आशुतोष राणा का ‘रामराज्य’

-पुस्‍तक समीक्षा- 

विजयमनोहर तिवारी

आशुतोष राणा को अब तक परदे पर देखा था। वे सिनेमा जगत के प्रभावशाली अभिनेता हैं। ‘रामराज्य’ उनका एक बिल्कुल ही नया परिचय है। उनकी दूसरी किताब है। वे फिल्मी दुनिया पर कुछ लिखते, मुंबई की पृष्ठभूमि में कोई उपन्यास लिख देते या हिंसा और सेक्स से भरी कोई ऐसी सनसनीखेज कहानी, जिस पर कोई उत्तेजक वेब सीरीज बन जाए तो शायद उतना ताज्जुब नहीं होता, जितना उनकी इस किताब ने चौंकाया। 320 पेज की इस किताब के 11 अध्यायों में आशुतोष राणा त्रेतायुग के अमर पात्रों में गहरे उतरे हैं। लेखक के रूप में उनका लोहा मनवाने वाली रचना है-रामराज्य।

यह कोई ऐसी साहित्यिक रचना नहीं है, जो रामायण के प्रचलित संस्करणों को पढ़कर किसी नए दृष्टिकोण को सामने ले आई हो। यह रामायण के कुछ पात्रों और कुछ स्थानों का सतही वृत्तांत भी नहीं है। किताब के 11 अध्याय कुछ पात्रों पर हैं, जैसे- कैकेयी, शूर्पनखा, हनुमान, कुंभकर्ण, विभीषण, रावण और सीता। कुछ स्थानों के नाम पर हैं, जैसे- पंचवटी और लंका। इन सबमें राम तो अपने आभामंडल के साथ जीवंत हैं ही। एक तरह से ये एक दूसरे से गुंथे हुए ऐसे दृश्य हैं, जो राम के समय की घटनाओं और पात्रों को बिल्कुल ही नए ढंग से समझने का अवसर देते हैं।

कसे हुए संवाद, शब्दों का सर्वश्रेष्ठ चयन, बेजोड़ उपमाएं और रूपक आशुतोष की परिपक्व लेखनी का परिचय तो कराते ही हैं, लेकिन ऐसी अभिव्यक्ति अध्यात्म में गहरे गोते लगाए बिना संभव नहीं है। रूखे-सूखे किताबी संदर्भों से यह पन्ने काले करने जैसा उबाऊ साहित्यिक अभ्यास नहीं है, न ही यह स्वांत: सुखाय के लिए कुछ लिख दिया गया है। इसे पढ़ना कहानी में उतरने और पात्रों के आसपास उपस्थित रहने जैसी अनुभूति का विषय है। यह किताब राम के युग की एक रोमांचक यात्रा है, जो रामकथा के चुनिंदा पात्रों की सूक्ष्म छानबीन में अपने पाठकों को ले जाती है और उसके बाद उस पात्र की प्रचलित छवि से हटकर कुछ नया ही चित्र आपके सामने आता है।

पहला अध्याय कैकेयी पर है। भरत की मां, जो रामायण में अपने बेटे के राज्याभिषेक के लिए अचानक खलनायिका के रूप में सामने आती है और कहानी का रुख बदल देती है। राम की जीवनगाथा की एक ऐसी पात्र, जिसके एक निर्णय ने अयोध्या को इतिहास के एक चिर निंदनीय मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था और वह अकेली स्त्री राजपरिवार के बिखराव का कारण बन गई थी। ‘रामराज्य’ की कैकेयी से साक्षात्कार के पहले एक बार फिर विचार कीजिए कि क्या वह सचमुच अपने प्रिय पुत्र के लिए अयोध्या का सिंहासन चाहती थी? क्या राज्याभिषेक के अवसर पर वह राम उसके लिए सौतेले हो गए थे, जिनकी महानता को गढ़ने में बाल्यकाल से उसके भी हाथ एक कुशल शिल्पी की तरह लगे थे?

कौशल्या ने तो राम को जन्म दिया था, लेकिन राम से बड़ा राम का नाम बनाने की योजना इसी दूसरी मां की थी। यहां आप इसी महान कैकेयी से रूबरू होते हैं। आशुतोष के रामराज्य की कैकेयी बिलकुल ही एक नए रूप में सामने है। एक अनुकरणीय मुद्रा में भरत की मां को देखना आनंदविभोर करने जैसा अनुभव है। ऐसा कि पाठक उसके प्रति निंदा नहीं श्रद्धा से भर जाएं। उसे ऐसा ही चित्रित किया गया है। वनवास से पहले के हिस्से में राम और कैकेयी ही हैं। कौशल्या तो कहीं परदे के पीछे हैं।

भारत में गाई गई सबसे महान गाथा की ऐसी इकलौती पात्र है कैकेयी, जिसके सबसे विकट निर्णय के पीछे जब आप किसी और को नहीं, राम को देखते हैं तो राम चौंकाते भी हैं और उनके व्यक्तित्व की गहराई अथाह मालूम पड़ती है। राम वनवास गए, दशरथ के तो प्राण छूटे, अयोध्या सूनी हो गई और भरत राजा होते हुए भी संन्यासियों जैसे 14 साल राम के आगमन की प्रतीक्षा में रहे, लेकिन सबसे बड़ी कीमत कैकेयी ने चुकाई। राम को वनवास भेजकर अपने पुत्र के हित में लिए गए एक लालची निर्णय का कलंक लगते ही इतिहास ने उसे सदा-सदा के लिए अपयश का भागीदार बना दिया।

कैकेयी को रचने में आशुतोष राणा की दृष्टि को किताब के कुछ कसे हुए संवादों से समझा जा सकता है। राम के मानस को परिपक्व बनाने में कैकेयी का क्या योगदान था, राम का एक प्रभावी संवाद है, जिसमें वे बता रहे हैं कि कौशल्या कैकेयी के बारे में क्या कहती हैं। राम बता रहे हैं-‘बोलती हैं कि यदि मेरा वश चलता तो मैं तुझे कभी बड़ा नहीं होने देती। लोगों की रुचि होगी तेरी रामलीला में लेकिन मेरी रुचि तो तेरी बाल लीला में ही है। और एक ओर तुम थी मां, जो मुझे खींच-खींचकर जल्दी से बड़ा कर देना चाहती थीं। तुम छोटे से राम से भी बड़े-बड़े काम करवाती थीं। तुम चाहती थीं राम भले ही छोटा रहे लेकिन उसके काम बड़े होने चाहिए, क्योंकि बड़े-बड़े कामों से ही व्यक्ति का नाम बड़ा होता है। तुम लोगों से कहा करती थीं कि राम से बड़ा राम का नाम।’

कैकेयी की महान् भूमिका कौशल्या के गर्भ से जन्म लेने वाले एक नर को नारायण में रूपांतरित करने की है। राम कहते हैं-‘मां, नर को तो साधारण स्त्रियां भी जन्म दे लेती हैं किंतु नर को नारायण में रूपांतरित करने के लिए असाधारण संकल्प शक्ति की आवश्यकता होती है। और तुम असाधारण हो।’ और तब कैकेयी कहती हैं- ‘मैं असाधारण नहीं हूं राम। वे संतानें ही होती हैं, जो अपनी दिव्यता से एक सामान्य-सी स्त्री को असाधारण मां के रूप में प्रतिष्ठा दिलाती हैं।’

सभी अध्यायों से होकर गुजरने के बाद मैं कहूंगा कि यह किताब सिर्फ इस पहले अध्याय के लिए ही पढ़ना चाहिए। देखा जाए तो हर अध्याय अपने आप में एक पूरी कहानी है। राम भारतीय जनमानस में रचे-बसे एक ऐसे पात्र हैं, जिनके बारे में पढ़ते हुए एक सहज श्रद्धा पाठकों के मन में होती है। लेखक ने राम के उसी मनोहारी रूप को अपनी रोचक रचना में निखारा है। हर पात्र को परदे पर उतारने के लिए जैसे कैमरे का सर्वश्रेष्ठ कोण चुना जाए, यह पुस्तक कुछ इसी तरह रामकथा के प्रमुख पात्रों को आंखों के सामने लाती है। राम को रावण के सम्मुख प्रस्तुत करने का निमित्त बनी सुपर्णा-शूर्पणखा पर सबसे लंबा अध्याय है।

पंचवटी के निकट वह दृश्य सिनेमाई प्रभाव सा रचता है, जब रावण की रूपवती बहन एक जनशून्य स्थान पर मंदाकिनी के जल में एक प्रभावशाली दिव्य पुरुष को दूर कहीं से देखती है। वह एक बाहुबली सा व्यक्तित्व है, जो इधर मंदाकिनी में डुबकी लगा रहा है और उधर सुपर्णा का ह्दय तूफानी समुद्र में बदल जाता है। लंका से दूर रावण के राज्य की इस सीमा पर सुपर्णा को अपने पति के हत्यारे, भ्राता परमवीर रावण की जीवनगाथा समाप्त करने के लिए एक सुपात्र मिल जाता है।

और अब ‘सीता परित्याग’। अयोध्या की राज्यसभा में प्रस्तुत होने के पहले राम और सीता का अत्यंत मार्मिक संवाद है जो उनके गहरी समझ से भरपूर संबंधों की परतों को खोलता है और सीता के हर प्रश्न पर राम अपनी मर्यादा की चमक के साथ ही उत्तर देते हैं। यह लंबा संवाद राम के जीवन की लीला के दूसरे विकट मोड़ पर है, जब वे सीता के चरित्र पर उठाए गए प्रश्नों का सामना सार्वजनिक रूप से कर रहे हैं और एक अंतिम निर्णय राजा के रूप में उन्हें लेना है।

इस संवाद से गुजरते हुए पाठक राम और सीता के संबंधों की अपार गहराई उनकी आपसी समझ की ऊंचाई के दर्शन करते हैं और तब अंतिम निर्णय का दृश्य स्वत: ही एक लीला से गुजरने जैसा होता है, जब सीता के साथ हुए अन्याय की कोई टीस शेष नहीं रह जाती। राजसभा में दिए अपने अंतिम निर्णय में राम के मुख से त्याग और परित्याग के अंतर को लेखक ने इस सुंदर संवाद से स्पष्ट किया है- ‘स्वयं के संतोष और संताप के निवारण के लिए किसी को मन, कर्म और वचन से सदा के लिए तजना ‘त्याग’ कहलाता है, किंतु ‘पर’ के असंतोष और असुविधा के निवारण के लिए किसी का त्याग करना ‘परित्याग’ की श्रेणी में आता है। मैं सम्राट राम, सीता को स्वयं में धारण करते हुए प्रजा के असंतोष को समाप्त करने के लिए उनका त्याग नहीं परित्याग करता हूं।’

सीता के परित्याग के साथ ही रामराज्य का अंतिम संक्षिप्त दृश्य है, जिसमें भगवान शिव बाहर से अन्यायपूर्ण दिखाई वाले निर्णय के न्यायपूर्ण होने की घोषणा करते हुए कहते हैं कि आपने अपने एक निर्णय से माता सीता के धवल चरित्र की ओर आने वाले सभी शंका, संदेह, कलंक के बाणों को अपनी ओर मोड़कर स्वयं को ही भेद लिया और उनके संपूर्ण चरित्र को सृष्टि के अंत तक निष्कलंक रहने की व्यवस्था बना दी! वे शंकालु और पतित होते समाज के बीच से सीता जैसी सर्वोच्‍च चेतना को निकालकर महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में स्थित करने के निर्णय को उचित ठहराते हैं और राम के इस निर्णय की तुलना संसार के कल्याण के लिए अपने कंठ में धारण विष से करते हैं।

मुक्त कंठ से राम की प्रशंसा में महादेव कहते हैं- ‘प्रभु, देखा जाए तो यह आपके द्वारा किया गया सच्चा प्रायश्चित है जो माता के एक बार अग्निपरीक्षा देने के एवज में आप आज स्वयं ही सदा-सदा के लिए अग्नि में बैठ गए।’ अपने हर अध्याय में पाठकों को बांधे रखने में सफल इस पुस्तक की यह अंतिम पंक्तियां हैं।

‘रामराज्य’ की कल्पना रामेश्वरम् में की गई थी। वह 2017 की बात है, जब दद्दाजी के नाम से प्रसिद्ध आशुतोष राणा के गुरु देवप्रभाकर शास्त्री ने यहां यज्ञ की आकांक्षा प्रकट की थी और वे तैयारियों के सिलसिले में रामेश्वरम् गए हुए थे। नवंबर में यज्ञ होना था और वे अक्टूबर में लौटकर जब मुंबई आए तो पहला अध्याय लिखा था- ‘हनुमान।’ दो दिन में पूरा हुआ यह अध्याय इस कथा का बीजारोपण था। यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद दिसंबर 2017 में दूसरा अध्याय लिखा, जो अंतिम पड़ाव है।

दो कड़ियों के अस्तित्व में आने के बाद यह रचना एक लंबे अंतराल में रही और ठीक एक साल बाद 2018 के अंत में ‘कैकेयी’ लिखा गया, जो मूल रूप से कथा का प्रवेश प्रसंग है। फिर शेष कड़ियों को पूरा होने में एक और वर्ष लग गया। आशुतोष न भी कहें तो यह रचना उन पर उतरी गुरु कृपा का ही परिणाम है। यह सिनेमा जगत के एक अभिनेता से बिल्कुल अपेक्षित नहीं है कि वह लिखने के लिए ऐसा विषय चुने।

अदाकार अगर कुछ लिखते भी हैं तो वह उनकी आत्मकथा होती है। देवानंद, दिलीप कुमार, राजेश खन्ना, प्राण और प्रेम चोपड़ा ने भी लिखा है, जो उनकी अपनी कहानियां हैं। या तो उन्होंने ही लिखीं या उनके कहे को किसी ने कागज पर समेटा। ये उनकी सिनेमाई सफलता की कहानियां हैं। रामराज्य एक अदाकार की रचना जरूर है लेकिन यह भारत की स्मृतियों में अमर अयोध्या के राजकुमार की महागाथा के किरदारों से ताजा परिचय कराती है।

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