कमलेश पारे

जनसंपर्क और पत्रकारिता में पिछले पचास सालों से एक सुपरिचित नाम श्री रवींद्र पण्ड्या के आगे ‘स्वर्गीय’ शब्द लगाने में अभी तो हाथ भी कांप रहे हैं। लेकिन, यह एक कड़वा सच है कि अपने समय में तेजस्वी पत्रकार रह चुके व श्रेष्ठ जनसंपर्क कर्मी श्री रवींद्र पण्ड्या का देहावसान हो गया। पण्ड्या जी को जानने वाले यह जरूर जानते रहे कि वे ‘दिल’ और ‘दिमाग’ के एक बेहतरीन इन्सान थे। अपने काम  को वे दिल से प्यार करते थे। महत्वपूर्ण जगहों पर रहकर जरूरतमंद की मदद का कोई न कोई रास्ता वे निकाल ही लेते थे।

मध्यप्रदेश सरकार के जनसंपर्क विभाग में जनसंपर्क अधिकारी की हैसियत से नौकरी शुरु करने वाले श्री रवींद्र पण्ड्या विभाग के अपर संचालक पद से सेवानिवृत्त हुए थे। इस सेवाकाल में उन्होंने सर्वाधिक समय प्रदेश के चार मुख्यमंत्रियों स्वर्गीय सुंदरलाल पटवा, सुश्री उमा भारती, बाबूलाल गौर और शिवराज सिंह चौहान के कार्यालयों में जनसंपर्क प्रमुख की हैसियत से बिताया था। पटवा जी जब केन्द्र सरकार में ग्रामीण विकास के मंत्री बने थे तब वे पण्ड्या जी को अपना विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी बना कर दिल्ली ले गये थे।

मुझे बहुत अच्छे से स्मरण है कि 1975 में सीधे जनसंपर्क अधिकारी चयनित होकर पण्ड्या जी ग्वालियर में पदस्थ हुये थे। उनकी खंडवा पदस्थी के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरेंद्र कुमार सखलेचा ने उन्हें मध्यप्रदेश के दिल्ली कार्यालय में जनसंपर्क प्रमुख का दायित्व दिया था। पूरे सेवाकाल में वे एक तेजस्वी, सक्रिय और कर्मठ अधिकारी माने जाते रहे पंड्याजी के बारे में उनके एक पुराने अधिकारी श्री ओ. पी. रावत ने उनके बारे में आज सही ही लिखा है कि वे Head and heart के finest soul थे।

मैं श्री रवींद्र पण्ड्या को 1970 से जानता रहा, जब वे रायपुर से प्रकाशित होने वाले ‘युगधर्म’ में सह सम्पादक थे। उनके तत्कालीन सम्पादक स्वर्गीय बबन प्रसाद मिश्र उन्हें खूब कठिन कठिन काम देते थे और एक तेजस्वी युवा पत्रकार के रुप में पण्ड्या जी वे काम कर भी लेते थे। ‘युगधर्म’ रायपुर शहर का यूं तो तीसरे नम्बर का अखबार था, लेकिन अपनी धारदार खबरों के मान से वह कई बार दो बड़े अखबारों को भी मात देता रहता था।

पण्ड्या जी की प्रतिभा को पहचान कर ‘नवभारत’ के प्रबंधन ने उन्हें अपने साथ जोड़ लिया था । वहीं मैं और वे साथी बने थे। मैंने पाया था कि खबरों और उनमें छुपी बड़ी खबरों को पहचानने का उनका अद्भुत गुण उन्हें बहुत ही तेजस्वी बनाता था। इसे आप यदि अतिशयोक्ति न मानें, तो मेरा विश्वास कीजिये कि ‘आपातकाल’ की औपचारिक घोषणा के लगभग एक सप्ताह पहले से वे जब हमको कहते थे कि कुछ बहुत बड़ा होने वाला है, तो हम भरोसा नहीं करते थे।

आपातकाल की घोषणा वाले दिन, तमाम बन्दिशों के बावजूद अखबार का एक संस्करण दिन के लगभग एक बजे बाजार में आया था। उसकी सज्जा देखने लायक थी, क्योंकि पण्ड्या जी ने उसमें जान लगा दी थी, और हमारे सम्पादक स्वर्गीय गोविन्दलाल जी वोरा ने उसके लिये पूरी आजादी भी दी थी। जिस दिन आपातकाल लगा था उस दिन सुबह प्रखर समाजवादी नेता श्री मधु लिमये हमारे कार्यालय में टेलीप्रिंटर पर देश दुनिया की खबरें देखने आये थे। उन्होंने पण्ड्या जी को उनके घर के नाम ‘राजू’ कहकर सम्बोधित किया तो हममें से कई हक्के बक्के रह गये थे।

आपातकाल लगने के पहले एक रिपोर्टर की तरह उन्होंने कुछ खबरें की थीं, जिन पर उस समय सहज किसी को विश्वास नहीं हुआ था। लेकिन धीरे धीरे जब वे सच हुईं, तब लगा कि वे आला दर्जे के ‘खबरनवीस’ हैं, और उनके समाचार सूत्र बहुत ऊंचे व विश्वसनीय हैं। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक स्वर्गीय बाला साहब देवरस भी उन्हें उनके घर के नाम ‘राजू’ से ही सम्बोधित करते थे।

वे स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे के अत्यंत प्रिय पारिवारिक सदस्य रहे। ठाकरे जी कई बार विश्वास और स्नेहवश उनसे कुछ गम्भीर और गोपनीय बातें भी कर लेते थे। ठाकरे जी के अन्तिम समय तक वे उनकी चिंता करते दिखे थे। ठाकरे जी की कई कुंठाओं को पेट में दबाए रखकर आज पण्ड्या जी चले गये।

सागर मूल के श्री रवीन्द्र पण्ड्या इन्जीनियर बनने की ख्वाहिश लिये भोपाल आये थे, व तत्कालीन एमएसीटी में भरती हुये थे। सार्वजनिक जीवन की विभिन्न रुचियों के कारण इंजीनियरिंग तो उन्हें नहीं जमी और वे पत्रकार बन गये। एमएसीटी के उनके सहपाठी श्री शैलेंद्र प्रधान (पूर्व विधायक) ताजिंदगी उनके घनिष्‍ठ मित्र रहे। इंजीनियरी की पढाई छोड़कर वे अहमदाबाद चले गये। वहीं से स्नातक होकर रायपुर आये और रविशंकर विश्वविद्यालय द्वारा नये नये शुरु हुये पत्रकारिता के स्नातक पाठ्यक्रम में भरती होकर वह परीक्षा प्रावीण्‍य सूची में स्‍थान पाते हुए उत्तीर्ण की।

पण्ड्या जी पर टिप्पणी करते हुये उन्हें ‘हेड एण्ड हार्ट’ का बेहतरीन व्यक्ति कहना उनका सही मूल्यांकन है। लेकिन सम्पर्कों और सम्बन्ध निभाने में भी वे उतने ही बेहतरीन इन्सान थे। दुनिया और समाज के प्रत्येक बदलाव पर वे दूर तक देखकर, उसके परिणामों पर बात करते थे। वाक़ई में वे जितना पढते थे, उतना तो सामान्य व्यक्ति छपे हुए शब्दों को देख भी नहीं पाता है। पढ़ने, समझने और लिखने की उनकी तीव्रता क़ाबिले तारीफ़ थी। बात मानिये अपने पचास साल के परिचय में बड़े से बड़े तनाव के क्षणों में भी मैंने उन्हें खुद को तनाव में नहीं देखा।

जनसंपर्क के काम में जिस पीढी से उन्होंने कमान ली थी, वह अद्भुत विद्वानों और ज्ञनियों की टोली थी। उन्होंने अपने विभागीय पूर्वजों के यश को बढाया ही था, कम नहीं होने दिया। उनके जाने से प्रदेश ने एक बेहतरीन विचारक, एक द्रष्टा पत्रकार, एक सम्वेदनशील जनसंपर्क कर्मी और नायाब दोस्त खो दिया है।
(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं)