गिरीश उपाध्‍याय

यह माना जाता रहा है कि आंसुओं की जगह संसद में नहीं सड़क पर ही होती है। संसद का काम तो सड़क पर बहने वाले आंसुओं को पोंछना और रोकना है, उसके लिए उपाय करना है। वैसे भी संसद का मूल काम कानून बनाना है। वह कानून जो हमारी न्‍याय व्‍यवस्‍था का आधार है। उस न्‍याय व्‍यवस्‍था जिसकी प्रतीक न्‍याय की देवी की आंखों पर पट्टी बंधी होती है। यह पट्टी पता नहीं चलने देती कि न्‍याय की आंखों में आंसू हैं या मुसकुराहट। और यदि आंसू हैं भी तो वे खुशी के हैं या गम के। जैसे इन दिनों मास्‍क ने चेहरे की मुस्‍कुराहट को ओझल कर दिया है वैसे ही आंखों पर बंधी पट्टी नजर के साथ-साथ आंसुओं को भी ओझल कर देती है।

लेकिन एक बात है जो संसद और सड़क को जोड़ती है, और वह है इंसान। संसद में बैठा इंसान भी सड़क से होकर ही उस मुकाम तक पहुंचता है, इसलिए उसकी चमड़ी (कभी कभी बुद्धि भी) भले ही मोटी हो जाए, लेकिन उस मोटी चमड़ी के भीतर मौजूद दिल कभी न कभी अपना असर दिखाता ही है। और पेशे और फितरत से अलग, दिल की यह बेअदबी, बहुत सारी बातों को पिघला कर, आंखों से बह निकलती है। आंसुओं की फितरत है कि वे चाहे खुशी के मौके पर नुमायां होते हों या गम के मौके पर, लेकिन उनमें इंसान के भीतर का ‘नमक’ जरूर मौजूद होता है।

मंगलवार यानी 9 फरवरी को राज्‍यसभा में जो कुछ हुआ उसकी मुख्‍य मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक अलग अलग व्‍याख्‍या हो रही है। उस घटना में बहे आंसुओं में इंसानी तत्‍व देखने के साथ-साथ नाटकीयता और अभिनय का तत्‍व भी ढूंढा या बताया जा रहा है। कुछ लोगों ने इसे सहज मानवीय संवेदनाओं और भावनाओं का प्रकटीकरण कहा है तो कुछ लोग इसमें तरह तरह के जीवों का साम्‍य ढूंढने या आरोपित करने में लगे हैं।

लेकिन क्‍या आंसू की अहमियत सिर्फ इतनी ही है? क्‍या उनका दायरा चंद लोगों या चंद परिस्थितियों तक ही सीमित है? शायद ऐसा नहीं है। आंसू चाहे सहज बहें या फिर सायास, अंतत: वे हमारे मनुष्‍य होने की ही निशानी हैं। जिसे हम आंसू बहाने का नाटक या अभिनय कह कर खारिज कर देते हैं, नाटक और सिनेमा की दुनिया में भी वैसा करने के लिए कलाकार को भीतर से उस पीड़ा या खुशी का साक्षात्‍कार करना पड़ता है, जो भावनाओं के उद्वेग को उस सीमा तक ले जाए, जहां शरीर की स्‍वाभाविक प्रक्रिया के तहत हमारी ग्रंथियां आंसुओं का निर्माण कर सकें।

मैंने आंसुओं के संदर्भ में अपनी बात संसद और सड़क के प्रतीकों से शुरू की थी। अजीब संयोग है कि देश में इन दिनों सड़क और संसद दोनों के आंसू चर्चा में हैं। करीब ढाई महीने से चले रहे किसान आंदोलन के दौरान पिछले दिनों किसान नेता राकेश टिकैत के आंसू चर्चा में थे। चर्चा में क्‍या थे, बल्कि उन्‍होंने आंदोलन की उखड़ती बाजी को फिर से मजबूती के साथ वापस ला खड़ा किया था। ये टिकैत के आंसू ही थे जिन्‍होंने लाल किले पर हुई घटना के बाद, आंदोलन के खत्‍म हो जाने की आस बांधे लोगों के मंसूबों पर पानी फेर दिया था।

वो सड़क के आंसू थे। 9 फरवरी को हमने संसद के आंसू देखे। राज्‍यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद की विदाई पर भाषण देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आंखों से बहे आंसू क्‍या असर करेंगे और कौनसी नई धारा को पैदा करेंगे इसके बारे में अभी कहना मुश्किल है। लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि परिस्थिति कोई भी हो, आंसू कम से कम मजाक का सबब तो नहीं होने चाहिए। यदि टिकैत के आंसू को हमने आंसू माना, नाटक नहीं। तो फिर नरेंद्र मोदी या गुलाम नबी आजाद के आंसुओं को हम नाटक या अभिनय कैसे कह सकते हैं। व्‍यक्ति कितना ही निष्‍ठुर या कठोर हो, लेकिन होता वह अंतत: मनुष्‍य ही है और आंसू हों या मुसकुराहट उसके मनुष्‍य होने का ही परिचय देते हैं।

न तो सड़क पर यह पहली बार हुआ है और न संसद में। न किसी आंदोलनकारी के साथ यह पहली घटना है और न ही किसी राजनेता के साथ। चाहे संसद हो या राजनीतिक बिरादरी, यदि आप इतिहास खंगालें तो ऐसे सैकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे जिनमें बड़े से बड़े नेता के आंसुओं का जिक्र हो। और आग्रह, पूर्वग्रह या दुराग्रह के दायरों को हटाकर देखें तो ऐसे ज्‍यादातर मामलों में हम पाएंगे कि किसी घटना या प्रसंग विशेष को लेकर संबंधित व्‍यक्ति की आंखों से बहे आंसू उसकी भावनाओं और संवेदनाओं की अभिव्‍यक्ति ही थे।

आंसुओं का बहना हमारे इंसान होने और इंसान के रूप में हमारे भीतर संवेदनाओं के जिंदा होने का सबूत है। आंसुओं के सूख जाने से उनका बह जाना ज्‍यादा अच्‍छा होता है। हमारा समाज, हमारी संसद और हमारा लोकतंत्र भले ही कितने ही मुकिश्‍ल दौर से गुजर रहा हो, लेकिन सबसे अच्‍छी बात यह है कि हमारे आंसू अभी सूखे नहीं हैं। आंसुओं की मौजूदगी बताती है कि समस्‍याओं के इंसानी हल की संभावनाएं अभी खत्‍म नहीं हुई हैं।

संसद में गुलाम नबी आजाद ने अपने विदाई भाषण में ज्‍यादातर बातें शेर-शायरी के माध्‍यम से कहीं। हमारे शायरों ने भी आंसुओं को लेकर बहुत कुछ कहा है। राजिन्‍दर कृष्‍ण कहते हैं कि- तेरी आंख के आंसू पी जाऊं, ऐसी मेरी तकदीर कहां… वे तो आंसुओं को दर्द साझा करने का जरिया तक बताते हैं-
ऐ काश जो मिल कर रोते,
कुछ दर्द तो हलके होते,
बेकार न जाते आँसू,
कुछ दाग़ जिगर के धोते,
फिर रंज न होता इतना,
है तनहाई में जितना
कैफी आजमी आंसुओं की इसी इबारत को कुछ अलग अंदाज में लिखते हैं-
आज सोचा तो आंसू भर आए
मुद्दतें हों गई मुस्कुराये
रह गई ज़िन्दगी दर्द बन के
दर्द दिल में छुपाये छुपाये
दिल की नाज़ुक रगें टूटती हैं
याद इतना भी कोई न आए…

तो जनाब लाख टके की बात यही है कि आंसू तभी निकलते हैं जब दिल की नाजुक रगें टूटती हैं। और ये आंसू ही हैं जो जिगर के दाग धोने की हैसियत रखते हैं। इसलिए गुजारिश यही है कि आपका खेमा, आपकी प्रतिबद्धताएं, आपके विचार या आपकी विचारधारा चाहे जो भी हो, कम से कम आंसुओं की खिल्‍ली मत उड़ाइये… ये आंसू हैं तो हम हैं या कि हम हैं तभी ये आंसू हैं…

(न्‍यूज 18 हिन्‍दी में प्रकाशित)