प्रो. संजय द्विवेदी

किसी भी राष्ट्र-राज्य के जीवन में दस-पंद्रह वर्षों की अवधि कुछ नहीं होती। किंतु जो लोग कुछ करना चाहते हैं उनके लिए एक-एक पल का महत्व होता है। मध्यप्रदेश में ऐसी ही जिजीविषा के धनी एक व्यक्ति इतिहास रच चुके हैं। ऐसे में उनके संगठन का उत्साह बहुत स्वाभाविक है। बात मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की हो रही है। वे राज्य के ऐसे पहले गैरकांग्रेसी मुख्यमंत्री हैं जो सत्ता में इतना समय पूरा कर इतिहास का सृजन कर चुके हैं। मध्यप्रदेश में गैरकांग्रेसी सरकारों का आना बहुत बड़ी बात नहीं रही है, किंतु उसका दुखद पक्ष है या तो सरकारें गिर गयीं या मुख्यमंत्री बदल गए।

1967 की संविद सरकार हो, 1977 की जनता सरकार हो या 1990 की भाजपा की सरकार हो, सबके साथ यह हादसा हुआ ही। ऐसे में मध्य प्रदेश भाजपा के लिए प्रसन्नता के दो कारण हैं। एक तो लगातार उसे राज्य में चौथी पारी खेलने का मौका मिला है तो दूसरी ओर उसके एक मुख्यमंत्री को लंबे समय तक काम करने का मौका मिला। इसलिए यह क्षण उपलब्धि का भी है और संतोष का भी। कुछ अल्पविराम के बाद लगातार चौथी बार सत्ता में आने का मौका राज्य भाजपा के लिए साधारण नहीं है।

सही मायने में भाजपा के किसी मुख्यमंत्री को इस तरह मुस्कराने का मौका मिला है। इस स्थायित्व को भाजपा सेलीब्रेट करना चाहती है। इसमें दो राय नहीं कि शिवराज सिंह चौहान ने अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में जो प्रयास किए वे अब दिखने लगे हैं। विकास दिखने लगा है, लोग इसे महसूस करने लगे हैं। सबसे बड़ी बात है कि नेतृत्व की नीयत साफ है। शिवराज अपने देशज अंदाज से यह महसूस करवा देते हैं कि वे जो कह रहे हैं दिल से कह रहे हैं। राज्य के निर्माण और स्वर्णिम मध्यप्रदेश या आओ बनाएं अपना मध्यप्रदेश जैसे नारे जब उनकी जबान से निकले हैं, तो वे विश्वसनीय ही लगे। उनकी आवाज रूह से निकलती हुयी लगती है,वह नकली आवाज नहीं लगती।

जनता के सामने वे एक ऐसे संचारकर्ता की तरह नजर आते हैं, जिसने लोगों की नब्ज पकड़ ली है। वे सपने दिखाते ही नहीं, उसे पूरा करने में लोगों की मदद मांगते हैं। वे सब कुछ ठीक करने का दावा नहीं करते और जनता के सहयोग से आगे बढ़ने की बात कहते हैं। जनसहभागिता का यह सूत्र उन्हें उंचाई दे जाता है। वे जिस तरह सामाजिक सुरक्षा, स्त्री के प्रश्नों को संबोधित कर रहे हैं, उससे उनकी एक अलग और खास जगह खुद बन जाती है। जिस दौर में रक्त से जुड़े रिश्ते भी बिगड़ रहे हों ऐसे कठिन समय में एक राज्य के मुखिया का खुद को तमाम लड़कियों के मामा के रूप में स्थापित करना बहुत कुछ कह देता है।

कोरोना काल में जिस संवेदना के साथ उन्होंने मध्यप्रदेश जैसे भौगोलिक दृष्टि से बड़े राज्य को संभाला वह साधारण नहीं है। विगत 23 मार्च, 2020 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद शिवराज सिंह चौहान के सामने यह चुनौती थी कि वे राज्य को कोरोना के कारण उत्पन्न संकटों से न सिर्फ उबारें बल्कि जनता के मन में अवसाद और निराशा की भावना पैदा न होने दें। क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ मैदानी नहीं है, आर्थिक नहीं है, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है। ऐसे समय में राज्य शासन और उसके मुखिया की संवेदना अपेक्षित ही नहीं,अनिवार्य है। उन्होंने सत्ता संभालते ही अपने चिकित्सा अमले को आईआईटीटी (IITT) यानी आइडेंटिटीफिकेशन, आइसोलेशन, टेस्टिंग और ट्रीटमेंट का मंत्र दिया। सैंपल एकत्रीकरण, टेस्टिंग की क्षमता में वृद्धि को बढ़ाने की दिशा में तेजी से प्रयास हुए।

शिवराज सिंह चौहान, भाजपा में एक आम कार्यकर्ता का प्रतीक भी हैं। बहुत पुरानी बात नहीं है कि जब वे विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता के नाते इस महापरिवार में आए और अपनी लगातार मेहनत, श्रेष्ठ संवाद शैली और संगठन कौशल से मुख्यमंत्री का पद भी प्राप्त किया। अपनी भाव-भंगिमाओं, प्रस्तुति और वाणी से वे हमेशा यह अहसास कराते हैं कि वे आज भी दल के साधारण कार्यकर्ता ही हैं। कार्यकर्ता भाव जीवित रहने के कारण वे लोगों में भी लोकप्रिय हैं और जनता के बीच नागरिक भाव जगाने के प्रयासों में लगे हैं। वे जनमर्म को समझकर बोलते हैं और नागरिक को वोट की तरह संबोधित नहीं करते।

शिवराज सिंह जानते हैं कि वे एक ऐसे राज्य के मुख्यमंत्री हैं जो विकास के सवाल पर काफी पीछे है। किंतु इसका आकार-प्रकार और चुनौतियां बहुत विकराल हैं। इसलिए वे राज्य के सामाजिक प्रश्नों को संबोधित करते हैं। लाड़ली लक्ष्मी, जननी सुरक्षा योजना, मुख्यमंत्री कन्यादान योजना, पंचायतों में महिलाओं को पचास प्रतिशत आरक्षण ऐसे प्रतीकात्मक कदम है जिसका असर अब जरूर दिखने लगा है। शिवराज विकास की हर धुरी पर फोकस करना चाहते हैं क्योंकि मध्यप्रदेश को हर मोर्चे पर अपने पिछड़ेपन का अहसास है।

शिवराज जी को अपनी कमियां और सीमाएं भी पता हैं। वे जानते हैं कि एक जाग्रत और सुप्त पड़े समाज का अंतर क्या है। इसलिए वे समाज की शक्ति को जगाना चाहते हैं। वे इसीलिए मप्र के अपने नायकों की तलाश कर रहे हैं। टांटिया भील, चंद्रशेखर आजाद, भीमा नायक का स्मारक और उनकी याद इसी कड़ी के काम हैं। एक साझा संस्कृति को विकसित कर मध्यप्रदेश के अभिभावक के नाते उसकी चिंता करते हुए वे दिखना चाहते हैं। मुख्यमंत्री की यही जिजीविषा उन्हें एक सामान्य कार्यकर्ता से नायक में बदल देती है। शायद इसीलिए वे विकास के काम में सबको साथ लेकर चलना चाहते हैं।

वे चाहते हैं कि विकास-धारा में सब साथ हों, भले ही विचारधाराओं का अंतर क्यों न हो। यह सिर्फ संयोग ही नहीं है कि जब मध्यप्रदेश विकास और गर्वनेंस की तरफ एक नई नजर से देख रहा है तो पूरे देश में भी तमाम राज्यों में विकासवादी नेतृत्व ही स्वीकारा जा रहा है। बड़बोलों और जबानी जमाखर्च से अपनी राजनीति को धार देने वाले नेता हाशिए पर धकेले जा रहे हैं। ऐसे में शिवराज सिंह का अपनी पहचान को निरंतर प्रखर बनाना साधारण नहीं है। कोरोना संकट के बाद राज्य की चुनौतियां साधारण नहीं है, शुभ संकेत यह है कि ये सवाल राज्य के मुखिया के जेहन में भी हैं।

शिवराज सिंह चौहान पर राज्य की जनता ने लगातार भरोसा जताते हुए उन्‍हें बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। विरासत में मिली तमाम चुनौतियों की तरफ देखना और उनके जायज समाधान खोजना किसी भी राजसत्ता की जिम्मेदारी है। मुख्यमंत्री को इतिहास की इस घड़ी में यह अवसर मिला है कि वे इस वृहत्‍तर भूगोल को उसकी तमाम समस्याओं के बीच एक नया आयाम दे सकें। सालों साल से न्याय और विकास की प्रतीक्षा में खड़े मप्र की सेवा के हर क्षण का रचनात्मक उपयोग करें। बहुत चुनौतीपूर्ण और कंटकाकीर्ण मार्ग होने के बावजूद उन्हें इन चुनौतियों को स्वीकार करना ही होगा, क्योंकि सपनों को सच करने की जिम्मेदारी मध्यप्रदेश के भूगोल और इतिहास दोनों ने उन्हें दी है।

जाहिर है वे इन चुनौतियों से भागना भी नहीं चाहेंगे। शिवराज सिंह चौहान ने राजसत्ता को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने का काम किया है। चुनाव दर चुनाव की जीत ने उनमें दंभ नहीं भरा बल्कि उनमें वह विनम्रता भरी है जिनसे कोई भी राजनेता, लोकनेता बनने की ओर बढ़ता है।

(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली के महानिदेशक हैं, पूर्व में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के प्रभारी कुलपति रहे हैं।)