डॉ. अजय खेमरिया

मप्र के उत्तरी अंचल में अतिवृष्टि से हुए अभूतपूर्व नुकसान को लेकर आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला आरम्भ है। इस प्राकृतिक आपदा से निपटने के तौर तरीकों पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इस बीच जो बुनियादी पक्ष अभी भी विमर्श की परिधि से बाहर है वह उस सरकारी सिस्टम का है जिसे बदलने की बात कोई नहीं कर रहा है। ग्वालियर के पूर्व कमिश्नर बीएम शर्मा ने एक सवाल खड़ा किया है जिस पर विमर्श की आवश्यकता है। उन्होंने नेताओं के हवाई सर्वेक्षण के औचित्य पर सीधे सवाल उठाया है। करीब 35 साल की प्रशासनिक सेवा के बाद श्री शर्मा मौजूदा मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के ओएसडी भी रह चुके है।

वाकई सवाल यह उठाया जाना ही चाहिये कि हमारा नागर प्रशासन आखिर कब तक ऐसे मामलों में अपनी अक्षमता को ढोता रहेगा। भारी भरकम मोटी तनख्वाह औऱ सुविधाओं वाले अमले के बावजूद हमें सेना या पैरामिलिट्री फोर्स की ओर ऐसी आपदाओं के वक्त क्यों ताकना पड़ जाता है। क्या ग्वालियर चंबल की बाढ़ की ताजा परिस्थितियों ने हमारे नागरिक प्रशासन की अक्षमता औऱ जनता के प्रति भरोसे की कमी को उजागर नहीं किया है। इस विचार के आलोक में विमर्श की परिधि में हमारे जनप्रतिनिधि भी आते है क्योंकि अंततः नीति और विधान बनाने की जवाबदेही तो उन्हीं की है।

मूल सवाल पर आते हुए हमें सबसे पहले राहत के मैकेन्जिम पर गंभीरता से विचार की आवश्यकता है। हमने इन दिनों में देखा कि मुख्यमंत्री से लेकर दीगर बड़े नेताओं ने बाढ़ का हवाई सर्वेक्षण किया। फिर मैदानी दौरे किये और जैसे जैसे पानी उतरता गया सरकारी मशीनरी भी मैदान से हटती गई। क्या यह आपदाओं से निपटने का सक्षम औऱ प्रमाणिक मॉडल है? कलेक्टर के दफ्तरों पर नुकसानी आकलन में अपना नाम जुड़वाने के लिए ग्रामीणों की भीड़ जुटने लगी है। हाथ में दरख्‍वास्‍त लिए हर कोई साहेब बहादुरों की दहलीज पर दया की इमदाद मांगने खड़ा नजर आ रहा है।

अनुभव यही कहता है कि बहुसंख्यक गरीब थक हार कर दरख्वास्त को किसी एफडी की तरह सहेजकर फिर अपनी जिंदगी को पटरी पर लाने में रम जाएगा। राहत उसी को मिलेगी जिसे पटवारी दर्ज कर कलेक्टर की रिपोर्ट में पेश करेगा। जो पटवारी के खास होंगे वे मजे करेंगे जो आम होंगे वे उसी दरख्वास्त को लिए फिर दफ्तर दफ्तर हांफते रहेंगे। पटवारी जो लिखेंगे उसी पर सरकार चलेगी। कहते भी हैं कि पटवारी अगर चाहे तो वल्लभ भवन भी आपके नाम कर दे। जाहिर है हवाई दौरों, मंत्रियों के लंबे लंबे कारकेड, बड़ी बड़ी बातें सिर्फ बातें ही रहती है, अगर पटवारी की कलम न चले।

तो सवाल यह कि यह इमदाद बांटने का छबीना निकाला ही क्यों जाता है। आपदा से सेना बचाए औऱ राहत की डगर पटवारी से होकर निकले तब नागरिक प्रशासन की इस हायरार्की की आवश्यकता क्या? पटवारी यूं तो राजस्व संगठन में सबसे निचले पायदान की इकाई है लेकिन उसे गोरी हुकूमत ने ईजाद किया था और उसके हाथ में नापजोख की जरी मुगलिया बादशाह अकबर के नवरत्न टोडरमल ने थमाई थी। तो भला हम उसकी ताकत से कैसे लोहा ले सकते हैं। व्यवस्था की त्रासदी यही पटवारी सिस्टम है जिसे ‘राजस्व पुस्तक परिपत्र’ में आज भी अपरिमित ताकत मिली हुई है।

बाढ़ या अन्य ऐसी ही आपदाओं में इसी ‘राजस्व पुस्तक परिपत्र’ में बने प्रावधानों के तहत नागरिकों को राहत दी जाती है। विडम्बना यह कि जब तक इस सिस्टम में पटवारी नुकसानी आकलन नहीं भरता है, तब तक कोई कलेक्टर हो या प्रमुख सचिव, राहत की फाइल पर दस्तखत नहीं कर सकता। भले ही खुद उसके खेत, खलिहान या घर बाढ़ में बह गए हों। अब मैदानी स्थिति पर गौर कीजिये, पटवारी हल्के में एक से ज्यादा गांव होते है। उसे मंत्रियों के दौरे में भी रहना है, सर्किट हाउस के खर्चे भी उठाने हैं और दुनिया जहान की नाप जोख भी करनी है।

टोडरमल के जमाने से लेकर आज के लैपटॉप युग तक पटवारी का कोई दफ्तर नहीं बना है। वह थैले में आपकी जमीनों से लेकर आगजनी, बाढ़, सूखा, आकाशीय बिजली, बीपीएलकार्ड, ईडब्ल्यूएस सर्टिफिकेट, पीएम आवास, पीएम किसान सम्मान निधि जैसी बीसियों कुंडली को लिए घूमता है। ठीक वैसे ही जैसे प्रयागराज के पंडे हमारे पुरखों का हिसाब बताते है। आरबीसी यानी राजस्व पुस्तक परिपत्र में फसलों के नुकसान का आकलन करने का एक वर्गीकरण है जो अंततः पटवारी की मनमानी औऱ जनता के लिए भेदभाव का सबब बनता है।

इसके तहत अगर 25 फीसदी नुकसान हुआ है तो किसान को अलग मुआवजा मिलता है और 50 से 75 फीसदी पर अलग। यह वर्गीकरण मैदानी रिपोर्ट में पटवारी को एक तरह की आजादी देता है, क्योंकि राजस्व व्यवस्था में अंतिम इकाई वही है। हम सभी जानते हैं कि पटवारी चाह कर भी सभी खेतों में प्रमाणिक आकलन नहीं कर सकता है। फिर मुफ्तखोरी की जिस राजनीतिक संस्कृति पर हमारी व्यवस्था खड़ी कर दी गई है, उसने समाज का नैतिक स्खलन भी करके रख दिया है। जिसका 10 फीसदी नुकसान है वह भी 100 फीसदी दर्ज कराना चाहता है।

पशुधन की हानि पर पोस्टमार्टम रिपोर्ट का प्रावधान भी है। यानी शिवपुरी के किसी गांव से 50 जानवर बाढ़ में बह जाते हैं तो मुख्यमंत्री की घोषणा को अमल में लाने के लिए उन सभी पशुपालकों को पहले उन जानवरों की मृत काया ढूढ कर लानी होगी फिर पशु औषधालय में उनका पीएम कराकर रिपोर्ट सहेजनी होगी। ऐसे ही बीसियों प्रावधानों से राजस्व परिपत्र के नियम बंधे हुए हैं। जाहिर है अगर सरकार अपनी घोषणाओं को वास्तविक जरूरतमंद तक पहुंचाना या उन पर अमल कराना चाहती है तो उसे अपने डिलीवरी सिस्टम को प्रेक्टिकल बनाना होगा।

प्राकृतिक आपदाओं में सरकारी मदद को मुआवजे के भ्रम से हटाना होगा। क्योंकि राजस्व प्रावधान स्प्ष्ट कहते हैं कि यह केवल तात्‍कालिक क्षतिपूर्ति है जबकि हमारे नेता इसे मुआवजा कहते हैं। दोनों में अधिकार और अनुकम्पा का बुनियादी अंतर है, लेकिन शोर ऐसा खड़ा किया जाता है मानो सरकार खजाना खोलने जा रही है। मसलन 0 से 4 हैक्टर भूमि वाले को 75 फीसदी नुकसान पर अधिकतम 25 हजार ही मिलने है। अभी राजपत्र में मकान ध्वस्त होने पर मामूली राहत की व्यवस्था है। यह मुआवजा नहीं हो सकता है।

बेहतर होगा प्राकृतिक आपदाओं के लिये उनकी प्रकृति के अनुसार राहत के लिए किसान/व्यक्ति को इकाई ही न माना जाए। गांव या पटवारी हल्के को इकाई मानकर राहत के प्रावधान सुनिश्चित किये जाये। यानी नुकसान के लिए जो वर्गीकरण के स्लैब पटवारी की रिपोर्ट पर तय होते है उनके स्थान पर सामान्य स्लैब बना दिये जायें। इससे आमोखास के भेदभाव की शिकायतें खत्म हो सकती हैं। गांव में जिसकी जितनी जमीन उसे उसकी जमीन के अनुसार राहत। इससे पटवारीराज भी खत्म हो जाएगा। एक समान भाव सरकार का सुनिश्चित होगा।

शिवराज सिंह सरकार ने फसल बीमा में इस तरह का बदलाब किया भी है। पहले तहसील इकाई हुआ करती थी जिसे बाद में मुख्यमंत्री की पहल पर हल्का इकाई में तब्दील किया जा चुका है। एक महत्वपूर्ण पक्ष इस तरह की त्रासदी का यह भी है कि हमारे जनप्रतिनिधियों को सरकारी अमले पर आज भी भरोसा नहीं है। विधिक नजरिये से तो चुने गए प्रतिनिधि सरकारी मुलजिमों से ऊपर हैं लेकिन 75 साल बाद भी कम से कम राजस्व का चेहरा तो औपनिवेशिक ही बना हुआ है। वरन क्या कारण है कि नेताओं को हवाई सर्वेक्षण खुद करने पड़ते है?

ऐसे संकट में क्या बेहतर नहीं होता कि जिला स्तरीय कमांड सेंटर्स से बचाव और राहत के प्रयासों पर निगरानी रखी जाए। नेताओं के मैदानी दौरों से आखिर क्या हासिल होता होगा, सिवाय सरकारी मशीनरी का समय खराब होने के? हर आपदा सिस्टम को सुधरने की नसीहत देकर जाती है, इसलिए हमें ग्वालियर चंबल की इस आपदा से बुनियादी प्रावधानों एवं अपने तौर तरीकों को जनोन्मुखी बनाने का प्रयास सुनिश्चित करना चाहिए। अगर मंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों की मैदानी मौजूदगी ही राहत और बचाव कार्यों की प्रमाणिकता की गारंटी है तो यह हमारे नागरिक प्रशासन की क्षमता और लोकसेवक के रूप में उनकी भूमिका को गंभीरतापूर्वक प्रश्नचिचिह्नित तो करती ही है। जबकि अंततः जवाबदेही हमारे शासन की बनती है।

एक औऱ महत्वपूर्ण बात अंचल में ग्राउंड जीरो तक यह सुनी जा रही है कि शिवपुरी, श्योपुर, दतिया, भितरवार, भिंड के इलाकों में बाढ़ स्थानीय बांधों से पानी छोड़े जाने के कारण आई है। जिम्मेदार अफसरों की ओर से इस आशय का प्रामाणिक स्‍पष्टीकरण आज पर्यंत नही आया है। यह जनता के साथ संवादहीनता की स्थिति है। इससे सरकार की छवि प्रभावित होती है। जनता को यह बताया ही जाना चाहिये कि बांधों से पानी छोड़ने की एक विहित प्रक्रिया है और उसी के अनुरूप पानी छोड़ा गया है। अगर ऐसा नहीं है तो यह औऱ भी दुर्भाग्यपूर्ण है। (मध्‍यमत)
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