अजय बोकिल

इस साल तोक्यो समर ओलिंपिक में भारतीय खिलाडि़यों ने पदकों की जो स्वर्णिम आभा बिखेरनी शुरू की थी, पैरालिंपिक में अब वह द्विगुणित होती दिख रही है। यूं दोनों ओलिंपिक की कोई सीधी तुलना नहीं है, लेकिन जहां भारत के लिए समर ओलिंपिक का समापन सोने से हुआ था, वहीं भारतीय पैरालिंपिक एथलीटों ने खेल के छठे दिन शूटिंग और भाला फेंक में क्रमश: दो गोल्ड जीतकर पूरे देश को गदगद कर दिया है। ये कमाल शूटिंग में अवनि लखेरा ने और भाला फेंक में सुमित अंतिल ने किया।

यकीन मानिए कि हमारे पैराएथलीट पदकों की दौड़ में दिव्यांग होने के बाद भी समर एथलीटो से आगे निकल सकते हैं। सबसे खुशी की बात यह है कि अमूमन हाशिए पर रहने वाले इन पैराएथलीटों की अदम्य इच्‍छाशक्ति, जिजीविषा और क्षमता यह देश नए सिरे से सलाम कर रहा है। यूं तो समर ओलिंपिकों में भी भारत के पदक जीतने का इतिहास बहुत उज्वल नहीं रहा है। बरसों तक हम हॉकी का एक अदद गोल्ड जीतकर खुश होते रहे। बाद में वह भी छिन गया।

इस बीच एक एक मेडल हमने भारत्तोलन और टेनिस में जीता। बीजिंग ओलिंपिक से दूसरे खेलों में भी मेडल जीतने का नया दौर शुरू हुआ। लेकिन रियो ओलिंपिक में पदकों की चढ़ती गोटी को असफलता का सांप फिर निगल गया। हमारे‍ ‍खिलाड़ी महज दो मेडल यानी 1 सिल्वर और 1 कांस्य लेकर लौटे। उस वक्त भी रियो पैरालिंपिक में पैराएथलीटों ने भारत को खुश होने का मौका 2 स्वर्ण, 1 रजत और 1 कांस्य पदक जीतकर दिलाया। बावजूद इसके इस कामयाबी की वैसी न तो चर्चा हुई और न ही खेलप्रेमियों में वैसी जिज्ञासा रही, जैसी कि इस बार देखने को मिल रही है।

पैरालिंपिक का आयोजन आजकल समर ओलिंपिक के तत्काल बाद होता है। इसमें प्रतिस्पर्द्धा काफी कठिन होती है। तोक्यो पैरालिंपिक में भी 163 देशों के 4 हजार 537 पैराएथलीट भाग ले रहे हैं। ये सभी कुल 22 खेलों के 539 इंवेंट्स में पदकों की दावेदारी कर रहे हैं। इस पैरालिंपिक में भारत के 54‍ एथलीट भाग ले रहे हैं। जिनमें कुछ तो विश्व चैम्पियन भी हैं। पैरालिंपिक में खिलाडि़यों का चयन उनकी दिव्यांगता की श्रेणी के हिसाब से होता है। उसके भी दस मानदंड होते हैं। जिनमें मांसपेशियों की कमजोरी, जोड़ों की गति या निष्क्रियता, आंगिक दोष, कद, मांसपेशियों में जकड़न, शरीर के मूवमेंट में कमी, दृष्टि दोष तथा सीखने की अवरुद्ध क्षमता आदि शामिल हैं।

खेल की श्रेणियां भी उससे जुड़ी दिव्यांगता के हिसाब से होती हैं। चयन के मानक अंतरराष्ट्रीय पैरालिंपिक कमेटी तय करती है। पैरालिंपिक के चयनित खिलाड़ी भी समर ओलिंपिक खिलाडि़यों के समान ही कठिन तैयारी करते हैं। हालांकि इसके लिए उन्हें कुछ विशेष जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। भारत में पिछले कुछ सालों से इसमें काफी सुधार हुआ है। तोक्यो पैरालिंपिक में अब तक कुल सात मेडल भारत के खाते में आ चुके हैं। हालांकि चक्का फेंक में ब्रांज जीतने वाले विनोद कुमार से उनका मेडल पैरालिंपिक आयोजन कमेटी ने वापस ले लिया है। उसके पीछे कुछ तकनीकी कारण हैं। क्योंकि पैराएथलीटों के श्रेणीकरण के मापदंड अलग होते हैं। पर हमें अभी और पदकों की उम्मीद है।

यूं तो किसी भी ओलिंपिक में कोई भी मेडल जीतना एक एथलीट का महान सपना होता है। जिसे साकार करने वो रात दिन जी-तो़ड़ मेहनत करते हैं। लेकिन पैरालिंपिक का मामला और भी दुश्वार इसलिए है क्योंकि इसमें भाग लेने वाले खिलाडि़यों को पहले अपने आप से लड़ना होता है। अपने स्तर पर जीती लड़ाई को खेल में जीत के संकल्प में बदलना पड़ता है। यानी एक आंतरिक लड़ाई जीतने के बाद उन्हें ओलिंपिक में मेडल की वैश्विक लड़ाई जीतना होती है। यह लड़ाई एक सामान्य ओलिंपिक एथलीट के मुकाबले ज्यादा कठिन और चुनौती भरी होती है।

अमूमन दिव्यांगों अथवा विकलांगों को लेकर समाज का रवैया बहुत सकारात्मक नहीं होता। उन्हें या तो सहानुभूति का पात्र समझा जाता है या फिर उपेक्षा का। जबकि कई सामान्य लोग दुर्घटनावश दिव्यांग हो जाते हैं तो कुछ लोग जन्मत: किसी शारीरिक या मानसिक दोष से ग्रस्त होते हैं। वास्तव यह प्रकृति द्वारा उनके साथ किया गया मजाक ही होता है। जिसकी कीमत उन्हें आजीवन चुकानी पड़ती है। ऐसे में उन्हें निरंतर समाज के प्रोत्साहन और सहज स्वीकार की आवश्यकता होती है। मौका मिलते ही वो दिखा देते हैं कि ‘हम किसी से कम नहीं।‘ भारतीय पैरा एथलीटों ने पैरालिंपिक में यह दिखा दिया है।

वैसे ओलिंपिक में पैरालिंपिक का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। पैरालिंपिक का आयोजन 1960 में रोम ओलिंपिक के साथ हुआ। भारत ने 1968 में तेल अवीव पैरालिंपिक से इसमें भाग लेना शुरू किया। 1972 में मुरलीधर पेटकर ने 60 मीटर फ्री स्टाइल तैराकी में भारत को पहला स्वर्ण दिलाया था। उसके बाद भारत कई साल तक पैरालिंपिक से दूर रहा। 2004 में देवेन्द्र झांजरिया ने भाला फेंक में भारत को सोना दिलाया। 2016 में रियो ओलिंपिक में भारतीय पैराएथलीटों ने काफी अच्छा प्रदर्शन कर दो स्वर्ण सहित कुल 4 पदक जीते।

तोक्यो में हमारे खिलाड़ी पदक जीतने के साथ नए रिकॉर्ड भी बना रहे हैं। उदाहरण के लिए भाला फेंक में सु‍मित अंतिल ने 68.55 मीटर भाला फेंक कर अपना ही रिकॉर्ड तोड़ते हुए विश्व रिकॉर्ड भी कायम किया। इसी प्रकार 10 मीटर एयर राइफल शूटिंग (एस 1 स्पर्द्धा) में अवनि लखेरा ने 249.6 पाइंट हासिल कर विश्व रिकार्ड की बराबरी की और स्वर्ण पदक अपने नाम किया। 19 साल की अवनि की कहानी भी बहुत प्रेरक है। कार दुर्घटना में उनकी रीढ़ की हड्डी हमेशा के लिए खराब हो गई। लेकिन अवनि ने जीवन में पहले डिप्रेशन को हराया और कुछ कर दिखाने की जिद के साथ नई जिंदगी शुरू की। गोल्ड मेडल जीतने के बाद उसकी यह खुशी स्वाभाविक ही थी कि ‘मैं आज दुनिया के टॉप पर हूं।‘

गोल्ड मेडलिस्ट सुमित की कहानी भी उतनी ही प्रेरक है। सुमित पहलवान बनना चाहते थे। लेकिन एक हादसे में उन्हें अपना पैर गंवाना पड़ा। महिला टेबल टेनिस में रजत पदक जीतने वाली भाविना पटेल ने कहा कि वो खुद को दिव्यांग नहीं मानती। ऊंची कूद में देश को सिल्वर दिलाने वाले निषाद कुमार की कहानी भी ऐसी है। उन्होंने गांव में चारा काटने की मशीन में अपना हाथ गंवाया। लेकिन हौसला कायम रखा। अच्छी बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पैरा एथलीटों से भी उसी जज्बे के साथ बात कर रहे हैं,  उनका उत्साह वर्द्धन कर रहे हैं, जैसा कि उन्होंने समर ओलिंपिक खिलाडि़यों के साथ किया था।

यकीनन जब देश का प्रधानमंत्री सीधे खिलाड़ी की हौसला अफजाई करेगा तो उसका उत्साह, संकल्प और ‍जुनून भी कई गुना बढ़ जाएगा। सरकारें भी पदक जीतने वाले पैराएथलीटों के लिए दिल खोलकर पुरस्कारों की घोषणा कर रही हैं। ओडिशा से प्रेरणा लेकर दूसरे राज्य भी कोई न कोई खेल गोद लेने लगे हैं। हमारे एथलीट ओलिंपिक में क्या कर रहे हैं, कितना कर रहे हैं, हमें उनके साथ खड़े होना है, यह भावना भी इस बार बड़े पैमाने पर देखने को मिल रही है। यह अच्छा लक्षण है।

हम पदकों की दौड़ में चीन से मीलों पीछे हैं। वहां तक पहुंचने में हमे बरसों लगेंगे। उसके लिए बहुत कठोर और सुनियोजित प्रयास करने होंगे। लेकिन पदकों बढ़ती ललक और जिद देश में खेलों के उज्‍ज्‍वल भविष्य की निशानी है। अच्छा यह भी है कि अब खेलों में कॅरियर को लेकर लोगों की मानसिकता भी बदल रही है। खेलना अब ‘बिगड़ने’ के बजाए कुछ ‘बनने‘ का सबब भी है। कुछ लोग इसमें ‘खेल राष्ट्रवाद’ भी देख सकते हैं। लेकिन अगर पदकों की चमक देश की छवि भी चमकाएगी तो उस पर गर्व किसे नहीं होगा।

एक शंका इस खेल कामयाबी के राजनीतिक लाभ लेने की भी है, परंतु उसकी भी सीमा है। खेल में जीतना और वो भी अंतरराष्ट्रीय स्पर्द्धा में जीतना, कठिन साधना और अडिग संकल्प से ही संभव है। यह मनुष्य की अदम्य इच्छाशक्ति का उत्सव है। पैरालिंपिक का ध्येय वाक्य भी यही है ‘स्पिरिट इन मोशन।‘ यानी गति में प्राण हैं। देश के लिए पदक लाने वाले इन पैराएथलीटों को सौ बार सलाम..!(मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता, सटीकता व तथ्‍यात्‍मकता के लिए लेखक स्वयं जवाबदेह है। इसके लिए मध्‍यमत किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है।
—————-
नोट- मध्‍यमत में प्रकाशित आलेखों का आप उपयोग कर सकते हैं। आग्रह यही है कि प्रकाशन के दौरान लेखक का नाम और अंत में मध्‍यमत की क्रेडिट लाइन अवश्‍य दें और प्रकाशित सामग्री की एक प्रति/लिंक हमें madhyamat@gmail.com पर प्रेषित कर दें।संपादक