मीडिया के माथे ठीकरा फोड़ते।

इस पूरे मामले से और कुछ हो, न हो, यह तो उजागर हो ही जाता है कि हमारे राजनेताओं को, उन्हें वोट देने वाली जनता की कोई खास परवाह नहीं होती। और आखिर हो भी क्यों? जब उनकी नियुक्ति पार्टी के कथित हाईकमान की मर्जी से होती हो और उनका गद्दी पर  रहना, न रहना उसी हाईकमान की इच्छा-अनिच्छा पर निर्भर करता हो तो कोई क्यों जनता या वोटर की परवाह करे?

देश की पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों में राजनेताओं की इस बेपरवा‍ही की बानगी देखी जा सकती है जहां वे गली-गली में वोटरों के चरण-चूमने, तरह-तरह के दावों-वादों से ललचाने, मंदिर-मस्जिद पूजने और अपनी-अपनी कलाबाजियों से उन्हें पुचकारने में लगे हैं। राजनेताओं के इन दिनों के करतबों को देखकर भरोसा नहीं होता कि वे अपने वोटरों की रत्तीभर भी परवाह नहीं करते होंगे। चुनाव-काल से बाहर आते ही वे अपने वोटरों को लेकर तीरथसिंह रावत जैसी अनेक आसमानी-सुल्तानी बातें करते और उन्हें अपमानित करते रहते हैं। जनता की यह अवमानना और तरीकों से भी होती है।

मसलन– नब्बे के दशक की शुरुआत में कांग्रेस की तत्कालीन सरकार ने खुले बाजारों वाले भूमंडलीकरण की नींव डाली थी। पूंजी और बाजार को समर्पित आज की केन्द्र और राज्य की सरकारों की रूपरेखा दरअसल भूमंडीकरण के उन्हीं दिनों में रची गई थी। चुनावी मैदान में किस्मत आजमा रहे कांग्रेसी, वामपंथी, तृणमूल-कांग्रेसी, ‘द्रमुक’, ‘अन्नाद्रमुक’ और समाजवादी जैसे तमाम विपक्षी दल भाजपा के जिस निजीकरण, ‘मित्र-पूंजी’ या ‘क्रोनी-कैपिटल’ और सार्वजनिक क्षेत्र की बिक्री की मुखालिफत कर रहे हैं, उसकी शुरुआत तो दरअसल उनकी भागीदारी और अक्सर उनकी अगुआई में हुई है। ऐसे में वे भाजपा को कैसे गरिया सकते हैं? धुर दक्षिण से लेकर धुर वाम तक केवल कांग्रेस के पूर्व अध्‍यक्ष राहुल गांधी भर हैं जिन्होंने अपने एक साक्षात्कार में भूमंडलीकरण को पुरानी तजबीज बताया था, हालांकि उन्होंने भी इसे खारिज नहीं किया था।

अब ऐसे में वोट कबाडने की खातिर कोई‍ विपक्षी जमात अपने ही पुराने धतकरमों को गरियाना चाहे तो उसकी विश्वसनीयता ‍कितनी रहेगी? पूर्व में किए गए अपने उन पुराने काम-काजों को सिर्फ मौजूदा सत्तारूढ पार्टी द्वारा किए जाने के आधार पर गलत साबित करना वोटों के लिहाज से कैसा रहेगा? और क्या इस तरह के धतकरम वोटरों को गैर-जरूरी माने बिना किए जा सकते हैं? क्या यह वोटरों और देश के नागरिकों का अपमान नहीं है?

पश्चिम बंगाल, जहां इन दिनों धूम-धड़ाके से विधानसभा चुनाव की रणभेरियां बज रही हैं, 2010-11 में सिंगूर और नंदीग्राम के संघर्षों के कारण भी जाना जाता था। ये वे दिन थे जब करीब साढ़े तीन दशक लंबे दौर में गद्दी पर काबिज रही वाममोर्चा की सरकार निस्तेज पड़ने लगी थी। सिंगूर, नंदीग्राम के संघर्षों ने कांग्रेस से छिटकी ममता बनर्जी को मुख्‍यमंत्री की हैसियत अता की थी, लेकिन आज वह सिंगूर और नंदीग्राम का इतिहास कहां है? क्या वामपंथियों ने अपने किसी कमजोर क्षणों में भी सिंगूर, नंदीग्राम की गलतियों को स्वीकार किया? खासकर तब, जब वामपंथी पार्टियां देश की अकेली ऐसी राजनीतिक जमातें हैं जो अपनी गलतियों को स्वीकार करतीं और फिर उसे सुधारती हैं।

ठीक इसी तर्ज पर सत्तारूढ भाजपा को देखा जाए तो उसने मौजूदा चुनावों में भी 2014 के बाद से अंगीकार किया अपना स्वरूप ही एक बार फिर दोहराया है। यानि चुनाव के दौर में किए जाने वाले उन वादों-दावों को बार-बार दोहराया जा रहा है जिन्हें सत्ता में आने के बाद वह सिरे से भूलकर ‘जुमला’ कहने में भी नहीं शर्माती। जाहिर है, राजनीतिक पार्टियों की ये हरकतें उन वोटरों का स्पष्ट अपमान है जो तरह-तरह के सपने लेकर चुनावों में इस-या-उस पार्टी को अपना कीमती वोट देते हैं। दरअसल यही वह प्रक्रिया भी है जिसके चलते वोटरों से बेपरवाह तीरथसिंह रावत जैसे राजनेता पैदा होते हैं। आखिर ऐसा क्यों होता है?

यदि इन दिनों जारी पांच राज्यों के चुनावों को ही देखें तो उजागर हो जाता है कि राजनेताओं, पार्टियों और चुनाव-प्रक्रियाओं का उन मुद्दों से कोई खास लेना-देना नहीं है जो स्थानीय लोगों को दिन-रात मथ रहे हैं। मसलन- क्या तमिलनाडु में उन किसानों की समस्याओं को लेकर कोई चुनावी मुद्दा बन पाया है जो डेढ़-दो साल पहले दिल्ली की चौखट पर जाकर अपना दुखडा रोते रहे थे और उनकी किसी ने नहीं सुनी थी? या पिछले कई सालों से मानव-निर्मित प्राकृतिक आपदाओं को झेलने वाले केरल में किसी ने उस विकास के मौजूदा मॉडल पर कोई सवाल उठाया जिसके चलते बार-बार राज्य को संकटों से दो-चार होना पडता है? क्या पुडुचेरी में केन्द्र और राज्य की सरकारों की पहल पर लगातार चलते संवैधानिक संकट पर कोई बात की गई? क्या बंगाल और असम में पिछले सालों में उठे नागरिकता की पहचान के सवाल पर कोई बहसा-बहसी खडी हुई? क्या वहां की शिक्षण संस्थाओं की लगातार तिरोहित होती स्वायत्तता पर किसी ने कुछ कहा?

यदि ये और ऐसे ही सवाल चुनावों की केन्द्रीय बहस का हिस्सा नहीं बने तो फिर किस बात के लिए चुनाव किए जा रहे हैं? ध्‍यान से देखें तो दो बातें उजागर होती हैं। एक, लोग अपनी-अपनी आम-फहम जिन्दगी यानि रोजी, रोटी, कपडा और मकान की खातिर या उनकी आस में वोट कर रहे हैं और दूसरे, एक राज्य-व्यापी व्यापक तमाशे में मजे और थोड़े-बहुत लाभ के लिए हिस्सा ले रहे हैं। दोनों के लिए नागरिक को अपनी सीमित, स्वकेन्द्रित भूमिका से बाहर निकलना पड़ता है, लेकिन आज के चुनावों में वोटर किसी भी तरह की व्यापकता की तरफ पीठ करके खड़ा है। उसकी यह बदहाली कैसे हुई? उसे यह बताया क्यों नहीं जा रहा कि चुनाव की सार्थकता अपने स्थानीय, निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर निर्णय लेने में ही है?

गहराई से देखें तो इसकी जिम्मेदारी प्रातिनिधिक लोकतंत्र की अहम खिलाड़ी राजनीतिक पार्टियों की दिखाई देती है। भांति-भांति के रंगों-झंडों वाली राजनीतिक जमातों ने वोटरों को कठपुतलियों में तब्दील कर दिया है। अब जैसा राजनीतिक पार्टियों के सरगना कहते हैं वोटर अपने बेहद स्थानीय, निजी स्वार्थों के चलते वैसा ही करते हैं। एक लिहाज से आज की राजनीति नागरिकों के अपने समाज और सरकारों से अलगाव की प्रक्रिया है। पूंजीवाद में उत्पादन-प्रक्रिया में अलगाव के साथ-साथ सामूहिकता, संस्कृति, कलाओं आदि से भी व्यक्ति का अलगाव होता है। राजनीति चुनावों की मार्फत वोटरों के खुद राजनीति से अलगाव की प्रक्रिया को बढ़ावा देती है। जाहिर है, ऐसे में तीरथसिंह रावत जैसे राजनेता ही तैयार नहीं होंगे तो क्या होगा? (मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं।
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