नर्मदा कथा अंतिम कड़ी (आज नर्मदा जयंती है) 

प्रमोद शर्मा

मैं नर्मदा हूं, तुम सबकी नरबदा मैया..! आज फिर तुम्हारे सामने हूं। आज अमरकंटक से लेकर भरूच तक घाटों-घाट मेरे जन्मोत्सव के आयोजन हो रहे हैं। सुबह से लेकर शाम तक पूजा-आरती और अन्य धार्मिक आयोजन होंगे। कन्या भोज और भंडारे होंगे। झालर-घंटियों के बीच आरती, नर्मदाष्टक और मेरे जस गाए जाएंगे।

उत्सव मनाना बहुत अच्छी बात है। जीवन में उत्सव और आयोजन तो होना ही चाहिए। यही जीवन को पूर्णता और निरंतरता देते हैं, लेकिन इन उत्सवों के बीच तुम्हें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कहीं जीवन ही न खो जाए। तनिक देखो मेरे लाल! उत्सवों के दौरान मेरे तटों पर कितना प्रदूषण और गंदगी हो जाती है। बाद में यही सब गंदगी मेरी धारा में मिल जाती है और मैं रो पड़ती हूं। रो इसलिए नहीं पड़ती कि मुझे कष्ट होता है। वह कष्ट तो मैं झेल जाती हूं, सह जाती हूं, लेकिन मेरी असल पीड़ा तो यह है कि उस गंदगी और प्रदूषण के कारण मेरा जल तुम्हारा कंठ तर करने के लायक नहीं रह जाता। वह तुम्हें स्वास्थ्य प्रदान करने की बजाय परेशानी का कारण भी बन सकता है।

मेरी विनती मेरे सभी पुत्रों से है। अमरकंटक से भरूच तक मेरी पूजा करने वाले, मुझे मां मानने वाले एक-एक बेटे से है। तुम मेरी जयंती कई दशकों से मनाते चले आ रहो। इससे मुझे बहुत खुशी होती है। इस बार एक संकल्प मेरे कहने से लो कि अब मेरी धारा में प्रदूषण नहीं करोगे। उसे गंदा नहीं करोगे। उसमें मिलने वाले नासूर बन चुके नालों को रोक दोगे। ताकि एक बार फिर मेरे तट सौंदर्य से भर जाएं। मेरी धारा में जीवन पाने वाले सूक्ष्म जीव से लेकर मगर तक, मेरे तटों पर विचरने वाले छोटे-बड़े पशु कुलांचे भरने लगें। आकाश में स्वच्‍छंद उड़ने वाले पक्षी फिर खुशी से चहचहाने लगें और आद्य शंकराचार्य द्वारा रचित मेरे अष्टक की एक-एक पंक्ति, उसका एक-एक शब्द- ‘‘कलोमलोघ भारहारि सर्व तीर्थनायकं। सुमच्छकच्छ नक्र चक्र चक्रवाक शर्मदे।।‘‘ की उद्घोषणा करता हुआ लगे, जिससे मार्कण्डेय, कपिल, भृगु, सनत्कुमार, कश्‍यप जैसे महान ऋषि-मुनियों की तपःस्थली रही मेरी धारा एक बार फिर वैभव, ज्ञान, विज्ञान और अध्यात्म की धारा बन जाए।

जयंती के अवसर पर मेरे किसी घाट पर एक ठेठ ग्रामीण भक्त की भाव भरी आवाज मुझे सुनाई दे रही है। तुम भी ध्यान लगाकर सुनो वह बड़ी प्रसिद्ध बंबुलिया गा रहा है-
‘‘नर्मदा मैया ऐसी तो बहे रे, जैसे दूध की धार।
नर्मदा मैया ऐसी तो मिले रहे, जैसे माई और बाप।।
नर्मदा मैया हो…!‘‘

आज तुम सब मुझसे अपने मन की मुराद मांग रहे हो, मैं उसे हमेशा की भांति अवश्‍य ही पूर्ण करूंगी, लेकिन आज मेरा मन भी तुमसे कुछ मांगने को कर रहा है-
‘‘मेरे बेटे ऐसे तो बनो रे, जैसे श्रवण कुमार।
जैसे निरंतर बहे दूध की धार हो।।
मेरे बेटो हो…!‘‘
– अस्तु!!!