गिरीश उपाध्‍याय

किसानों का जो आंदोलन खुद को गैर राजनीतिक बताते हुए शुरू हुआ था वह अब राजनीतिक स्‍वरूप लेता जा रहा है। खबरें आ रही हैं कि यह आंदोलन अब धीरे-धीरे किसान आंदोलन से ‘जाट आंदोलन’ में बदलता जा रहा है। इन खबरों का प्रमुख आधार किसान नेता राकेश टिकैत का आंदोलन के चेहरे के रूप में उभरना है। टिकैत जाट हैं और उनका खास तौर से पश्चिमी उत्‍तरप्रदेश की जाट बिरादरी में असर भी है।

सवाल यह है कि किसान आंदोलन के जाट आंदोलन में बदलने का असर क्‍या होगा? इसके साथ यह भी कि इस आंदोलन में राजनीति का क्‍या स्‍थान होना चाहिए? दरअसल हमने आजादी के बाद जिन शब्‍दों के अर्थ बहुत ज्‍यादा खुरचे हैं उनमें एक शब्‍द राजनीति भी है। राज्‍य और नीति जैसे दो महत्‍वपूर्ण बिंदुओं को जोड़ने वाला यह शब्‍द कालांतर में नकारात्‍मक होता चला गया और अब तो एक गाली के रूप में इस्‍तेमाल किया जाने लगा है।

ऐसे में किसान आंदोलन को लेकर यदि यह कहा जा रहा है कि इसमें राजनीति हो रही है या इसके जरिये राजनीति की जा रही है तो इसके मायने नकारात्‍मक रूप से ही निकाले जा रहे हैं। हालांकि किसी भी मामले में राजनीति का होना हमेशा ही बुराई की बात नहीं होती। जब बाकी मामलों पर राजनीति हो सकती है या कि वे राजनीति का विषय हो सकते हैं तो खेती किसानी के विषय को राजनीति से दूर क्‍यों होना चाहिए?

पर सवाल ये है कि राजनीतिक कैसी और किन अर्थों में? यदि यह सर्वथा नकारात्‍मक या षड़यंत्रकारी गतिविधि के रूप में है तो उसका निषेध होना चाहिए, लेकिन यदि यह समस्‍या को समाधान की ओर ले जाने वाले कदम के रूप में है तो उसे स्‍वीकार किया जाना चाहिए। किसान आंदोलन को चलते हुए दो माह से अधिक का समय हो चुका है। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद अभी तक इसका कोई समाधान नहीं निकल सका है। बातचीत के इतने दौर हो गए हैं पर समझौते की कोई सूरत नजर नहीं आ रही।

ऐसा लग रहा है कि जैसे-जैसे यह मामला लंबा खिंच रहा है, वैसे-वैसे इसमें पेचीदगी और बढ़ती जा रही है। इसलिए जरूरी हो गया है कि इस मामले को शासक और शासित के बीच का अथवा कानून व्‍यवस्‍था का मुद्दा मानकर देखने के बजाय सामाजिक, आर्थिक और मानवीय दृष्टिकोण से भी देखा जाए। इस मामले में सरकार ने किसान संगठनों के प्रतिनिधियों से सरकार बनकर बात जरूर की है लेकिन अब बात सरकार बनकर नहीं एक ही जाजम पर बैठकर संवाद करने की है।

गतिरोध का एक प्रमुख कारण संभवत: यह भी रहा है कि मामले के हल के सरकारी प्रयास तो हुए हैं लेकिन राजनीतिक प्रयास उतने नहीं हुए। इस मामले में अब सरकार बनकर नहीं राजनीतिक पक्ष बनकर कदम उठाने होंगे। बड़े-बड़े आंदोलनों में ऐसा होता रहा है कि दोनों पक्षों के बीच मध्‍यस्‍थता करने और करवाने वाले कुछ लोग जरूर होते हैं जो गतिरोध को तोड़ने में सहायक की या कैटेलिस्‍ट की भूमिका निभाते हैं।

किसान आंदोलन में ऐसा लग रहा है कि सत्‍तारूढ़ दल के पास ऐसे लोगों का नितांत अभाव हो गया है जो दूसरे पक्ष में भी अपने संपर्क रखते हों। और यदि ऐसा नहीं है तो फिर यह मानना पड़ेगा कि ऐसे लोगों के होने के बावजूद उन्‍हें अभी तक काम पर नहीं लगाया गया है। जब किसानों की तरफ से किसान संगठनों के अलावा बाकी राजनीतिक दल भी सक्रिय हैं तो भाजपा को भी चाहिए कि वह अपने राजनीतिक तंत्र और उसमें मौजूद ऐसे लोगों को सक्रिय करे जो संवाद को सार्थक बनाने में कैटेलिस्‍ट का काम कर सकें।

राजनीति भले ही नकारात्‍मक या बदनाम शब्‍द हो गया हो लेकिन राजनीति की काट राजनीति से ही हो सकती है। माना कि पंजाब में भाजपा की सरकार नहीं है लेकिन दिल्‍ली की सीमा पर आकर आंदोलन करने वाले किसानों में उत्‍तरप्रदेश और हरियाणा के किसान भी तो हैं। इन दोनों राज्‍यों में तो भाजपा की सरकार है। क्‍या भाजपा के पास ऐसे नेता बचे ही नहीं हैं, जो आंदोलनकारी नेताओं से संवाद का सेतु कायम कर सकें। निश्चित रूप से ऐसा तो नहीं ही होगा। जरूरत इस बात की है कि ऐसे लोगों/नेताओं को सक्रिय करके उन्‍हें संवाद की जिम्‍मेदारी सौंपी जाए।

किसान आंदोलन के अब तक चले स्‍वरूप को देखते हुए एक बात समझ ली जानी चाहिए कि इस मसले का हल पुलिस या कानून से नहीं संवाद से ही निकलेगा। पुलिस और सुरक्षा बलों को किसानों के सामने खड़ा करने के बजाय वार्ताकारों और मध्‍यस्‍थों को आगे करना होगा। ये भी समझना होगा कि जब प्रधानमंत्री खुद कहते हैं कि किसानों से उनकी सरकार की दूरी सिर्फ एक फोन कॉल की है तो फिर यह दूरी तय करने का मानस बनाने वालों के रास्‍ते में कीलें बिछाने का फैसला कौन कर रहा है?

रहा सवाल इस आंदोलन के ‘जाट आंदोलन’ में बदलने का, तो यह राजनीतिक रूप से समस्‍या भी है और समाधान भी। हो सकता है कि आंदोलन के जरिये दिल्‍ली और आसपास के कई राज्‍यों में प्रभावी इस बिरादरी की नाराजी से राजनीतिक नुकसान हो, लेकिन इसका दूसरा पक्ष ये भी है कि फिर यह आंदोलन एक वर्ग का न होकर एक जाति का होकर रह जाएगा। ऐसे में गैर जाट किसान संगठनों से बातचीत का रास्‍ता खोलने और उन्‍हें समाधान के दरवाजे तक ले आने का गलियारा भी तो बनेगा। हो सकता है समस्‍या का हल इसी गलियारे में छिपा हो…, प्रयास करने में हर्ज ही क्‍या है।