सतीश जोशी  

वसुंधरा राजे ने भाजपा आलाकमान के निर्देश की अवज्ञा करते हुए गहलोत-पायलट जंग में कूदने से मना करके अपना नुकसान किया है। उन्होंने छोटा-सा ट्वीट जारी करके जो नसीहत दी कि ‘जनता के बारे में सोचिए!’, वह दरअसल इस कोरोना संकट के दौरान राजस्थान की कांग्रेस सरकार को गिराने की कोशिशों के लिए अपनी ही पार्टी को बड़ी बारीकी से झिड़की ही है। सभी जानते हैं कि पर्दे के पीछे सचिन पायलट के साथ ज्योतिरादित्य हैं। भाजपा ने वहां की कमान उन्हें ही सौंप रखी है।

शाही जंग
वसुंधरा राजे अपनी पार्टी में भावी भूमिका को लेकर चिन्तित हैं। उनको लगता है पायलट की भाजपा में एन्ट्री से उनकी राजनीति का अंत हो जाएगा। दो सिंधियाओं की जंग नयी नहीं है। ग्वालियर के पूर्व राजघराने के वंशज यों तो जायदाद के विवाद में लंबे समय से उलझे हुए हैं, मगर चुनाव में वे कभी एक-दूसरे के खिलाफ प्रचार नहीं करते।

कोलारस में आए थे सामने
पहली बार वे 2018 में मध्य प्रदेश के कोलारस उपचुनाव में एक-दूसरे के आमने-सामने आए थे। ज्योतिरादित्य सिंधिया वहां कांग्रेस उम्मीदवार के लिए प्रचार कर रहे थे, तो उनकी बुआ यशोधरा राजे वहां भाजपा उम्मीदवार के लिए प्रचार कर रही थीं। मार्च में जब ज्योतिरादित्य भाजपा में शामिल हो गए तो यशोधरा राजे ने यह ट्वीट करके उनका स्वागत किया कि राजमाता (विजयाराजे सिंधिया) के खून ने राष्ट्रहित में फैसला किया और ‘अब मिट गया हर फासला‘।

और अंत में…
राजस्थान की जंग में एक ओर हैं ज्योतिरादित्य, जो कांग्रेस में अपने पुराने साथी सचिन पायलट की परदे के पीछे से मदद कर रहे थे; तो दूसरी तरफ हैं उनकी बुआ वसुंधरा राजे, जिनका राजनीतिक भविष्य बगावत कर रहे पायलट के विजेता बनने पर बिगड़ सकता है। वसुंधरा एक पक्की भाजपा नेता हैं मगर राज्य की कांग्रेस सरकार को गिराने की अपनी पार्टी की कोशिशों से उन्होंने खुद को अलग रखा है। राज्य के पूर्व उप-मुख्यमंत्री पायलट भाजपा में शामिल होकर या अपनी अलग पार्टी बनाकर भाजपा के समर्थन से अगर मुख्यमंत्री बन गए तो यह दो बार मुख्यमंत्री रह चुकीं वसुंधरा के लिए एक झटका होगा। पिछले दो दशकों से वे और अशोक गहलोत ही इस गद्दी पर बारी-बारी से बैठते रहे हैं। एक अलग विकल्प उभरे, वह भी भाजपा आलाकमान के समर्थन से, तो यह वसुंधरा के लिए खेल बिगड़ने वाली बात होगी।

हमेशा सम्मान रखा….पर
सिंधिया घराने की इन दो शाखाओं के रिश्तों में कितनी बर्फ जमी है यह कोई रहस्य नहीं है, हालांकि वे जब कभी आमने-सामने हो जाते हैं तब एक-दूसरे के प्रति पूरा सम्मान प्रदर्शित करते हैं। ज्योतिरादित्य और उनके फुफेरे भाई दुष्यंत (वसुंधरा के पुत्र) वर्षों से सांसद हैं, मगर उन दोनों को कभी आपस में दुआ-सलाम करते या सेंट्रल हॉल में अगल-बगल बैठते नहीं देखा गया। दिल्ली में होने वाली पार्टियों में भी घराने की इन दोनों शाखाओं के सदस्यों को शायद ही कभी एक साथ देखा गया हो।