नर्मद कथा-2
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प्रमोद शर्मा

मैं नर्मदा हूं…! मैंने अपने तट पर बसने वाले, मेरी पूजा और आदर करने वाले और पूजा नहीं करने वालों में कभी भेदभाव नहीं किया। तट पर निवास करने वाले और तट से सुदूर क्षेत्रों में रहने वालों में अंतर नही किया। सभी को बिना किसी भेदभाव के खुशहाल किया है। जो मेरे तट पर आकर बैठा, मैंने अपने जल को छूकर आने वाली शीतल बयार से उसे आनंदित कर दिया। अपने जल से उसकी पूरी थकान ही हर ली। जो कोई मेरी जल राशि को अपने खेतों तक ले गया, वहां मैंने संपन्नता बिखेर दी। मैंने तो किसानों के खेत-खलिहान अनाज से भर दिए, लेकिन इसके बदले में सभी मेरा आंचल तार-तार करते रहे। मेरे तटों को सहेजने की बजाय उन्हें उजाड़ते ही रहे और यह सिलसिला निरंतर जारी है।

लगातार विपन्न, लाचार और दरिद्र होती मैं अपने सुहाने अतीत को स्मरण करके अक्सर भावुक हो जाती हूं। मुझे मेरी नन्हीं-नन्हीं सखियां और मुझे तृप्त करने वाले पिता तुल्य सघन वन बहुत याद आते हैं। क्या तुमने कभी बैठकर गंभीरता से विचार किया है कि मैं इतनी विशल जल राशि आखिर कहां से लाती हूं? ऐसा कौन सा बैंक है, जहां से मुझे बिना किसी रुकावट के जल रूपी अमृत मिलता रहता है, जो मेरे लाखों-करोड़ों बेटों, प्रकृति के अन्य जीवों और वनस्पतियों के जीवन का आधार बनता है?

तो चलो, आज तुम्हें बताती हूं कि इस जल के लिए मुझे कितना कठिन परिश्रम करना पड़ता है। इस भारत देश में बहने वाली मेरी अन्य बड़ी-छोटी बहनें बहुत ही सौभाग्यशाली हैं, जिन्हें हिमालय साल भर उदारता से जलराशि देता ही रहता है। मेरा तो हिमालय से किसी भी प्रकार का नाता ही नहीं है। फिर भी मैं सदियों से लोगों की प्यास बुझा रही हूं। मेरे प्यारे बेटों को पीढ़ियों तक जल की कमी न हो, मेरे तट हमेशा हरे-भरे रहें और खेतों में फसलें लहलहाती रहें, इसलिए मैंने जल बैंक स्थापित किए थे।

मेरे दोनों ओर पसरे विंध्याचल और सतपुड़ा केवल पत्थर दिल पहाड़ मात्र नहीं हैं। वे मेरे लिए पिता तुल्य हैं, जिनका जल रूपी आशीर्वाद मुझे सदैव प्राप्त होता रहता है। वे ही मेरे लिए जल का प्रबंध करते हैं। बरसात में जब मेघ छलकते हैं तो दोनों पर्वतों में लगे विशाल सघन वन विशेशकर शाल के वृक्ष बरसात की एक-एक बूंद को बड़े जतन से सहेजकर रखते हैं। वे इस जल के भंडार को उस समय खोलते हैं, जब गर्मी की तपन से मेरी धाराएं सिकुड़ने लगती हैं और मुझे जल की जरूरत पड़ती है।

इस समय इन वनों से होकर बहने वाली मेरी अनेक छोटी-छोटी सखियां उस एक-एक बूंद जल को बटोरती हैं और उस खजाने को लेकर खिलखिलाती हुई दौड़कर मेरे पास चली आती हैं। इन असंख्य बूंदों को पाकर मैं फूली नहीं समाती और फिर इन्हीं बिंदुओं से सिंधु रूप हो जाती हूं। तभी तो मेरे तटों पर तुम गाते हो- बिंदु रूप से सिंधु रूप हो बहने लगी तरंगिनी मां…!

मेरा यह जल बैंक और एकत्रीकरण का तंत्र सदियों तक चलता रहा, लेकिन पिछले कुछ दशकों से यह छिन्न-भिन्न हो गया है। ऐसे में मुझे मेरे सघन वन और सहेलियां बहुत याद आती हैं। जीवों के कल्याण के लिए बने इस प्राकृतिक तंत्र को तुम्हारी बदनीयती ने तोड़ डाला। अपने क्षणिक स्वार्थ के लिए लोगों ने मेरे जलग्रहण क्षेत्र में लगे वनों का विनाश कर डाला। पिछले तीन-चार दशकों में विंध्याचल और सतपुड़ा के सघन वन क्षेत्र में भारी गिरावट आई है। मेरी सहायक नदियां पूरी तरह सूख चुकी हैं, जो बची हैं, वे भी खत्म होने की कगार पर हैं।

मेरी 19 मुख्य सहायक नदियां हैं। इनमें से नरसिंहपुर की सींगरी, शक्कर, सोहागपुर की पलकमति, रायसेन की तेंदूनी लगभग सूख ही चुकी हैं। रायसेन की बारना, होशंगाबाद की तवा नदी पर बांधों का पहरा बैठा दिया गया है। शेर, गंजाल, दूधी, देनवा, हथनी खुद ही बूंद-बूंद पानी को तरस रहीं हैं। ये ही तो मेरी शिराएं और धमनियां हैं। जब इनमें ही पानी नहीं है तो मेरी हालत ठीक कैसे रह सकती है? यदि वनों की बात करूं तो पिछले दो दशकों में प्रदेश में अति सघन वनों, मध्यम वनों और ओपन वनों में कमी दर्ज की गई है। प्रदेश में ट्री कवर एरिया में एक हजार वर्ग किमी की कमी आई है। वन क्षेत्र लगातार कम होते जा रहे हैं।– (जारी)