इन आंखों में कृतज्ञता को पढि़ये

रमाशंकर सिंह 

लाल साड़ी में आंखी दास जी हैं जो भारत में फ़ेसबुक कंपनी की मुख्य अधिकारी हैं और फ़ेसबुक को नियंत्रित कर उसे कैसे एक राजनीतिक पक्ष या विचार की ओर झुकाना है यह तय कर सकती हैं, बल्कि करती आई हैं। आंखी जी अपने अमेरीकी मालिकों पर यह दबाव बनाये रखती हैं कि यदि ऐसा नहीं किया तो भारत से व्यापार में घटोतरी संभव है। यानी मुनाफ़ा व्यापार के लिये फ़ेसबुक अपनी निष्पक्षता को बलाये ताक रख सकता है, रखता आया है। अमेरिकी कंपनी से निष्पक्षता की उम्मीद हर बार रेगिस्तान में पहुँच जाती है।

लेकिन आंखी जी का पाप इससे भी ज़्यादा बड़ा है। भारत में फ़ेसबुक ने सांप्रदायिक ज़हर को बढ़ाने में मदद की और पक्षपातपूर्ण ढंग से फ़ेसबुक मेट्रिक्स को इस प्रकार नियंत्रित रखा कि एक विशेष पक्ष के ज़हरीले बोल, भाषण, लेख, चित्र, मीम्स आदि बढ़ते गये और दूसरे पक्ष का गला घोंट कर रखा गया।

इस बीच छोटे और मध्यम आकार के कई दंगे हुये, मॉब लिंचिंग हुई और लोग मारे गये और फ़ेसबुक इन सबमें सक्रिय अपराधियों के प्रच्छन्न मददगार की भूमिका में रहा। हत्याओं का प्रकारांतर से प्रेरक भी। चुनावों में इस पक्षपात का असर स्पष्ट दिखा और फ़ेसबुक समर्थित पक्ष सत्ता में आया यानी एक विदेशी कंपनी का यहां भी निंदनीय रोल रहा। यह सब अमेरिकी समाज में होता तो कई ‘वॉटरगेट’ हो चुके होते।

लेकिन क्या मात्र मुनाफा ही आंखीदास जी को प्रेरित कर रहा था? जो यह मानेंगे व सोचेंगे तो सबसे बड़ी भूल कर जायेंगे। पिछले सत्तर बरसों में भारतीय लोकतंत्र में तिल-तिल, इंच-इंच धीरे-धीरे जीवन के हर क्षेत्र में सुनियोजित ढंग से एक वृहद योजना के अंतर्गत एक विचार विशेष के लोग बनाये गये और वे हर स्थान पर पैठ गये। यह ऐसा महाअभियान था जो अंधी बहरी विलासी और सत्ताभिमान से लबरेज़ कांग्रेस को तो दिखना ही न था अन्यों को भी नहीं दिखा क्योंकि वे तो संसद में सीटें गिन रहे थे।

जब 1984 के सिख नरसंहार के बाद हिंदू भावनाओं के उफान पर राजीव गांधी सत्ता में आये तो यह सफलतापूर्वक सिद्ध और तय हो गया कि भारतीय लोकतंत्र की नसों में पंथिक ज़हर पूरी तरह घुल चुका है। जिन्होंने वह दंगा अपनी आँखों से देखा है, उन्होंने उस समय भड़काऊ कांग्रेसी नेताओं के पीछे खड़े स्वयंसेवक भी देखे होंगे और दक्षिणपंथ के तत्कालीन सर्वोच्च सांगठनिक नेता नानाजी देशमुख का बयान भी, जिसमें सिख-विरोधी हिंसा का बचाव किया गया था। मैं उस समय गलियों गाँवों में था, सिखों को सुरक्षा देते हुये।

पंथिक विष पर आधारित लोकतंत्रीय राजनीति की बुनियाद उस दिन पड़ गई थी। हमेशा की तरह अंधी कांग्रेस अपनी अभूतपूर्व विजय से मिली सीटों पर घमंड कर रही थी और दो सीट पाने वाली पार्टी चुपके से, मंद मंद मुस्करा रही थी क्‍योंकि उसे केंद्र की सत्ता में पहुँचने का रास्ता साफ़ दिख चुका था।

कांग्रेस ने नेहरू के बाद भावी समाज के निर्माण बाबत न कभी सोचा, न कुछ किया। कांग्रेस ने विकलांग सरकारी स्कूल बनाये तो दूसरी ओर हजारों ‘शिशु मंदिर‘। सरकारी स्कूल मरते चले गये और हज़ारों स्वयंसेवक सेवाभाव व मिशन की ख़ातिर वहां खप गये, जिन्होंने कम से कम तीन पीढ़ियों को अपने विचार से प्रशिक्षित कर दिया था। इनमें से साक्षर कमजोर छात्र पैदल सैनिक बन गये और मेधावी आगे निकल कर सब क्षेत्रों में फैल गये लेकिन मौन रह कर और ठीक समय का इंतज़ार करते रहे। जैसे ही 2013 में कमजोर कड़ी दिखी, उन्होंने खादी व गांधी टोपी पहने, पर सोचने में असमर्थ, एक बूढ़े को आगे कर दिया और पीछे लग गये केजरीवाल, योगेन्द्र यादव, आनंदकुमार, राजमोहन गांधी और प्रशांतभूषण वग़ैरह जैसे तमाम स्वच्छ सामाजिक छवि के नादान लोग।

सैकड़ों युवा अपनी अच्छी-अच्छी नौकरियों को छोड़कर इस ‘दूसरी क्रांति’ में जुट गये। मंच के सामने हजारों साधारण स्वयंसेवक बैठते थे और मंच पर बैठे इन मूर्ख नेताओं को यह गुमान हो गया कि यह उनकी लोकप्रियता है। मंच पर एक भी स्वयंसेवक नहीं आया, वे सब नेपथ्य में रहे। जब लक्ष्य पूर्ति के बाद डिलीट बटन दबाया गया तो बूढ़ा आदमी अपने गांव पहुँच गया और दिल्ली की लंगड़ी लूली सरकार व अधूरे राज्य की सत्ता पर समझौता हो गया। 2014 में पहले से ही तैयार सारी मीडिया, न्यायपालिका, नौकरशाही , टैक्नोक्रेट्स और बूथ पर खड़ा प्रहरी एक दिशा में जुट गये और कांग्रेस का स्वाभाविक हश्र हुआ, ऐतिहासिक पतन।

अभी भी मृत्युशैय्या पर अंतिम साँसें गिन रहा बीमार मुख्य विपक्षी दल इस भ्रम में हैं कि जनता बदलेगी और वे केंद्र में सत्तासीन हो जायेंगे। जनता तो बदलेगी पर बूथ पर वोट कोई दूसरा लूट ले जायेगा। बूथ पर कोई दस घंटे बैठने वाला कार्यकर्ता अब बचा ही नहीं है, नहीं तो बूथ पर बैठा कांग्रेसी ही बिक जायेगा, यदि जीत भी गये तो विजयी विधायक या सांसद बिक जायेगा। निरपेक्ष, निष्पक्ष विवेचन कांग्रेस को करना नहीं होता है तो हर चुनाव में यही हाल होगा, चालीस पचास लोग निजी काम के दम पर जीतते रहेंगे और भारत में लोकतंत्र का भ्रम बना रहेगा।

पाखी दास जैसे लाखों स्वयंसेवक हमेशा अलग-अलग स्थानों पर जैसे अदालतों, मीडिया, नौकरशाही, प्रायवेट कंपनियों, स्कूलों विश्वविद्यालयों, चुनाव आयोग में बने रहेंगे और एकाध बार यदि चुनावों में भारी जनरोष के कारण हार भी गये तो अगली बार वे फिर से आ जायेंगे।

घबरा कर अब पूछा जायेगा कि रास्ता क्या है? रास्ता बताऊँगा तो उस पर चलना इनके बस की बात नहीं है। जब लगेगा कि सचमुच की इच्छा है तो फ़ेसबुक पर नहीं बताऊँगा इसलिये नहीं कि गोपनीय है बल्कि इसलिये कि वह करने की चीज़ है और पीढ़ियों को खपाने की बात है जो सिर्फ़ और सिर्फ़ एक उस भुलाये गये बूढे के रास्ते पर चल कर होगा जिसकी हत्या किसी एक विचार ने की पर वैचारिक हत्या उसके ही घोषित वैचारिक परिवारवालों ने कर दी थी।

(चित्र में आँखों को मत देखो, आँखों में कृतज्ञता के भाव को पढ़ो!)

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