महाशिवरात्रि पर विशेष 

प्रमोद शर्मा

फागुन का माह प्रकृति में सबसे महत्वपूर्ण और मनमोहक होता है। इस माह में प्रकृति भी प्रसन्न हो उठती है और चारों ओर खुशियां ही खुशियां बिखेर देती है। पौधों की डालियां फूलों से लद जाती हैं। सरसों के पीले फूलों के गहने, मटर की रंगबिरंगी फूलों की चादर, आम्र बौर और महुए की गमकती गंध व्यक्ति को भी प्रसन्नता से भर देती है। जब चारों ओर ऐसा वातावरण हो तो व्यक्ति खुद भी हंसता और दूसरों को भी हंसाता है।

वैसे, हंसना मनुष्य का प्राकृतिक स्वभाव है। सृष्टि में हंसना सिर्फ मनुष्य ही जानता है। फागुन का महीना भी हास-परिहास, विनोद और व्यंग्य का ही होता है। मानव की हंसी धारा में उसका सारा कालुष्य धुल जाता है और व्यक्ति हास्य की धारा में उन्मुक्त भाव से अवगाहन करता है। इसी कारण साहित्य में सभी रसों में हास्य रस ही सर्वाधिक लोकप्रिय माना गया है। बात जब हास-परिहास और व्यंग्य की आती है तो साहित्यकारों ने अपने चुटीले व्यंग्य की मारों से अपने इष्टदेव तक को नहीं छोड़ा। हालांकि सभी साहित्यकारों ने अपने इष्ट को हास्य का अवलंब बनाया है, लेकिन अपनी विशिष्ट वेशभूषा के कारण महादेव कवियों और साहित्यकारों के प्रिय पात्र रहे हैं।

क्‍यों न बनाते, खाने के लिए खुद के पास पांच मुख, एक पुत्र षडानन और दूसरे गजवदन और लंबोदर हैं। खुद की स्थिति दिगंबर की है। ऐसे में यदि घर में अन्नपूर्णा न होती तो क्या स्थिति होती?

‘शंभु दिगंबर पंचमुख, गजमुख षडमुख पुत्र।
अन्नपूर्णा घर न होती तो, क्या खा रहते कुत्र?‘

कवि भूषण ने महादेव के घर की विसंगतियों का वर्णन करते हुए कहा है कि इसी से परेशान होकर शिव जोगी हो गए हैं। माता पार्वती का वाहन शेर उनके वाहन बैल को खाने को दौड़ता है। मयूर नाग पर झपटता है और नाग चूहे पर। इस विचित्र स्थिति से बचना भला किसके बस की बात है-

‘आप को वाहन बैल बली, वनिताहू को वाहन सिंघई पेखिए,
मूसे को वाहन है सुत एक को, दूजे मयूर को पच्छ विसेखिए।
भूषण है कवि चैन फणीन्द्र के, बैर परै सबके सब देखि के,
तीनहूं लोक के ईश गिरीश सु, जोगी भए घर की गति देखिके।।‘

कवि माखन ने तो देवी पार्वती के माध्यम से ऐसा करारा व्यंग्य किया कि बरबस ही हंसी आ जाती है। माताजी कहती हैं कि यदि हम तुमसे विवाह न करते तो तुमसे कोई विवाह ही नहीं करता।

‘विष भोजन भंग भुजंग हैं भूषण, अंग में खाकई कोरई तो।
मृग छाल बिछावन माल कपालन, ब्याल की ज्वालन को जरतो।।
कवि माखन आंखन जान तुम्हें, सुन कानन जान कहा करतो?
हंस पार्वती कह शंकर से, हम न वरते तुम्हें को वरतो?‘

एक अन्य कवि की कल्पना देखिए, शिवजी के परिवार के वाहनों की जन्मजात शत्रुता से कैलाश पर्वत पर लड़ाई का दृश्‍य ही उपस्थित कर दिया। ऐसे सजीव चित्रण का आप भी आनंद लीजिए-

‘बार-बार बैल को निपट उंचौ नाद सुनि, हुंकरत बाघ बिरझानौ रस रेला में।
भूधर भनत ताकी बास पाय शोर करि, कुत्ता कोतवाल को बगानो बगमेला में।।
फुंकरत मूषक को दूषक भुजंग तासों, जंग करिबो को झुक्या मोर हद हेला में।
टापस में पारषद कहत पुकारि करि, रार सी मची है त्रिपुरारि के तबेला में।।‘

बाबा तुलसीदास भी मानस में भोलेनाथ पर व्यंग्य करने से नहीं चूके। जब शिव दूल्हा बने तो बाबा का अद्भुत प्रस्तुतिकरण देखिए और भगवान विष्णु के माध्यम से कितना सटीक और मनोहारी परिहास किया है-

‘जटा मुकुट अहि मौर संवारा।।
कानन कुंडल पहिरे ब्याला। तन विभूति कटि केहरि छाला।।
ससि ललाट सुंदर सिर गंगा। नयन तीन उपवीत भुजंगा।।
गरल कंठ उर नर सिर माला। अशिव वेष शिव धाम कृपाला।।
कर त्रिशूल और डमरू बिराजा। चले बसह चढ़ि बाजहि बाजा।।‘

ऐसे अद्भुत वर को देखकर देवताओं की पत्नियों की तो हंसी ही छूट गई। वे आपस में कहती हैं कि ऐसे वर के लिए पूरे संसार में कोई दुल्हन ही नहीं है।
‘देखि शिवहिं सुर तिय मुसकाहीं। वर लायक दुलहिनी जग नाहीं।।
ऐसे में भगवान विष्णु कहां चूकने वाले थे, उनकी विनोद भरी प्रतिक्रिया देखिए-
‘वर अनुहारि बरात न भाई। हंसी करैहहु पर पुर जाई।।‘
तब तो- ‘विष्णु वचन सुनि सुर मुसकाने। निज-निज सेन सहित बिलगाने।।‘
इस परिहास ने तो महेश को भी गुदगुदा दिया।- ‘मन ही मन महेश मुसकाहीं। हरि के व्यंग्य बचन नहीं जाहीं।। उन्होंने अपने सभी गणों को बुला लिया और फिर- ‘जब दुलहहिं तब बनी बराता।‘ और रास्ते भर कौतिक होते रहे-‘कौतुक विविध होईं मग जाता।‘

कविवर पद्माकर ने तो नंगा शिवजी के विवाह को हास का दंगा ही बना दिया।
‘हंसि हंसि भाजै देखि दूलहि दिगंबर को, पाहुनी जे आवै हिमाचल के उछाह में।
कहै ‘पद्माकर‘ सु काहू सौं कहे को कहा, जोई जहां देख हंसाई तहां राह में।।
मग भयेउ हंसै नगन महेश ठाड़े, और हंसे येहूं हंसि हंसि के उमाह में।
सीस पर गंगा हंसे, भुजनि भुजंगा हंसे, हास हू को दंगा भयो नंगा के विवाह में।।‘

इतना ही नहीं महाकवि कालिदास में भी ‘कुमारसंभव‘ में शिवजी को अपने व्यंग्य का आलंबन बनाया है। इस प्रकार हमारे ग्रंथ ऐसे रस से भरे पड़े हैं।