अजय बोकिल

किसी खास नाम, किसी खास समाज या सम्प्रदाय के खिलाफ माहौल खड़ा कर अपनी राजनीतिक अथवा व्यावसायिक दुकान चमकाने के दो टोटकों पर देर से ही सही, कुछ लगाम लगाने की कोशिश की गई, यह अच्छी बात है। पहले मामले में मुंबई की एक मिठाई की दुकान का नाम ‘कराची’ रखने पर धमकाने की बात है तो दूसरे में अल्पसंख्‍यकों खासकर मुसलमानों की नौकरशाही में कथित बढ़ती संख्या को लेकर सिविल सर्विस जिहाद का मामला है।

एक में सम्बन्धित राजनीतिक पार्टी ने अपने ही एक नेता के विवादास्पद बयान से पल्ला झाड़ा तो दूसरे में केन्द्र सरकार ने विवादित चैनल के उस एजेंडे पर चेतावनी दी, जो देश का माहौल बिगाड़ने के मकसद से चलाया जा रहा था। हालांकि ऐसी प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने की जो बात हुई है, वह भी सतही ही है, फिर भी इसका स्वागत इसलिए किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे कुछ तो संदेश जा रहा है।

ताजा मामले में मुंबई में शिवसेना नेता नितिन नांदगांवकर बांद्रा वेस्ट में एक मिठाई की दुकान पर पहुंचे और दुकान मालिक से कहा कि वह दुकान के नाम में से कराची शब्द हटा दे। इसकी जगह कोई मराठी भाषा का शब्द रख दे। बतौर चेतावनी इस बदलाव के लिए उन्होंने दुकान मालिक को 15 दिन का वक्त दिया। नांदगांवकर ने कहा कि मुंबई और महाराष्ट्र में ‘कराची’ नाम इस्तेमाल नहीं करने दिया जाएगा। अगर आप मुंबई में रहते हैं तो मुंबई पर गर्व करो। पाकिस्तान मुर्दाबाद है और रहेगा। जल्द ही यह वीडियो वायरल हो गया। उधर इस दबंगई से घबराए दुकानदार ने दुकान के साइनबोर्ड पर कराची शब्द अखबार से ढंक दिया।

मामला मीडिया में उछला तो शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत ने नांदगांवकर के बयान से पल्ला झाड़ लिया। उन्होंने कहा कि इस दुकान का नाम बदलने की मांग शिवसेना की नहीं है। ‘कराची बेकरी’ और ‘कराची स्वीट्स’ मुंबई में पिछले 60 सालों से है। इनका पाकिस्तान से कोई लेना-देना नहीं है। इनके नाम बदलने की बात पूरी तरह बेतुकी है। हालांकि राउत की बात का नांदगांवकर पर कोई असर नहीं पड़ा। उन्होंने कहा कि अगर कोई नाम नहीं बदलता है तो मैं उसे बदलवाऊंगा। मैंने वही किया, जो मुझे सही लगा।

बता दें कि नितिन नांदगांवकर ने अपने राजनीतिक कॅरियर की शुरुआत शिवसेना से ही की थी, लेकिन बाद में वो राज ठाकरे के साथ उनकी पार्टी महाराष्ट्र ‍नवनिर्माण सेना में चले गए थे। मनसे में वो पार्टी महासचिव (यातायात) थे। यातायात इसलिए, क्योंकि उन पर मुंबई के टैक्सीवालों को ‘कायदे’ में रखने की जिम्मेदारी थी। लेकिन लगता है कि मनसे के धुंधले राजनीतिक भविष्य के चलते नांदगांवकर ने वापस शिव सेना का दामन थामा। हालांकि नांदगांवकर ने जो किया, वह शिवसेना, मनसे की कार्यशैली के अनुरूप ही था।

दूसरा मामला एक विवादित टीवी चैनल से जुड़ा है। इस पर  एक सम्प्रदाय विशेष के ‍खिलाफ नफरत फैलाने का आरोप है। चैनल के मालिक सुरेश चह्वाणके खुद को कट्टर हिंदूवादी मानते हैं। सुरेश यूं तो महाराष्ट्र से हैं, लेकिन अब ‍दिल्ली में रहते हैं। वो ‘बिंदास बोल’ कार्यक्रम के एंकर भी हैं। इसी चैनल पर उन्होंने ‘यूपीएससी जेहाद’ कार्यक्रम चलाया। सुरेश यह बात फैला रहे थे कि अल्पसंख्यक खासकर मुस्लिम देश में ‘यूपीएससी जेहाद’ के माध्यम से पूरे प्रशासन तंत्र पर कब्जा करना चाहते हैं।

सुरेश चह्वाणके के इस टीआरपी बटोरू कार्यक्रम के खिलाफ कई रिटायर्ड अ.भा. पुलिस सेवा तथा आईएएस अधिकारियों ने गहरी नाराजी जताते हुए बयान जारी किया। जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो उसने इस कार्यक्रम के प्रसारण पर रोक लगा दी। सुरेश चह्वाणके ने अगस्त में अपने कार्यक्रम के टीजर का वीडियो वायरल किया था। शीर्ष अदालत में केन्द्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने कहा कि ‘यूपीएससी जेहाद ’ के कार्यक्रम ठीक नहीं हैं और इनसे सांप्रदायिकता भड़क सकती थी।

मंत्रालय ने चैनल से कहा है कि वह भविष्य में इसे लेकर सावधानी बरते। केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि सुदर्शन टीवी ‘यूपीएससी जिहाद’ के कार्यक्रमों का प्रसारण कुछ बदलाव के साथ कर सकता है। मंत्रालय ने यह भी कहा कि हालांकि अभिव्यक्ति की आज़ादी एक मौलिक अधिकार है, लेकिन सुदर्शन न्यूज के जो कार्यक्रम प्रसारित हुए हैं, उनसे यह इशारा मिलता है कि चैनल ने प्रोग्राम कोड का उल्लंघन किया है। ये कार्यक्रम ठीक न होने के साथ ही आक्रामक भी हैं।

इसके पूर्व सरकार ने इस चैनल के संदर्भ में एक जांच कमेटी भी बनाई थी। इसकी रिपोर्ट चैनल के कार्यक्रम के खिलाफ ही आई थी। इस कार्यक्रम के खिलाफ रिटायर्ड ‍सिविल अधिकारियों की नाराजी इसलिए वाजिब थी, क्योंकि किसी व्यक्ति की निजी राय कुछ भी हो, लेकिन सिविल सेवा में आने के बाद वह लोकसेवक ही होता है। सितंबर महीने में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस कार्यक्रम के प्रसारण पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी थी। कोर्ट ने कहा था कि ‘आप एक धर्म विशेष को टारगेट नहीं कर सकते।’

अदालत ने पहली नज़र में इस कार्यक्रम को मुसलिम समुदाय को अपमानित करने वाला पाया था। अदालती सुनवाइयों में केंद्र सरकार ने माना था कि ‘यूपीएससी जिहाद’ ने प्रोगाम कोड यानी किसी कार्यक्रम के प्रसारण के लिए निर्धारित नियमों का उल्लंघन किया है। इसे लेकर सुदर्शन न्यूज़ को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया है। सरकार के मुताबिक केबल टेलीविजन नेटवर्क नियम, 1994 के तहत किसी भी कार्यक्रम में ऐसे दृश्य या शब्द नहीं होने चाहिए जो किसी भी धर्म या समुदाय पर हमला करते हों।

सवाल यह है कि विद्वेष की ऐसी राजनीति कर और ऐसे कार्यक्रम दिखाकर वो सिद्ध क्या करना चाहते हैं? जहां तक दुकान के नाम से कराची शब्द हटाने की दादागिरी का प्रश्न है तो 1947 में देश विभाजन के बाद भारत आया सिंधी समुदाय आज भी अपने अतीत की यादों से जुड़ा हुआ है। दुकान का नाम कराची रखने के पीछे यह मकसद है। उसकी जगह मराठी या और किसी भी भाषा का कोई शब्द कैसे ले सकता है? कल को कोई यह भी कह सकता है कि लालकृष्ण आडवाणी और मनमोहन सिंह को अपने जन्मस्थान इसलिए बदल लेना चाहिए, क्योंकि अब वो पाकिस्तान में हैं। इतिहास को आप डंडा मारकर तो नहीं बदल सकते।

पाकिस्तान में आज भी कई ऐसे नाम हैं, जो भौगोलिक रूप से अब भारत में हैं। मसलन लाहौर में बिकने वाले ‘अमृतसरी दही भल्ले (दही बड़े)। पान आज भी वहां बनारसी के नाम से बिकता है। दुकान का नाम अलग रखें तो भी मिठाई ‘कराची हलुवा’ का क्या करेंगे? उसे मुंबई हलुवा तो नहीं किया जा सकता। ठीक वैसे ही जैसे ‘बंबई की मिठाई’ (पहले यह खूब बिकती थी और बच्चों में काफी लोकप्रिय थी) को कराची की मिठाई नहीं बनाया जा सकता। और ऐसा करने की कोशिश भी मूर्खता है। इस हिसाब से दिल्ली का लाहौरी गेट भी हटाना पड़ेगा। उसी तरह लाहौर में ‍दिल्ली गेट है।

हालांकि नांदगांवकर ने जो किया, वह शिवसेना के एजेंडे का ही हिस्सा है, लेकिन फिलहाल शिवसेना मुंबई और महाराष्ट्र को अपनी बपौती मानकर चल रही है, इसलिए उसने नांदगांवकर के बयान से पल्ला झाड़ा। पिछले साल बंगलुरू में ‘कराची बेकरी’ को लेकर विवाद हुआ था। यह बेकरी भी एक सिंधी व्यक्ति की है।

सुरेश चह्वाणके का कार्यक्रम तो और भी ज्यादा दुर्भावना से भरा था। वैसे नफरत फैलाने के आरोप में सुरेश चह्वाणके को यूपी में 2017 में गिरफ्तार भी किया जा चुका है। अदालत में सुरेश चह्वाणके ने भी अभिव्यक्ति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हवाला दिया था। बेशक, अभिव्यक्ति की और व्यक्तिगत स्वतंत्रतता सभी को है, लेकिन इस अधिकार के दुरुपयोग की सीमारेखाएं तो तय करनी ही होंगी। नहीं की जाएंगी तो अंतत: देश फिर बिखरने की कगार पर पहुंच जाएगा।