राकेश अचल

चार दशक पहले जब विधि का विद्यार्थी था तब पहली बार केशवानंद भारती का नाम सुना था और दुर्भाग्य ये कि उन्हें कभी देखा नहीं। देखी तो उनकी तस्वीर वो भी तब, जब वे इस दुनिया से विदा हो गए। हमारे विधि के जितने भी व्याख्याता थे वे सब केशवानंद भारती का प्रकरण बड़ी रुचि लेकर पढ़ाते थे। मैं विधि का गरीब और सबसे अधिक गंभीर छात्र था इसलिए बिना नागा अपनी कक्षाओं में उपस्थित रहता था, शायद केशवानंद भारती भी इसीलिए मेरे जेहन में ज़िंदा बने रहे।

आइये आपको संविधान और न्यायालय के लिए नजीर बने इन केशवानंद भारती से मिला देते हैं। केरल के कासरगोड़ में इडनीर नामक स्थान पर एक शैव मठ है। 1961 में केशवानंद भारती को इस मठ का प्रमुख बनाया गया था। उस समय उनकी उम्र महज 20 साल थी। इस मठ का इतिहास आदि शंकराचार्य से जुड़ा है। एक धर्माचार्य होते हुए भी उन्होंने अपने अधिकारों के लिए अपने राज्य की सरकार के फैसले के साथ ही संविधान को भी चुनौती दी और लगातार संघर्ष करते रहे। अंत में वे एक जीती-जागती नजीर बन गए।

क़ानून के प्रति मेरी दिलचस्पी जुनून की हद तक थी। मैं ग्वालियर के महारानी लक्ष्मीबाई विधि एवं कला महाविद्यालय में विधि की अंशकालिक कक्षाओं का छात्र था। किताबें खरीदने के लिए पैसे नहीं थे सो नियमित कक्षाओं में बैठकर अपने प्राध्यापकों के प्रवचनों को शब्दश: उतार लेता था। सर्दी, गर्मी, बरसात मेरी पढ़ाई में कभी बाधा नहीं बनी। बाधा बना तो रोजगार जिसकी वजह से मेरी विधि की पढ़ाई अंतिम वर्ष में छूट गयी थी।

केशवानंद केरल सरकार पर तब भड़के जब सरकार ने दो भूमि सुधार कानून बनाए जिसके जरिए धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन पर नियंत्रण करने की कोशिश की। दरअसल इस क़ानून के तहत मठ की 400 एकड़ में से 300 एकड़ ज़मीन पट्टे पर खेती करने वाले लोगों को दे दी गई थी। उन दोनों कानूनों को संविधान की नौंवी सूची में रखा गया था, ताकि न्‍यायपालिका उसकी समीक्षा न कर सके। साल 1970 में केशवानंद ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। यह मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो ऐतिहासिक हो गया। सुप्रीम कोर्ट के 13 जजों की बेंच बैठी, जो अब तक की सबसे बड़ी बेंच है। 68 दिन सुनवाई चली, यह भी अपने आप में एक रेकॉर्ड है। फैसला 703 पन्‍नों में सुनाया गया।

केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य का प्रकरण जब सुप्रीम कोर्ट में चल रहा था तब मैं ग्यारहवीं का छात्र था, उस समय के अख़बारों में ये मामला खूब छाया रहा। लेकिन तब अपने राम को इस तरह की खबरों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। जब दस साल बाद विधि कक्षाओं में बैठने का मौक़ा मिला तो यही मामला सबसे पहले कंठस्थ कराया गया। 23 मार्च, 1973 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। संसद के पास संविधान को पूरी तरह से बदलने की असीमित शक्तियों पर अदालत ने ऐतिहासिक रोक लगाई।

चीफ जस्टिस एसएम सीकरी और जस्टिस एचआर खन्‍ना की अगुआई वाली 13 जजों की बेंच ने 7:6 से यह फैसला दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संसद के पास संविधान के अनुच्‍छेद 368 के तहत संशोधन का अधिकार तो है, लेकिन संविधान की मूल बातों से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा कि संविधान के हर हिस्‍से को बदला जा सकता है, लेकिन उसकी न्‍यायिक समीक्षा होगी ताकि यह तय हो सके कि संविधान का आधार और ढांचा बरकरार है।

जस्टिस खन्‍ना ने अपने फैसले में ‘मूल ढांचा’ वाक्‍यांश का प्रयोग किया और कहा कि न्‍यायपालिका के पास उन संवैधानिक संशोधनों और कानूनों को अमान्‍य करार देने की शक्ति है जो इस सिद्धांत से मेल नहीं खाते। सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले में ‘मूल ढांचे’ की एक आउटलाइन भी पेश की थी। अदालत ने कहा था कि सेक्‍युलरिज्‍म और लोकतंत्र इसका हिस्‍सा हैं। पीठ ने आने वाली पीठों के लिए इस मुद्दे को खुला रखा कि वे चाहें तो सिद्धांत में कुछ बातों को शामिल कर सकती हैं।

भारती का केस तब के जाने-माने वकील नानी पालकीवाला ने लड़ा था। 13 जजों की बेंच ने 11 अलग-अलग फैसले दिए थे जिसमें से कुछ पर वह सहमत थे और कुछ पर असहमत। मगर ‘मूल ढांचे’ का सिद्धांत आगे चलकर कई अहम फैसलों की बुनियाद बना। कई संवैधानिक संशोधन अदालत में नहीं टिके। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी व्‍यवस्‍था दी कि न्‍यायपालिका की स्‍वतंत्रता संविधान के मूल ढांचे का हिस्‍सा है, इसलिए उससे छेड़छाड़ नहीं की जा सकती।

हमारे शिक्षक कहते थे की इस मामले में भारती को व्यक्तिगत राहत तो नहीं मिली लेकिन ‘केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ़ केरल’ मामले की वजह से एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत का निर्माण हुआ जिसने संसद की संशोधन करने की शक्ति को सीमित कर दिया। केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ़ केरल मामले के ऐतिहासिक फ़ैसले से कई विदेशी संवैधानिक अदालतों ने भी प्रेरणा ली। कई विदेशी अदालतों ने इस ऐतिहासिक फ़ैसले का हवाला दिया।

लाइव लॉ के मुताबिक़, केशवानंद के फ़ैसले के 16 साल बाद, बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने भी अनवर हुसैन चौधरी बनाम बांग्लादेश में मूल सरंचना सिद्धांत को मान्यता दी ‌थी। वहीं बेरी एम बोवेन बनाम अटॉर्नी जनरल ऑफ़ बेलीज के मामले में, बेलीज कोर्ट ने मूल संरचना सिद्धांत को अपनाने के लिए केशवानंद केस और आईआर कोएल्हो केस पर भरोसा किया। केशवानंद केस ने अफ्रीकी महाद्वीप का भी ध्यान आकर्षित किया। केन्या, अफ्रीकी देश युगांडा, अफ्रीकी द्वीप- सेशेल्स के मामलों में भी केशवानंद मामले के ऐतिहासिक फ़ैसले का ज़िक्र कर भरोसा जताया गया।

देश का दुर्भाग्य ये रहा की संविधान के इस महान रक्षक के निधन की खबर को किसी समाचार संस्‍थान ने अपनी सुर्खी नहीं बनाया। टीवी चैनल रिया चक्रवर्ती में उलझे रहे, और अख़बारों में वे एक कॉलम की खबर बन कर रह गए। केशवानंद भारती किसी राजनीतिक दल के लिए भी महत्‍वपूर्ण नहीं माने गए क्योंकि उनकी अपनी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं थी। वे अगर किसी मंदिर आंदोलन से जुड़े होते तो भी शायद उन्हें याद किया जाता। बावजूद इसके केशवानंद जी क़ानून की दुनिया में अजर-अमर रहने वाले हैं भले ही कोई उनकी प्रतिमाएं लगाए या नहीं। इस अनाम योद्धा के चरणों में मेरा प्रणाम।