गिरीश उपाध्‍याय

पूरी दुनिया में इस बार भी हिन्‍दी दिवस मनाया गया है। वैसे तो हम भारत में हिन्‍दी दिवस 14 सितंबर को मनाते हैं जिस दिन संविधान सभा ने हिन्‍दी को राजभाषा बनाने का संकल्‍प पारित किया था। लेकिन 10 जनवरी 2006 को तत्‍कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहनसिंह के समय हिन्‍दी को विश्‍व स्‍तर पर स्‍थापित करने के लिए विश्‍व हिन्‍दी दिवस मनाने की शुरुआत की गई थी और उसी परंपरा के चलते अब हर साल 10 जनवरी को विश्‍व हिन्‍दी दिवस मनाया जाता है।

हिन्‍दी को लेकर आजाद भारत में जिस तरह की सामाजिक और राजनीतिक बहस हुई है वैसा शायद ही किसी देश में हुआ हो। भारत का संविधान तैयार करने वाली संविधान सभा में भी यह प्रश्‍न बहुत प्रमुखता से उठा था कि भारत की राजभाषा क्‍या होनी चाहिए। इस मुद्दे पर संविधान सभा में पूरे दो दिन बहस हुई थी और अधिकांश सदस्‍यों, खासतौर से उत्‍तर भारत के सदस्‍यों का जोर इस बात पर था कि हिन्‍दी को राजभाषा के रूप में स्‍वीकार किया जाना चाहिए। बहस के दौरान कुछ सदस्‍यों ने राजभाषा से भी आगे बढ़कर हिन्‍दी को राष्‍ट्रभाषा का दर्जा देने की बात कही थी।

ऐसा नहीं है कि संविधान सभा की बहस में हिन्‍दी को लेकर सब कुछ पक्ष में ही रहा था। विरोध वहां भी था। मतभिन्‍नता वहां भी थी। मतभिन्‍नता का स्‍तर क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण से लेकर हिन्‍दी और उसकी लिपि थोपे जाने तक था। आज जो लोग खुद को हिन्‍दी का कट्टर समर्थक कहते हैं उसी विचार के कई लोगों ने उस समय भी अंग्रेजी को पूरी तरह त्‍याग देने का विरोध किया था। इसी तरह उर्दू और फारसी को दरकिनार कर देने की बात पर भी असहमति के स्‍वर उठे थे। हिन्‍दी से ज्‍यादा हिन्‍दुस्‍तानी को अपनाने की बात हुई थी। आज वह सब इतिहास का हिस्‍सा है लेकिन वह ऐसा इतिहास है जो वर्तमान को दिशा देने और देश व समाज को जोड़े रखने का रास्‍ता भी दिखाता है। बशर्ते हम उससे कुछ सीख लेना चाहें तो…

हिन्‍दी को अपनाने में सबसे ज्‍यादा बहस उसके वाचिक स्‍वरूप पर नहीं बल्कि उसकी लिपि को लेकर हुई थी। दक्षिण भारत के कई सदस्‍यों को इस बात पर आपत्ति थी कि बोलचाल के लिए तो हिन्‍दी सीखी जा सकती है लेकिन उसकी लिपि को थोपा नहीं जा सकता। सबसे ज्‍यादा विरोध हिन्‍दी के अंकों को लेकर हुआ था। अनेक सदस्‍यों का मत था कि हिन्‍दी के अंकों के बजाय पूरे देश में ऐसे अंकों का उपयोग होना चाहिए जो न सिर्फ देश के भीतर एकरूपता के साथ ग्रह‍ण किए जा सकें बल्कि अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर भी उनके कारण हमें कोई असुविधा न हो। और यही कारण रहा कि संविधान सभा ने अंकों के लिहाज से अंग्रेजी (रोमन) अंकों को अपनाने का प्रस्‍ताव स्‍वीकार किया।

भाषा को लेकर हुई बहस से संबंधित सत्रों की अध्‍यक्षता भारत के पहले राष्‍ट्रपति रहे डॉ. राजेंद्रप्रसाद ने की थी। पूरी बहस के बाद उन्‍होंने अपने समापन भाषण में कहा था- ‘’मेरे विचार में हमने अपने संविधान में एक अध्याय स्वीकार किया है जिसका देश के निर्माण पर बहुत प्रभाव पड़ेगा। आज पहली ही बार ऐसा संविधान बना है जबकि हमने अपने संविधान में एक भाषा रखी है जो संघ के प्रशासन की भाषा होगी और उस भाषा का विकास समय की परिस्थितियों के अनुसार ही करना होगा।‘’

उनका कहना था- ‘’आज यह कहना सम्भव नहीं है कि भविष्य में हमारी उस भाषा का क्या रूप होगा जिसे हमने आज संघ के प्रशासन की भाषा स्वीकार किया है। मेरे विचार में देश की अन्य भाषाओं के सम्पर्क से उसका और भी विकास होगा। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि हिन्दी देश की अन्य भाषाओं से अच्छी अच्छी बातें ग्रहण करेगी तो उससे इसकी उन्‍नति ही होगी, अवनति नहीं होगी।‘’

हिन्‍दी को लेकर उत्‍तर और दक्षिण के बीच मतैक्‍य उस समय भी नहीं था। इसी का जिक्र करते हुए राजेंद्र बाबू ने कहा था- ‘’इस भाषा को दक्षिण के बहुत से लोगों ने अखिल भारतीय भाषा मान लिया है और इसमें उन्होंने जिस जोश का प्रदर्शन किया है उसके लिये उत्तर भारतीयों को उन्हें बधाई देनी चाहिये, मान्यता देनी चाहिये और धन्यवाद देना चाहिये। यदि आज उन्होंने किसी विशेष बात पर हठ किया है तो हमें याद रखना चाहिये कि आखिर यदि हिन्दी को उन्हें स्वीकार करना है तो वे ही करेंगे, उनकी ओर से हम तो नहीं करेंगे।‘’

अंकों को लेकर हुए विवाद पर राजेंद्र बाबू का कहना था- ‘’हमें छोटे से मामले पर इतनी बहस करने की, इतना समय बर्बाद करने की क्या आवश्यकता है? आखिर अंक हैं क्या? दस ही तो हैं। इन दस में, मुझे याद पड़ता है कि चार तो ऐसे हैं जो अंग्रेजी और हिन्दी में एक से हैं १,२,३ और 0 मेरे ख्याल में चार और हैं जो रूप में एक से हैं किन्तु उनमें अलग-अलग अर्थ निकलते हैं। उदाहरण के लिये हिन्दी का ४ अंग्रेजी के 8  से बहुत मिलता-जुलता है, यद्यपि एक 4 के लिये आता है और दूसरा 8 के लिये। अंग्रेजी का 6 हिन्दी के ७ से बहुत मिलता है, यद्यपि उन दोनों के भिन्न-भिन्न अर्थ हैं। हिन्दी का ९ जिस रूप में वह अब लिखा जाता है, मराठी से लिया गया है और अंग्रेजी के 9 से बहुत मिलता है।‘’

दक्षिण भारत के लोगों की आपत्ति का जिक्र करते हुए राजेंद्र बाबू ने बहुत सुंदर उदाहरण दिया था। उन्‍होंने कहा था- ‘’हमें अपने मित्रों की भावनाओं का आदर करना है। हम उनसे हिन्दी स्वीकार करवाना चाहते थे और उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया, और हम उनसे देवनागरी लिपि को स्वीकार करवाना चाहते थे, वह भी उन्होंने स्वीकार कर ली। वे हमसे भिन्न प्रकार के अंक स्वीकार करवाना चाहते थे, उन्हें स्वीकार करने में हमें कठिनाई क्यों होनी चाहिये? इस पर मैं छोटा सा दृष्टान्त देता हूं जो मनोरंजक होगा। हम चाहते हैं कि कुछ मित्र हमें निमंत्राण दें। वे निमंत्रण दे देते हैं। वे कहते हैं, आप आकर हमारे घर में ठहर सकते हैं, उसके लिये आपका स्वागत है। किन्तु जब आप हमारे घर आयें कृपया अंग्रेजी चलन के जूते पहनिये, भारतीय चप्पल मत पहनिये, जैसी कि आप अपने घर में पहनते हैं। तो उस निमंत्रण को केवल इसी आधार पर ठुकराना मेरे लिये बुद्धिमत्‍ता नहीं होगी कि मैं चप्पल को नहीं छोड़ना चाहता। मैं अंग्रेजी जूते पहन लूंगा और निमंत्रण को स्वीकार कर लूंगा। इसी सहिष्णुता की भावना से राष्ट्रीय समस्याएं हल हो सकती हैं। हमारे संविधान में बहुत से विवाद उठ खड़े हुये हैं और बहुत से प्रश्न उठे हैं जिन पर गम्भीर मतभेद थे, किन्तु हमने किसी न किसी प्रकार उनका निबटारा कर लिया। यह सबसे बड़ी खाई थी जिससे हम एक दूसरे से अलग हो सकते थे। हमें यह कल्पना करनी चाहिये कि यदि दक्षिण हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि को स्वीकार नहीं करता तब क्या होता।‘’

तो जो लोग आज हिन्‍दी को लेकर दिवस भर मना लेते हैं या फिर उसे अपने अपने राजनीतिक, सामाजिक और क्षेत्रीय कारणों या हितलाभों से जोड़ते हुए विवाद का विषय बना लेते हैं उन्‍हें संविधान सभा में इस मुद्दे पर 13 और 14 सितंबर 1949 को हुई बहस को बहुत ध्‍यान से पढ़ना चाहिए। वह प्रमाण है इस बात का कि जिस पीढ़ी ने हमें आजादी दिलाई, वह पीढ़ी आजाद भारत के सामने आने वाले मुद्दों को लेकर कितनी गंभीर थी। और उससे भी बड़ी बात  कि वो पीढ़ी तमाम मतभेदों, आग्रहों आदि के बावजूद किस तरह सामंजस्‍य और सहमति का रास्‍ता खोजने की चाह रखती थी। आज ऐसी चाह का अभाव नजर आता है।