विजयमनोहर तिवारी

रामचंद्र दास परमहंस से मेरी पहली मुलाकात 26 अप्रैल 2002 को हुई। वे अपने गुरुभाई महंत घनश्यामदासजी महाराज के सालाना मानस सम्मेलन में इंदौर आए थे। उनका आश्रम धार रोड पर धरावराधाम में है। महंतजी ने फोन किया कि सब काम छोड़कर धरावराधाम आओ। किसी से मिलवाना है। मैं वहाँ पहुंचा तो जेड प्लस की सुरक्षा का तामझाम दूर से ही दिखा। 90 साल से ऊपर के फक्कड़ परमहंस से मेरा परिचय महंतजी ने कराया। मेरा नाम सुनते ही वे मुस्कुरा दिए। अपने गले में पड़े हार उतारे और मुझे पहनाकर बोले-’संन्यास पूर्व आश्रम में हम भी तिवारियों में थे।’ नईदुनिया के पहले पेज पर लंबा इंटरव्यू छपा, जिसका शीर्षक था-‘वे चाहते हैं कि मोक्ष के पहले यह सब देखें।’

बिहार के छपरा जिले में जन्मे परमहंस अपने बारे में कहते थे- ‘रामचंद्रदास नाम है। राम की नगरी में वास है। रामानंद का शिष्य हूँ। राम का भक्त हूँ। राम का मंत्र लिया है। रामकाज में ही लगा हूँ। इस जीवन के बाद मोक्ष चाहता हूँ लेकिन मेरी इच्छा है कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण देखूँ, मथुरा और वाराणसी में भी जीर्णोद्धार होता हुआ देखूँ और आखिर में अखंड भारत का नजारा देखते हुए ही देह त्यागूँ।’

तब गुजरात दंगों पर देश के सारे सेक्युलर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे के लिए हाथ धोकर पीछे पड़े थे, लेकिन परमहंस को गोधरा में जीवित जलाए गए अपने कारसेवकों की पीड़ा थी। उन्होंने कहा था- ‘मेरे निर्दोष 58 कारसेवक हवन करके ट्रेन से जा रहे थे। उन्हें जीवित जलाया गया है, जीवित। धर्मनिरपेक्षतावादी ध्यान दें कि बिहार के गाँवों में हत्याओं का दौर जारी है। कश्मीर में आतंकी हत्याएँ कर रहे हैं। इन राज्यों में तो कोई राम मंदिर के नारे लगाने नहीं गया। ऐसी धर्मनिरपेक्षता खोखली है।’

सांप्रदायिक माने जाने वाले मसलों पर भारत के मुसलमान भी एक ज्वलंत पक्ष रहे हैं। परमहंस मुसलमानों का उल्लेख आते ही सनातन धर्म का विशाल छाता खोलकर खड़े हो जाते थे- ‘मैं मुसलमानों का विरोधी बिल्कुल नहीं हूँ। अलग-अलग पूजा पद्धतियों सहित मिलजुलकर रहने की हमारी परंपरा है। लेकिन यहां के मुसलमानों को दूसरे देशों से सबक लेना चाहिए। इराकी पहले इराकी है, फिर मुसलमान। ईरानी पहले ईरानी हैं, फिर मुसलमान। इंडोनेशिया में भी देश पहले है, मजहब बाद में। जबकि भारत में उलटी गंगा बह रही है। मैं तो भारत के मुसलमानों को मोहम्मद पंथी हिंदू और ईसाइयों को जीसस पंथी हिंदू मानता हूँ। देश हर हाल में पहले होना चाहिए।’

राम मंदिर निर्माण की जिद पर एक हठयोगी की तरह बोले थे- ‘मैं कोई जामा मस्जिद नहीं माँग रहा हूँ। मक्का-मदीना में भी मुझे जगह नहीं चाहिए। अजमेर की दरगाह भी मेरी माँग में शामिल नहीं है। मैं तो अयोध्या में राम जन्म भूमि की जगह हिंदुओं को देने की छोटी सी माँग कर रहा हूँ। और जानकार अगर यह कहते हैं कि अयोध्या में राम का जन्म नहीं हुआ तो वे यह भी बता दें कि कहाँ हुआ था, हम वहाँ मंदिर बना लेंगे।’

उन्होंने बताया था कि कोर्ट में मामला चलते हुए बीते 50 सालों में मैंने प्रधानमंत्री नेहरू, लालबहादुर शास्त्री और इंदिरा गाँधी तक से मंदिर के लिए जमीन माँगी। वकील, जज और प्रतिवादी से भी यही उम्मीद की। लेकिन सब के सब या तो पदों से उतरते गए या चल बसे लेकिन मामला अदालत में ही रहा। इसीलिए अब प्रधानमंत्री के रूप में अटलजी से कोई अपेक्षा नहीं की है। गठबंधन सरकार ने उनकी क्षमताओं को सीमित किया हुआ है।

परमहंस से मेरी दूसरी मुलाकात अयोध्या में ही हुई थी। वे सब तरह की सियासत से दूर बिल्कुल औघड़ अंदाज में रहते थे। लेकिन उनकी आँखों में हर समय राम मंदिर का सपना आप अनुभव कर सकते थे। एक साल बाद ही उन्होंने अपने अधूरे सपन के साथ देह त्याग दी थी।

पाँच अगस्त का दिन पाँच सौ सालों में हुए ऐसे अनगिनत साधुओं को भी स्मरण करने का दिन है, जिन्होंने प्राचीन मंदिर के मलबे पर बाबरी ढाँचा खड़ा होने से लेकर अब तक मंदिर को एक सपने की तरह ही अपनी आँखों में बसाकर रखा था और मुगलों से लेकर अंग्रेजों और आजाद भारत की दुष्ट शक्तियों से लड़ते रहे थे। जिन मुसलमानों ने बाबर के नाम की मस्जिद को बनाए रखने के लिए 70 साल तक अदालत में बाधाएँ पैदा कीं और जमीन के अंदर-बाहर मौजूद प्राचीन मंदिर के सबूतों से इंकार किया, वह एक अलग बहस का विषय हैं।

सात सदियों के आतंक और दमन की इस्लामिक हुकूमत में लगातार हुए धर्मांतरण के जीवित अवशेष, जिनके मस्तिष्कों में मूल परंपराओं की स्मृतियाँ लुप्त या सुप्त हैं। सेक्युलरिज्म इनके लिए एनेस्थीसिया की तरह लगाया गया इंजेक्शन था, जिसने जड़ों से जोड़ने की बजाए थोपी गई बाहरी पहचानों को पुख्ता किया। पाँच अगस्त सुप्त स्मृतियों को झनझनाने और लुप्त स्मृतियों को खोदने का एक अवसर है…