राकेश अचल 

जिंदगी में बहुत सी चीजे न भूलने वाली होती हैं। भारत के लोग भारत में मोदी सरकार के सातवें साल को ताजिंदगी नहीं भूल पाएंगे। ये साल कांग्रेस शासन के उन 19 महीनों से भी ज्यादा भयावह और यादगार है। 46 साल पहले देश में लगाई गयी इमरजेंसी में तो विपक्ष के कुछ सैकड़ा या हजार लोग ही नजरबंद किये गए थे लेकिन मोदी सरकार के सातवें साल में तो पूरा देश ही किश्तों में नजरबंद होने को मजबूर हो गया है।

दुनिया और देश के हालात ही कुछ ऐसे बने हैं कि मोदी सरकार कुछ करने की स्थिति में है ही नहीं। बीते छह साल में लिए गए अनेक महत्वपूर्ण लेकिन अविवेकपूर्ण फैसलों ने पहले ही जनता की नाक में दम कर दिया था ऊपर से बाबा ने सारी कसर निकाल दी। अब चंद लोगों को छोड़ शेष को घुटनों के बल बैठा दिया गया है। किसान, मजदूर, सरकारी कर्मचारी, दिहाड़ी पर काम करने वाले लोग, सबके सब अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं, परेशान हैं। किसी को कुछ नहीं पता की कल उनके साथ क्या होगा?

भाजपा की मोदी सरकार न निंदा के काबिल है और न उसकी आलोचना की जाना चाहिए क्योंकि ये सब काम उस सरकार के लिए किये जाते हैं जो लोकनिंदा से डरती हो। ये सरकार तो निर्भय सरकार है। किसी से डरती ही नहीं है। ऊपर वाले से भी नहीं। नीचे रहने वालों की तो हैसियत ही क्या है, जो इस सरकार को अपने फैसलों की समीक्षा करने या गलत फैसलों को वापस लेने के लिए विवश कर सके। देश के किसान ऐसा नहीं कर पाए, विपक्षी दल नहीं कर पाए और तो और कोविद-19 नाम की महामारी भी इस सरकार का कुछ नहीं कर पायी।

लोकतंत्र में सरकारें जनता के भविष्य को सवांरने का काम करती आयी हैं। ये सरकार भी कर रही है। इस सरकार ने पहले होई साफ़ कर दिया है की व्यापार करना सरकार का काम नहीं है, इसलिए तमाम सरकारी अधिपत्य के नवरत्न निजी हाथों में दे दिए गए या दिए जा रहे हैं, यानि इसकी प्रक्रिया जारी है। मोदी सरकार के सातवें साल में अडानी एशिया के दो नंबर के अमीर बन गए और ामबानी जी के बारे में तो कहना ही क्या है ?जिस रफ्तार से देश में धनकुबेरों की तरक्की हुई उस रफ्तार से आम जनता की नहीं हुई, उलटे आम जनता महंगाई और अराजकता का शिकार होती जा रही है।

बीते पंद्रह महीने में बार-बार के लाकडाउन ने देश की जनता की, देश की अर्थ व्यवस्था की, देश की तमाम नीतियों की कमर तोड़कर रख दी है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी पूरी ताकत से स्थिति को सम्हालने का प्रयास करते दिखाई देते हैं लेकिन उनका हर पासा उलटा पड़ जाता है। बेचारे करें भी तो क्या करें। उनके मंत्रिमंडल में एक उन्हें और दूसरे उनके ग्रामंत्री को छोड़कर कोई तीसरा आदमी काम करता दिखाई ही नहीं देता। सारा काम प्रधानमंत्री जी के ऊपर है। काम बाढ़ के कारण बीते १५ माह में प्रधानमंत्री जी की काया, वेश-भूषा पर इसका असर साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा है।

सातवां साल परेशानियों का साल है। देश की जनता की तरह प्रधानमंत्री भी नजरबंद रहते-रहते परेशान हो गए हैं। हर समय हवाई यात्राओं में व्यस्त रहने वाले किसी आदमी को यदि इस तरह से नजरबंद कर दिया जाएगा तो उसका अवसादग्रस्त होना स्वाभाविक है। प्रधानमंत्री के अवसाद का असर पूरे देश पर पड़ता है। काशी क्वेटो नहीं बन पायी, सबको साथ लेकर चलने के बावजूद सबका विकास नहीं हो पाया और तो और अच्छेदिन हमेशा केलिए रूठ गए। वे आने को तैयार ही नहीं हैं। भाजपा की सरकार की बदनसीबी है की वो अपनी सरकार की सात साल की उपलब्धियों का ढोल नहीं पीट पा रही है। शहरी आबादी में लगातार अलोकप्रिय हो रही भाजपा को अब मजबूरी में गांवों की और रुख करना पड़ रहा है। भाजपा एक लाख गांवों में जाकर जनता का दुःख-दार्द समझेगी। ये अच्छी बात है। देश की हरेक राजनितिक पार्टी को ग्रामोन्मुख होना चाहिए।

भाजपा की सरकार पर आरोप है की उसने बीते सात सालों में किसी न किसी बहाने से जनता का खून चूसा है, इसे गलत साबित करने के लिए भाजपा सातवें साल में ५० हजार रक्तदान शिविर लगाकर जनता को खूनी इमदाद करने जा रही है। भाजपा के मंत्रीगण दो गांव या दो अस्पताल गोद लेंगे ताकि असहाय ग्रामीणों और अस्पतालों का कल्याण हो सके। ग्रामीणों की दुर्दशा तो पहले से उजागर थी, कोरोना ने अस्पतालों की दुर्दशा भी उजागर करके रख दी। देश के बड़े अस्पतालों तक में सब कुछ नहीं है, ऐसे में गांव के अस्पतालों में इमारतों के नाम पर खंडहरों के अलावा किसी और चीज की कल्पना कैसे की जा सकती है ?

भाजपा अपने अनुभवों से सीखने वाली पार्टी है। भाजपा की सरकार ने कोरोनाकाल में जिस तरह से स्वंवेदनहीनता का मुजाहिरा किया था उसके कारण हुए नुक्सान की भरपाई करने के लिए सातवें साल में पार्टी संवेदनशीलता पर पूरा ध्यान दे रही है। इसके लिए भाजपा ने अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं से पीड़तों की मदद करते समय फोटो खिंचवाने और उन्हें छपवाने के प्रपंच से दूर रहने के लिए भी कहा है।

भाजपा नेतृत्व ने सातवें साल में जलसे करने के बजाय कोरोना पीड़ितों को राहत सामग्री देने की मुहिम चलने का फैसला भी किया है। अब किस राहत सामग्री पर किसकी तस्वीर छपे या न छपे का फैसला स्वविवेक से करना है। जनता तक पहुँच बनाने के लिए कुछ न कुछ पंजीरी तो साथ होना ही चाहिए। पिछले साल तो काढ़ा पैकेट तक पर नेताओं के फोटो छापे गए थे। अभी टीकरण के प्रमाणपत्रों पर नेताजी बैठे हैं। कांग्रेस की सरकारें भी यही सब नौटंकी करने में लिप्त हैं।

बहरहाल में सातवें साल के लिए देश के मौजूदा प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को दिल से बधाइयाँ और शुभकामनाएं देता हूँ। वे पहले प्रधानमंत्री हैं जो देश की जनता की घृणा और गुस्से के साथ-साथ श्राप को भी मौन होकर शिरोधार्य कर रहे हैं। पहले ऐसा वक्त न आया था और न किसी को ऐसा करने की अवसर ही मिला, नेहरू को तो बिलकुल नहीं मिला। इंदिरा गांधी को मिला था लेकिन वो भी आज के मुकाबले बहुत काम है। । सही मायने में मोदी जी एक दिव्य आत्मा है, अवतार हैं, भारतवासियों के लिए ईश्वर का उपहार हैं। वे न होते तो बीते सात सालों में न जाने इस देश का क्या हुआ?

मोदी जी की सरकार को अभी जनादर्श के अनुसार तीन साल और जनता की सेवा करना है। कोरोनाकाल ने सरकार को देश सेवक बना ही दिया है। सरकार यानी सिस्टम पूरे प्राणपण से हालात को सुधारने में लगा है। वैक्सीन  के दनादन आदेश दे रहा है। । सिस्टम वैक्सीन हासिल नहीं कर पा रहा है। वैक्सीन सीन आफ हो चुकी है केवल बाबा रामदेव की कोरोनिल बची है डीआरडीओ की दवाएं अभी जरूरत के हिसाब से तैयार नहीं हो पा रही हैं। केंद्र सरकार शेष बचे तीन साल जनता की खिदमत के लिए तैयार खडी है। तीन साल सातवें साल जैसे न बीतें ऐसी उम्मीद के साथ एक बार भाजपा सरकार को, पार्टी को मुबारकबाद देता हूँ। मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं।
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