राकेश अचल

विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोह राजनीति का शिकार हो गए हैं। इसलिए इन्हें नेताओं से बचाया जाना चाहिए। मध्यप्रदेश के एक पुराने जीवाजी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में आने के लिए ग्वालियर के एक भी सांसद, मंत्री को फुरसत नहीं मिली, जबकि वे शहर में ही मौजूद थे। मध्यप्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री मोहन यादव दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि थे।

दीक्षांत समारोहों में अमूमन नेताओं को ही बुलाया जाता है। ये कुलपतियों की मानसिकता से जुड़ा सवाल है। क्या देश और प्रदेश में ऐसे लोग नहीं है जो नेताओं के मुकाबले दीक्षांत समारोहों के लिए ज्यादा उपयोगी और गरिमा प्रदान करने वाले साबित हो सकते हों? या तो कुलपतियों को अपने देश-प्रदेश की गरिमा बढ़ाने वाले महानुभावों के बारे में जानकारी नहीं है या वे उन्हें इस लायक नहीं समझते।

मध्यप्रदेश का सौभाग्य है कि प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. मोहन यादव सचमुच उच्च शिक्षित हैं, अन्यथा इस प्रदेश का दुर्भाग्य ये है कि यहां कुलाधिपति तक स्नातक नहीं हैं, किन्तु वे दीक्षांत समारोहों का अनिवार्य हिस्सा हैं। इस बार वे बीमार थे इसलिए दीक्षांत समारोह में नहीं आये। लेकिन जो स्वस्थ्य थे उनमें से केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और ज्योतिरादित्य सिंधिया के अलावा बिजली मंत्री प्रद्युमन सिंह तोमर भी इस समारोह के लिए वक्त नहीं निकाल पाए।

दीक्षांत समारोह में शामिल होने वाले छात्र सौभाग्यशाली हैं कि राज्यपाल महोदय के अलावा दो केंद्रीय मंत्रियों नरेंद्र तोमर और ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया ने उन्हें वर्च्युअली आशीर्वाद दिया। अगर वे इतनी उदारता भी न दिखते तो कोई उनका क्या कर लेता? दीक्षांत समारोहों में कौन आये और कौन नहीं ये तय करने का काम विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद और कुलपति खुद करते हैं।

कार्यपरिषद में सत्तारूढ़ दल के नामजद कार्यकर्ता होते हैं इसलिए स्वाभाविक है कि वे अपने आकाओं को ही इस समारोह में अतिथि के रूप में आमंत्रित करते हैं। कोई नहीं कहता कि दीक्षांत समारोह में देश के किसी विख्यात वैज्ञानिक, कलाकार, अभिनेता, संगीतकार, ख्‍यात प्रशासक, पर्यावरणविद को अतिथि बनाया जाये। इस बारे में या तो कार्यपरिषद का ज्ञान शून्य होता है या फिर परिषद सदस्य जानबूझकर नेताओं से आगे सोचती ही नहीं है।

जीवाजी विश्वविद्यालय के पास नेताओं से मुक्त होने की मानसिकता है ही नहीं। ऐसे में विश्वविद्यालय से ग्वालियर या प्रदेश से जुड़े किसी विशिष्ट व्यक्ति को मानद उपाधि दिए जाने के बारे में सोचने की कल्पना करना व्यर्थ है। एक बार मैंने ग्वालियर के सांसद को सुझाव दिया था कि वे ग्वालियर का गौरव रहे पद्मश्री आचार्य मुसलगांवकर को मानद उपाधि देने के लिए विश्‍वविद्यालय से अनुशंसा करें तो विश्‍वविद्यालय के लिए प्रतिष्ठा की बात हो, लेकिन मेरा सुझाव खाली गया। जीवाजी विश्विद्यालय से बेहतर काम तो निजी क्षेत्र के आईटीएम विश्वविद्यालय का है जिसने इस बारे में दो कदम आगे बढ़कर सोचा।

देश का दुर्भाग्य ये है कि यहां शिक्षा हो या स्वास्थ्य, महिला कल्याण हो या बाल विकास बिना नेताओं को साथ लिए होता ही नहीं है। नेताओं के कर कमल ही होते हैं जो हर क्षेत्र को कृतकृत्य करते हैं। नेता न हों तो शायद कोई काम पूरा ही न हो, जबकि नेताओं की प्राथमिकता में ये सब क्षेत्र कभी होते ही नहीं हैं। मुश्किल ये है कि कोई नेताओं से उनकी प्राथमिकता के बारे में सवाल नहीं कर सकता। इस समय न संसद चल रही है और न कोई अन्य महत्वपूर्ण कार्यक्रम।  ऐसे में नेताओं को विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में आने से किसने रोका? शायद राजनीति ही इसकी जड़ में रही हो!

जीवाजी विश्वविद्यालय ही नहीं प्रदेश के अधिकांश विश्वविद्यालय राजनीति का अखाड़ा बने हैं।  विश्वविद्यालयों के कुलपतियों का चयन राजनीतिक आधार पर हो रहा है। इसे रोका नहीं जा सकता क्योंकि ये कांग्रेस की बोई हुई विषबेल है। भाजपा के शासन में इसका बेरहमी और बेशर्मी से इस्तेमाल भर किया जा रहा है। जीवाजी विश्वविद्यालय के कुलपति का नसीब अच्छा है कि उन्हें दीक्षांत समारोह से पहले सत्तारूढ़ दल से जुड़े एक छात्र संगठन की ओर से सिर्फ धमकी भर मिली अन्यथा यहां भी उज्जैन की तरह कुलपति महोदय को सबरवाल बनाने में कितनी देर लगती?

मुझे जीवाजी विश्विद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने का सौभाग्य मिला है। संयोग है कि इस विश्वविद्यालय को अतीत में ऐसे कुलपति मिले जो अपने क्षेत्र के धुरंधर थे और उनकी एक विशिष्ट पहचान थी, लेकिन ये बात अब नहीं है। शायद इसीलिए विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोहों की गरिमा में भी दिनोंदिन गिरावट आ रही है। इस बारे में हर उस शहर को सोचना चाहिए जिसके पास विश्वविद्यालय हैं। दीक्षांत समारोहों को नेताओं से मुक्त कराये बिना शिक्षा का स्तर नहीं बढ़ाया जा सकता। हमारे यहां तो स्थिति ये है कि आप प्रधानमंत्री से लेकर अपने सूबे के गवर्नर की शैक्षणिक योग्यता की जानकारी नहीं ले सकते।

ग्वालियर का जीवाजी विश्विद्यालय 23 मई 1964 को ग्वालियर के पूर्व महाराज जीवाजीराव सिंधिया के नाम से स्थापित किया गया था। इसका उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने किया था। शुरू में इस विश्वविद्यालय से मात्र 29 महाविद्यालय संबद्ध थे, आज यह संख्या 400  तक जा पहुंची है। संख्या की दृष्टि से विश्वविद्यालय का विस्तार अवश्य हुआ है किन्तु गरिमा की दृष्टि से बिलकुल नहीं। 48 वर्षीय इस विश्वविद्यालय ने अब तक 21 कुलपति देखे हैं, इनमें से कुछ ही नाम ऐसे हैं जो इस विश्वविद्यालय को ऊंचाइयों तक ले जा सके। अन्यथा बहुत से तो ऐसे भी रहे हैं जिन्हें कोई नहीं जानता। अब भंडारकर, राजवाड़े, टंडन, तिवारी और बिसेन जैसे लोग मिलते ही कहाँ हैं?
(मध्यमत)
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