अरबाज़

लिखते कौन लोग हैं? वे जो पढ़े-लिखे हैं। जिन्होंने पढ़ाई की है। अब यह जरूरी नहीं कि साहित्य के क्षेत्र में ही की हो। उनकी पढ़ाई किसी भी क्षेत्र की हो सकती है। दुनिया में फैला लेखन देखोगे तो पाओगे, हर एक पढ़े-लिखे ने लिखा है। फिर वो चाहे जिस क्षेत्र का रहा हो। हमारे नेताओं ने लिखा। भगतसिंह, नेहरू, लोहिया मूल रूप से नेता थे लेकिन उनकी पकड़ कलम पर भी मजबूत थी। उन्होंने अपने लेखन में अपनी राजनीति को उतारा। सिर्फ कविता, कहानी ही लिखना, लिखना नहीं होता। लिखने की दुनिया अनंत है। तुम्हें गणित पसंद है, गणित पर लिखो। अंग्रेजी है तो अंग्रेजी पर।

लिखा किसी भी विषय पर जा सकता है। तुम अपनी आदतों पर लिख सकते हो। टीवी में आने वाले सीरियल पर लिख सकते हो। अपने दैनंदिन कार्यों पर लिख सकते हो। घर पर लिख सकते हो। तुम पेड़-पौधों पर लिख सकते हो। खाने पर और उसके स्वाद पर लिख सकते हो। लिख सकते हो कि क्या खाना पसंद है और क्यों! लिख सकते हो कि तुम्हारे आसपास के लोग कैसे हैं, किसमें क्या अच्छा लगता है, क्या बुरा। किसकी कौन सी बात तुम्हें हमेशा याद रहती है, भुलाए नहीं भूलते। और कौनसी बातें तुम्हे कभी याद ही नहीं रहती जिन पर हमेशा डांट खाते हो। किससे डाँट खाते हो, कैसे-कैसे कौन डाँटता है। कौन डाँटता हुआ अच्छा लगता है, कौन हँसता हुआ, कौन चुप बैठा। तुम्हारे घर में जब कोई तुमसे नाराज़ हो जाता है तो उसे कैसे मनाते हो। मनाने के कोई अनुभव हों तो वे भी लिखो।

लिखकर बताओ कि कभी ऐसा हुआ कि तुम किसी को मनाने गए और वो तुमसे उल्टा चिढ़ गया। या कभी तुमने कहा कुछ, सामने वाला समझा कोई और ही बात। या तुम किसी को बहुत अच्छा मानते रहे लेकिन वो उतना अच्छा नहीं था या इसका उल्टा तुम किसी को गलत समझते रहे लेकिन फिर तुम्हें पता चला वो ऐसा नहीं है। वो तो बड़ा अच्छा है। उस समय क्या किया तुमने? माफी मांगी या मांग ही नहीं सके। माफी मांगने में बड़ी कठिनाई पेश आयी। अच्छा बताओ तुम्हें क्या-क्या करने में परेशानी होती है। वे कौन सी बातें है जो तुम किसी से नहीं कह पाते। कहते भी हो तो कोई तुम्हें समझता ही नहीं। सोचो पड़ताल करो तुम्हें कोई क्यों नहीं समझता। ऐसे नहीं इत्मीनान से लिखकर सोचो।

लिखकर सोचोगे तो तुम्हें याद रहेगा तुमने कैसे सोचा था। अगर सोचने का यह तरीका तुम्हें गलत लगा तो उसे आगे सुधार सकते हो। पहली बार में गलतियां सबसे होती हैं। गलतियों से घबराओ नहीं। गलतियां होती ही सिखाने के लिए हैं। अगर हम गलत नहीं लिखेंगे तो कभी नहीं जान पाएंगे कि सही कैसे लिखते हैं। क्या लिखना है, कैसे लिखना है इसे खोजो। सब खोजते हैं। बड़े-बड़े कवि और लेखक भाषा की तलाश में लगे रहते हैं। जैसे-जैसे वे लिखते जाते हैं उनके लिए आगे लिखना और कठिन होता जाता है। इसलिए ये मानलो कि शुरुआत में कम ही परेशानी आनी है। ज्यादा परेशानी तो आगे चलकर आनी है। ये वैसा ही है जैसे तुम कोई वीडियो गेम खेलते हो, जिसमें आगे आने वाली हर स्टेज पिछली से कठिन होती जाती है।

लेकिन शुरुआत कहीं से तो करनी पड़ेगी। हर काम की शुरुआत करनी होती है। संगीत की, नाचने की, गाने की, खाना बनाने की, कपड़े धोने की, मेहंदी लगाने की, क्रिकेट खेलने की हर काम की, हर खेल की एक शुरुआत की जाती है। इसे एक खेल समझो और शुरुआत करो। एक बार शुरुआत करके तो देखो फिर जब तुम्हारा मन अच्छा होगा तुम लिखने को दौड़ोगे। दुःख में होओगे तो लिखोगे, अवसाद में घिरोगे तो लिखोगे। लिखना हो या कोई और काम जिसकी आदत लग जाये फिर छूटता नहीं है। जिसे नाचना आता है, वो नाचने के बहाने ढूढ़ता है। जिसे गाना आता है वो कितना भी गा ले उसका मन नहीं भरता। क्रिकेट खेलने वालों को देखा न तुमने जरा वक़्त मिला और दौड़ गए गेंद-बल्ला लेकर। इसी तरह लिखने का रोग है। और ये सबसे अच्छा रोग है।

पता है अच्छा किसलिए? क्योंकि इसमें खुद से बात करने का मौका मिलता है। हम अकेले बैठे कागज से थोड़ी ही बातें करते हैं। खुद से ही करते हैं। लेकिन ये खुद से बातें ऐसी होती हैं जो जब पन्ने पर उतर गईं तो कभी न कभी किसी न किसी तक पहुँचना जरूर है। इसीलिए हमें यही मानकर लिखना है कि इसे कोई न कोई पढेगा जरूर। जब पढ़ेगा तो ऐसा लिखो कि वो समझ में आये। टेड़े-आड़े अक्षर न लिखो। जितने सुंदर हो सके उतने सुंदर लिखो। साफ-साफ बराबर दूरी पर।

वाक्य ऐसे बनाओ जिनका कोई मतलब निकले। ऐसा नहीं कि तुम कह जाओ और कोई समझ ही न पाए। सारी बात सिर के ऊपर से निकले। स्पष्ट न हुई तो सिर के ऊपर से खुद तुम्हारे भी निकल सकती है। बाद में तुम भी कहाँ उसके लेखक रह जाओगे। तुम बचोगे मात्र उसके पाठक। हां हमारा मन बहुत चंचल है। हर घड़ी बदलता है। कभी किसी बात में बह गया, कभी किसी विचार को ले उड़ा। कहते हैं ये प्रकाश जिसकी चाल सबसे तेज़ है, उससे भी तेज है। बर्फी, गुलाबजामुन, रसगुल्ले सब एक जगह बैठे-बैठे खा लेता है ये।

तुम्हें पता है तुम्हारे मन की बनावट क्या है? इसमें बहुत सी भावनाएं हैं। खुश होना, दुख करना, चुप रहना, उधम करना ये सब तुम्हारे काम, यही भाव हैं। जो तुम्हारे मन में पहले से थे। लेकिन इन्हें कब आना है, कब जाना है ये धीरे-धीरे तुम्हारा मन सीखता है। बचपन से लेकर अब तक और अब से लेकर तुम्हारे बूढ़े होने तक ये मन कभी सीखना बंद नहीं करता। इसी मन में एक भाषा है। जो तुमने सबसे पहले सीखी है, जिससे दुनिया को जाना है। जो तुम्हारी माँ बोलती हैं, भाई बोलता है, पिता बोलते हैं और घर के दूसरे बोलते हैं।

इसी भाषा में तुमने हर चीज़ के नाम रखे हैं। इसे मातृभाषा कहते हैं। इसी से मिलकर तुम्हारे सारे विचार बने हैं। विचार यानि कब तुम्हें क्या प्रतिक्रिया करनी है। ये विचार भी दो तरह के हैं। एक वे जो हमेशा एक से रहते हैं और एक वे जो हर घड़ी बदलते हैं। इन्हीं बदलने वाले विचारों से ही सारी ताकत है। इनसे ही हम नई-नई बातें सीखते हैं। इन्हें ही लिखकर दर्ज करना जरूरी है।

क्यों है इन्हें दर्ज करना जरूरी। क्योंकि जैसा कि ये मन में टिकते नहीं, इसलिए कहीं तो टिकाना जरूरी है। हवा से आते हैं और हमें किसी भाव में डालकर चले जाते हैं। हमें पता भी तो होना चाहिए हमने ऐसा क्यों सोचा। कई बार हम कोशिश करते हैं इन विचारों को अंग्रेजी या किसी दूसरी भाषा में लिखें, लेकिन जब हम ऐसा करते हैं, तो हम विचार व्यक्त करने के अलावा एक और काम करने लगते हैं अनुवाद। क्योंकि हमने चीज़ों को जाना है वो भाषा दूसरी है और लिख दूसरी में रहे हैं। हमारे भाव जिस सांचे में ढले हैं हम वो साँचा बदल रहे हैं। इसलिए बात हमारी उड़ जाती है, रह जाती है हमारे पास सिर्फ भाषा। जो कम आती हो तो और भी बुरी लगती है। इसलिए अच्छा लिखने वाले उसी भाषा में लिखते हैं जिसे वो जीते हैं।

जब हम किसी बात को लिखकर दर्ज कर लेते हैं, तो वो सिर्फ हमारी नहीं रह जाती। पूरी दुनिया की हो जाती है। क्योंकि इस दुनिया में हरेक एक-दूसरे को जानना चाहता है। उससे कुछ न कुछ पाना चाहता है। इंसान में दुनिया की सबसे खास चीज़ दिमाग है। यह हरदम सीखना चाहता है। अपने जैसे या अपने से अलग सभी के बारे में। जानना चाहता है ब्रह्माण्ड के ओर छोर से लेकर, चींटी से छोटा हर एक रहस्य। इसे पसंद है कहानियां सुनना। इसलिए ये हर एक की बात सुनता है। इसमें सब एक-दूसरे से अपनी बात कहना सीखते हैं। मैंने भी कहानियां कहना कई लोगों से सीखा है।

ये जो तुम गा-गाकर कविताएं पढ़ते हो, ये भी किसी न किसी ने लिखी हैं। सब दूसरे का पढ़कर ही सीखते हैं। एक-दूसरे के विचारों को मोटे-मोटे खांचों में बांटते हैं। इन खांचों का नाम है विचारधारा। विचारधारा यानी वे सारे विचार जो एक ही ओर बढ़ते हैं। कितने सारे लोग हैं दुनिया में, जिनमें से हर एक सोच रहा है। जब इतने लोग सोचेंगे तो धाराएं तो बनेंगी ही। विचारों का प्रवाह तो होगा ही।

तुम जानते हो दुनिया में मोटी-मोटी इन विचारों की दो धाराएं हैं। एक जो सबकी भलाई सोचती है। एक वो जो सिर्फ रुपयेवालों की भलाई सोचती है। एक कहती है हर बच्चे को खूब सारे पकवान, मिठाई मिलनी चाहिए। एक कहती है सिर्फ उनको मिलना चाहिए जिनके मम्मी-पापा के पास उन्हें खरीदने के रुपये हैं। एक तरह के लोग कहते हैं आगे बढ़ना है तो कुछ भी करना जायज है, तो दूसरी तरह के कहते हैं नहीं बहुत से काम नहीं होना चाहिए।

जैसे पेड़ों को नहीं काटना चाहिए, नदियों को गंदा नहीं करना चाहिए, चिड़ियों, बिल्लियों, कुत्तों, खरगोशों, शेरों और सियारों सभी को बचाकर रखना चाहिए। एक तरह के लोग कहते हैं बड़ा-सा घर होना चाहिए, लम्बी गाड़ी होनी चाहिए, सारे ऐशोआराम होने चाहिए तभी ज़िंदगी, ज़िंदगी है। तो दूसरी तरह के लोग कहते हैं, ये हों तो सबके पास हों, वरना किसी के पास नहीं।

दूसरे की तकलीफ देखकर कोई भी कैसे खुश रह सकता है। इस तरह लोग दो तरह से लिखते हैं। तुम जब लिखो तो तय करना तुम्हे कौनसी धारा में बहना है। लेकिन सबसे पहले लिखना शुरू करो। जहां मन हो वहां लिखो। कॉपी बना लो। रजिस्टर बना लो। जब बड़े हो जाओ तो मोबाइल में भी लिख सकते हो। कंप्यूटर में भी। जिसको जैसी आदत लग जाये वैसे वो लिखता है। जो जैसा होता है लिखने की दुनिया में वो वैसा दिखता है।