राजेश ज्‍वेल

जब केंद्र सरकार यह स्पष्ट कर चुकी है की कोरोना वैक्सीन पूरी तरह से सुरक्षित है और सभी को लगवाना चाहिए,  तब उम्र से लेकर बीमारी या अन्य बंधन क्यों लागू किए गए हैं?

* जिस तरह अभी 60 साल से अधिक उम्र के लोग आधार कार्ड दिखाकर टीका लगवा सकते हैं,  उसी तरह 45 साल से अधिक या उससे कम उम्र के लोगों को भी टीका आसानी से लगाया जा सकता है।  अभी 45 साल से अधिक उम्र के बीमारियों से पीड़ित लोगों को ही टीका लगवाने की अनुमति है,  (जिसके कारण अधिकांश लोग फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट भी बनवा रहे हैं) जबकि ये सामान्य बुद्धि की बात है कि बीमारियों का उम्र से कोई लेना देना नहीं है।  50 -60 साल का व्यक्ति भी पूरी तरह से स्वस्थ हो सकता है और 25 -30 साल के व्यक्ति को भी कई तरह की बीमारियां हो सकती है। अभी कोरोना संक्रमण युवा वर्ग को भी अधिक चपेट में ले रहा है,  लिहाजा मेडिकल ग्राउंड पर जिन लोगों को अभी टीका ना लगाने की सलाह दी गई है,  उनको छोड़कर अन्य सभी उम्र, वर्ग को टीका आसानी से लगाया जा सकता है।

* गरीब व्यक्ति सरकारी अस्पताल में और अमीर-सक्षम निजी अस्पताल में निर्धारित शुल्क देकर टीका लगवा सकता है।  अधिकांश कारोबारी, फैक्ट्री संचालक या कंपनियां भी अपने खर्च पर कर्मचारियों और उनके परिजनों को टीका लगवा सकते हैं,  क्योंकि एक भी कर्मचारी के संक्रमित होने पर उनका पूरा कारोबार प्रभावित होता है,  लिहाजा सारे कारोबारी अपने स्टाफ को शुल्क चुकाकर आसानी से टीका लगवाने को तैयार हो जाएंगे।

* देश में पर्याप्त संख्या में टीके तैयार हो रहे हैं,  जो विदेशों को भी दिए जा रहे हैं, लिहाजा टीके की कोई कमी नहीं है (सीरम और भारत बायोटेक 15 करोड़ से ज्यादा डोज हर माह बना रहे हैं) बस उसके लिए जो मापदंड बनाए गए हैं उन्हें शिथिल किए जाने की आवश्यकता है।   बड़ी-बड़ी टाउनशिप,  बहुमंजिला इमारतों की सोसाइटियां भी सामूहिक टीकाकरण में मदद कर सकती है। इसके अलावा रोटरी, लायंस जैसे क्लब,  चेरिटेबल संस्थाएं,  एनजीओ भी आसानी से टीकाकरण करवा सकते है।

* एक सुझाव ये भी है कि केंद्र सरकार विदेशों में जो टीके उपलब्ध हैं,  उन्हें भी लगवाने की अनुमति दें,  जिससे कोई भी व्यक्ति उन्हें खरीद कर लगवा सकता है,  जैसे फाइजर,  मॉर्डना या जॉनसन एंड जॉनसन कंपनियों के टीके भी उपलब्ध हो गए हैं।  जब देश के लोगों ने 4500 में कोरोना टेस्ट करवाया और अभी लाखों रुपए इलाज पर भी खर्च कर रहे हैं तो कई लोग 1000-2000 का टीका आसानी से लगवा सकते हैं।  पता नहीं क्यों केंद्र सरकार उन कंपनियों,  जिनके टीके मान्य हो गए है,  अनुमति नहीं दे रही है?

* एक और विसंगति ये है कि एक तरफ प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री टीके की बर्बादी को रोकने की सलाह दे रहे हैं,  मगर सवाल यह है कि जो गाइडलाइन तय कर रखी है उसके अलावा टीके नहीं लगाए जा सकते तो फिर यह बर्बादी कैसे रुकेगी?

एक वायल में 10 लोगों को टीके लगते हैं और अगर तय गाइडलाइन के मुताबिक उस वक्त मौके पर 7 लोग ही उपस्थित है तो उनको ही टीके लगाना पड़ेंगे और 3 डोज बर्बाद होंगे ही।  यह बर्बादी तभी रुक सकती है जब इस गाइडलाइन को खत्म किया जाए और सभी को टीके लगाने की अनुमति दी जाए तो एक भी डोज बर्बाद नहीं होगा।  क्योंकि जो उपलब्ध होगा उसे टीका लगा दिया जाएगा। अभी सिर्फ 45 साल से अधिक उम्र के बीमारी वाले और 60 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गों को ही टीके लगाने की अनुमति है।

* ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन का झंझट भी खत्म कर मौके पर ही रजिस्ट्रेशन कर टीके लगाए जाएं। टीका लगवाने वाले व्यक्ति की उसी वक्त ऑपरेटर एंट्री कर देगा।

* और हां… वैक्सिनेशन यानी टीकाकरण कोई रॉकेट साइंस या जटिल ऑपरेशन नहीं है। जिस तरह रोजाना लाखों मरीजों को इंजेक्शन लगते है, उसी तरह टीके का इंजेक्शन भी आसानी से लग सकता है, बस जरूरत है टीके के विश्व गुरु भारत को अपनी टीकाकरण नीति बदलने की।