अरुण कुमार त्रिपाठी

जब समाजवादी सिद्धांतों और आदर्शों पर दक्षिणपंथ और वामपंथ दोनों ओर से हमले हो रहे हों तो आचार्य नरेंद्र के विचार और कर्म समाजवादी नैतिकता के प्रकाश स्तंभ की तरह खड़े दिखते हैं। एक ओर आज की समाजवादी पार्टी की जीत की संभावना पर टिप्पणी करते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री कहते हैं कि उसके सत्ता में आने का मतलब है अपहरण, लूटपाट और अराजकता। तो दूसरी ओर इस प्रकार के आरोप लगाने वालों की कमी नहीं है कि इस देश में हिंदुत्ववादियों को मान्यता और वैधता दिलाने में समाजवादियों का बड़ा योगदान है। वरना महात्मा गांधी की हत्या के बाद वे अप्रासंगिक हो गए थे। ऐसे में अतीत के फैजाबाद और आज के अयोध्या के रहने वाले अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्वान, विचारक और राजनेता आचार्य नरेंद्र देव के जीवन में झांकना और उनके विचारों का पुनर्पाठ करना न सिर्फ समाजवादियों, साम्यवादियों और कांग्रेसियों के लिए आवश्यक है बल्कि भारतीय राजनीति के सभी कोनों को प्रदीप्त करने के लिए जरूरी है।

आज की अयोध्या को प्रतीक बनाकर जहां मर्यादा पुरुषोत्तम रामचंद्र जी के मंदिर निर्माण के साथ रामराज्य लाने का दावा किया जा रहा है उसी अयोध्या में घूम कर और लोगों से बात करके देखिए, न तो वहां धर्म की नैतिकता मिलेगी और न ही राजनीति की शुचिता। धर्म का अर्थ हो गया है दूसरे धर्म को नीचा दिखाना और उसे तुच्छ बताना। जबकि राजनीति का अर्थ हो गया है अपराधियों की जय जयकार और अपने ऊपर लगे आपराधिक मुकदमे हटाकर दूसरे को अपराधी बताना।

अयोध्या में दीपावली पर लाखों दीए जलाने की जब होड़ मचेगी तब गोपाल दास नीरज का वह गीत याद आएगा कि- जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना, अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए। सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी। मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी, कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी।…कटेंगे तभी यह अंधेरे घिरे अब, स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए। इन अर्थों में आचार्य नरेंद्र देव ऐसे अयोध्यावासी मनुज थे जो स्वयं दीप का रूप धर कर आए थे। आज अगर भारतीय राजनीति से नफरत, दमन, शोषण और असमानता का अंधेरा मिटाना है तो हमें नरेंद्र देव की नैतिकता के लाखों दीप जलाने होंगे।

अज्ञानियों के अंधकार के इस युग में नरेंद्र देव की नैतिकता एक ज्ञानी की राजनीतिक विनम्रता और त्याग का प्रतीक है। वे संस्कृत, हिंदी, उर्दू, फारसी, बांग्ला, पाली, फ्रैंच, जर्मन भाषाओं के विद्वान थे। वे प्रिंस क्रोपटकिन से लेकर इवान तुर्गनोव और कार्लमार्क्स के संपूर्ण साहित्य पर अपना अधिकार रखते थे। वे बौद्ध धर्म के आधिकारिक विद्वान थे और उनकी बौद्ध धर्म दर्शन नामक पुस्तक को साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला था। वे लखनऊ विश्वविद्यालय और काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति थे। उन्होंने 1934 में पटना में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन के समय उसकी अध्यक्षता की थी।

आचार्य नरेंद्र देव समाजवाद के पितामह कहे जाते थे। वे 1940 से 1941 फिर 1942 से 1945 तक जेल में रहे थे और उन्हीं के सहयोग से उनके समवय पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अहमद नगर जेल में डिस्कवरी आफ इंडिया लिखी थी। उन्होंने 1942 में फैले उस राजनीतिक विभ्रम को दूर किया था कि अगर कांग्रेस ने आजादी की लड़ाई छेड़ी तो वह पीपुल्स वार का विरोध होगा और साम्राज्यवादी युद्ध को समर्थन होगा। उन्होंने जेल में रहते हुए वसुबंधु के प्रसिद्ध ग्रंथ अभिधम्म कोश का फ्रैंच से हिंदी में अनुवाद किया था। स्वयं महात्मा गांधी ने 1941 में जेल से निकलने पर उनकी सेवा की थी।

ऐसे महान व्यक्तित्व के धनी आचार्य नरेंद्र देव के लिए उस समय कांग्रेस से अध्यक्ष पद से लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तक का हर पद प्रस्तावित था। लेकिन उन्होंने किसी पद को स्वीकार ही नहीं किया। वे 1917 से लेकर 1948 तक अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे और आजीवन मार्क्सवादी होते हुए भी मार्क्सवादी दर्शन को भारतीय दर्शन और नैतिकता से समृद्ध करते रहे। उनका मार्क्सवाद कम्युनिस्ट पार्टी के मार्क्सवाद से अलग था। वे द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की बजाय द्वंद्वात्मक यथार्थवाद में यकीन करते थे। लेकिन मार्क्सवाद में सामाजिक परिवर्तन के लिए हिंसा की जो स्वीकार्यता है उससे वे असहमत थे। वे ऐसे समाजवाद में यकीन करते थे जो लोकतांत्रिक हो, अहिंसक हो और मानवीय हो।

वे किस तरह का समाजवाद बनाना चाहते थे इसका खाका उन्होंने इन शब्दों में प्रस्तुत किया था, `’ हमारा काम सिर्फ साम्राज्यवाद के शोषण को समाप्त करना नहीं है बल्कि समाज के उन सभी वर्गों के शोषण को समाप्त करना है जो कहीं भी आज जनता का शोषण कर रहे हैं। हम एक नई सभ्यता बनाना चाहते हैं जिसकी जड़ें प्राचीन सभ्यता में जमी हों और जिसमें प्राचीन सभ्यता के सर्वोत्तम तत्व सुरक्षित रहें। साथ ही उसमें सामयिक जगत के प्रगतिशील तत्व हों, जो दुनिया के समक्ष एक नया आदर्श उपस्थित कर सकें।’’

आज जब देश में किसानों का सबसे लंबा धरना चल रहा है, तब आचार्य नरेंद्र देव के कृषि संबंधी विचार और किसानों की क्रांतिकारी भूमिका के प्रति उनका मूल्यांकन प्रासंगिक हो जाता है। आचार्य नरेंद्र देव 1921 के अवध के किसान आंदोलन में शामिल थे और उसे एक सैद्धांतिक जामा पहनाने और उससे पंडित जवाहर लाल नेहरू को जोड़ने में उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई। कांग्रेस जो कि अपने जमींदार समर्थकों के दबाव के कारण आंदोलन को लेकर दुविधा में थी उसे भी उन्होंने आंदोलन की अहमियत से परिचित कराया। सन 1929 में जब पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेस के कराची अधिवेशन में समाजवादी कृषि कार्यक्रम पेश किया तो उन्होंने माना कि यह वही कार्यक्रम है कि जो 1929 में आचार्य नरेंद्र देव ने संपूर्णानंद के साथ मिलकर तैयार किया था। उसी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने गया थीसिस में कहा था कि सामाजिक बदलाव में किसानों की बड़ी भूमिका हो सकती है।

यानी जो पारंपरिक मार्क्सवाद किसानों की जगह पर सिर्फ मजदूरों को ही क्रांतिकारी मानता था उसमें उन्होंने गया थीसिस के माध्यम से नया विचार जोड़ा। बाद में चीन में माओत्सेतुंग की क्रांति उसी रास्ते पर बढ़ी। आज भी भारत के किसान आंदोलन के माध्यम से देश में एक लोकतांत्रिक क्रांति की संभावना पैदा कर रहे हैं। नरेंद्र देव ने अपने जीवन और राजनीतिक कर्म के लिए साध्य के साथ ही साधन की पवित्रता को चुना था। लेकिन जो दक्षिणपंथी मानते हैं कि मार्क्सवादी देशद्रोही होते हैं या जो वामपंथी मानते हैं कि देश में सांप्रदायिकता को वैधता समाजवादियों ने दिलाई उन्हें आचार्य नरेंद्र देव के जीवन और विचारों का अध्ययन करना चाहिए। उन्हें भी उनके विचारों और जीवन को समझना चाहिए जो मानते हैं कि विद्वान व्यक्ति राजनीति नहीं कर सकते या वे करेंगे तो राजनीतिक प्रभाव नहीं पैदा कर सकते।

नरेंद्र देव सिर से पैर तक और जीवन के एक छोर से दूसरे छोर तक देशभक्त थे। वे इस बात के प्रतीक हैं कि एक मार्क्सवादी कितनी गहरा देशभक्त हो सकता है। वे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से प्रभावित थे। वे विपिन चंद्र पाल से प्रभावित थे। वे अरविंद घोष से भी प्रभावित थे। बल्कि बांग्ला के विद्वान होने के कारण वे अरविंद घोष के बांग्ला लेखन का हिंदी में अनुवाद करते थे। वे मदन मोहन मालवीय और स्वामी रामतीर्थ से भी प्रभावित थे। मालवीय जी तो उनके घर भी आते थे। बाद में वे महात्मा गांधी और नेहरू से जिस तरह जुड़े वह तो सर्वविदित है। इसलिए जो लोग इस देश के महापुरुषों को बार बार लड़ाकर स्वाधीनता संग्राम की व्याख्या करते हैं और अपना हिंदुत्व या सेक्यूलर एजेंडा सेट करते हैं उन्हें नरेंद्र देव को समझना चाहिए।

जो भी सच्चा देशभक्त होगा वह दूसरे देशभक्त से असहमत हो सकता है लेकिन वह उसका शत्रु तो कतई नहीं बनेगा। महात्मा गांधी के करीब आने से पहले वे सचीन्द्र नाथ सान्याल जैसे क्रांतिकारी के संपर्क में भी रह चुके थे। लेकिन वे मानवेंद्र नाथ राय या दूसरे कम्युनिस्टों की तरह से महात्मा गांधी को पूंजीपतियों का दलाल और भारतीय क्रांति को अवरुद्ध करने वाला व्यक्ति मानने को तैयार नहीं थे। वे महात्मा गांधी को एक बहुत बड़ा जननेता मानते थे और उन्हें दुनिया के दूसरे स्वाधीनता सेनानियों की तरह बहुत उच्च स्थान देते थे। गांधी की नैतिकता ने उनके मार्क्सवाद को एक अवलंब दिया और यही वजह थी कि वे कांग्रेस पार्टी के दक्षिणपंथी नेताओं से असहमत होते हुए भी स्वाधीनता संग्राम तक कांग्रेस के साथ रहने और काम करने के समर्थक थे।

नरेंद्र देव स्वतंत्रता औऱ समाजवाद में किसी प्रकार का द्वैत नहीं देखते थे। वे दोनों को एक दूसरे का पूरक मानते थे और मानते थे कि दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। जबकि कम्युनिस्ट पार्टी के लोग समाजवाद को कायम करने के लिए सर्वहारा की तानाशाही को अनिवार्य मानते थे। जबकि दक्षिणपंथी लोग स्वतंत्रता का मतलब ब्रिटिश पूंजीपतियों की दासता से मुक्त करके भारतीय पूंजीपतियों की दासता को स्वीकार करना चाहते। यहीं पर नरेंद्र देव दोनों तरह के अतिवाद से अलग थे। लेकिन जो लोग यह कहते हुए नहीं थकते कि समाजवादियों ने संघ परिवार की सांप्रदायिकता को स्वीकार्यता प्रदान की उन्हें नरेंद्र देव के जीवन और राजनीति में झांकना चाहिए।

सन 1948 में जब स्पष्ट हो गया कि समाजवादी कांग्रेस पार्टी के भीतर अलग दल बनाकर नहीं रह सकते तो उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी। नरेंद्र देव ने न सिर्फ पार्टी छोड़ी बल्कि अपने एक दर्जन से ज्यादा साथियों के साथ विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा भी दे दिया। इस्तीफा देते समय उन्होंने जो शेर पढ़ा वह आज भी लोगों के दिल को छू लेने वाला है। उन्होंने कहा- हमी न होंगे क्या रंगे महफिल, किसे देखकर आप शरमाइएगा।

लेकिन नरेंद्र देव की राजनीतिक नैतिकता उस समय शीर्ष पर पहुंच जाती है जब वे 1948 में अयोध्या से उप चुनाव लड़ते हैं और कांग्रेस पार्टी उनके विरुद्ध देवरिया में आश्रम बनाकर रह रहे एक चितपावन ब्राह्मण और स्वतंत्रता सेनानी बाबा राघव दास को मैदान में उतार देती है। नरेंद्र देव को हराने के लिए राघव दास ने कहा कि आचार्य जी नास्तिक हैं। वे कम्युनिस्ट हैं जो विचार और स्वतंत्रता के विरोधी हैं। वे विद्वान भले हैं लेकिन वे धर्म में यकीन नहीं करते। अयोध्या धर्म की नगरी है। अगर यहां किसी नास्तिक को जिता दिया गया तो धर्म की पताका झुक जाएगी।

आचार्य जी के सामने शर्त भी रखी गई कि वे हनुमान गढ़ी पर माथा टेक कर दिखाएं। आचार्य नरेंद्र देव अलग ही मिट्टी के बने थे जिसमें ज्ञान और राजनीतिक नैतिकता का विलक्षण समावेश था। वे पर्याप्त विनम्र भी थे लेकिन सिद्धांतों पर अडिग रहना जानते थे। वे चुनाव हार गए लेकिन अपने सिद्धांतों से झुके नहीं। आचार्य जी को हराने में मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत से लेकर उत्तर प्रदेश के कई कांग्रेसी नेता जी जान से जुटे थे। वही गोविंद बल्लभ पंत जिन्होंने अयोध्या में रात के अंधेरे में बाबरी मस्जिद के परिसर में राम लला की मूर्ति रखवाई थी। इसलिए समाजवादियों पर सांप्रदायिकता का आरोप लगाने वालों को इस प्रसंग को याद रखना चाहिए कि कैसे उन्होंने एक सेक्यूलर, मार्क्सवादी और उद्भट विद्वान राजनीतिज्ञ को धर्म का सहारा लेकर सक्रिय राजनीति के बाहर किया।

आचार्य नरेंद्र देव को लंबा जीवन नहीं मिला। उन्होंने मात्र 67 वर्ष की आयु पाई। उनका यह जीवन शिक्षा, ज्ञान और राजनीतिक नैतिकता मापदंड बन गया। भगवान राम की मर्यादा और राजनीतिक नैतिकता उन लोगों में नहीं है जो अयोध्या में संविधान की मर्यादा को तोड़ते हैं और झंडा फहराकर, नारा लगाकर और यज्ञ कराकर धर्म, राजनीति, अपराध और अनैतिकता का काकटेल बनाते हैं। वह मर्यादा आचार्य नरेंद्र देव जैसे विद्वान राजनीतिज्ञों और उनकी स्मृतियों में है जो अनवरत राजनीति को नैतिक बनाने के लिए ज्ञान और त्याग की समिधा से महायज्ञ करते हैं। इसलिए इस दीवाली पर ऐसे लोगों के नाम का दीप जलाइए जो स्वयं दीप बनकर धरा का अंधेरा मिटाने आए और मनुजता को पूर्ण करने आए थे।(मध्यमत)
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