सरयूसुत मिश्रा

मध्‍यप्रदेश में टेक होम राशन में महालेखाकार (एजी) द्वारा घोटाले की आशंका से पक्ष-विपक्ष के बीच वार-पलटवार चल रहा है। इसमें सरकार ने यह तो मान लिया है कि घोटाला कांग्रेस की सरकार में हुआ था। मंत्री विश्वास सारंग की इस स्वीकारोक्ति से नैतिकता, शुचिता, जवाबदेही, सिस्टम की खामियां, उसे सुधारने की नीयत और प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल खड़े हो गए हैं।

सरकार ने जब यह मान लिया है कि घोटाला कांग्रेस सरकार के समय हुआ था तो उसे यह भी बताना चाहिए कि पूर्व सरकार के घोटाले अभी तक उजागर क्यों नहीं किए गए? जब सरकार को पहले से घोटाले के बारे में मालूम था तो उसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ विधि-सम्मत कार्यवाही क्यों नहीं की गई? नैतिकता और राजनीतिक शुचिता क्या केवल गाल बजाने के लिए रह गई है?

जनता के नुमाइंदे जब सरकार संचालन की शपथ लेते हैं तब शपथ की शुरुआत यहीं से होती है कि हम शुद्ध अंतःकरण से यह शपथ ले रहे हैं। जब अंतःकरण शुद्ध होगा तब आचरण में कोई भी अशुद्धता चाहे वह पक्ष की हो या विपक्ष की, कैसे आ सकेगी?

आजकल राजपथ और घोटाला-पथ में अंतर करना मुश्किल सा होता जा रहा है। बिना घोटाला-पथ पर चले हुए राजपथ पर पहुंचने की शायद अब कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसीलिए राजनीति में शामिल पक्ष-विपक्ष घोटालों को राजनीतिक हथियार के रूप में उपयोग करने के सिद्धहस्त हो गए हैं। घोटाला चाहे ‘एक्स’ ने किया हो चाहे ‘वाई’ ने उसका प्रभाव तो पब्लिक पर ही पड़ता है।

पोषण के मामले में मध्यप्रदेश आज चिंताजनक स्थिति में है। आए दिन अखबारों में ऐसे समाचार और चित्र प्रकाशित होते हैं जिसमें कुपोषण के कारण नारकीय जीवन जीने वाले बच्चों के बारे में देख सुनकर दिल दहल जाता है। वैसे तो मानवीय संवेदना ही ऐसी बातों से निरपेक्ष हो गई है लेकिन राजनीतिक संवेदना तो शायद शून्यता के शिखर पर पहुंच गई है।

अभी जो मामला मध्यप्रदेश में चर्चित है उसमें जिस तरह के घटनाक्रम महालेखाकार द्वारा बताये गए हैं, वह सिस्टम के छिन्न-भिन्न हो रहे अंग प्रत्यंग को प्रदर्शित कर रहे हैं। राशन जिन गाड़ियों से ले जाया गया, उनके नंबर गलत हैं, जिन संयंत्रों में राशन बनाया गया उनकी बिजली खपत को देखकर एजी ने माना है कि वहां उसका प्रोडक्शन नहीं किया गया। प्रक्रियागत और भी कई खामियां बताई गई हैं। सरकार की ओर से जो सफाई आई है उसमें कांग्रेस के समय में घोटाले की बात के साथ यह भी कहा गया है कि अभी यह प्रारंभिक रिपोर्ट है, यह कोई अंतिम रिपोर्ट नहीं है। सरकार इस रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया देगी।

सरकार के एक मंत्री की ओर से यह वक्तव्य भी आया है कि ऑडिट रिपोर्ट तो अर्धसत्य होती है। आज सबसे बड़ा सवाल सत्य के सामने ही खड़ा हुआ है। असत्य के राजनीतिक बाजार में चारों तरफ असत्य का ही व्यापार हो रहा है, व्यवहार हो रहा है, लेन-देन हो रहा है। ऐसे हालात में अगर किसी तरफ से सत्य की आवाज उठती है तो उसे अराजक बताने की कोशिश की जाती है। दुर्भाग्य से आज सत्य ही अराजक बन गया है। नरेंद्र मोदी के साथ ऐसा ही हो रहा है।

ऑडिट रिपोर्ट, घोटालों की जांच के लिए बनी समितियों और आयोगों की रिपोर्टों का भविष्य हमेशा अंधकार में ही रहा है। सरकारों के खिलाफ आरोप पत्र जनता को ठगने के लिए उपयोग होने लगे हैं। मुफ्तखोरी और लोकलुभावन वायदे और भाषण तभी सफल माने जाते हैं जब उनसे सत्ता तक पहुंचा जा सके।

राज्यों में जब सरकारें बदलती हैं तब पूर्व सरकारों के खिलाफ घोटालों और गड़बड़ियों की जांच का एक विधि-सम्मत स्वांग रचा जाता है। मध्यप्रदेश में सुंदरलाल पटवा की सरकार जाने के बाद जब दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बनी थी तब भोपाल में जमीन आवंटन में घोटाले की जांच के लिए वरिष्ठ अफसर जी.जगतपति की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई थी।

इस समिति की रिपोर्ट के नाम पर 10 साल तक कांग्रेस की सरकार ने भाजपा के साथ राजनीतिक संतुलन साधा, लेकिन इस पर आज तक कोई कार्रवाई होने की सूचना सार्वजनिक नहीं हुई है। जो जमीन आवंटित की गई थी उन जमीनों पर नियम विरुद्ध बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं आज भी खड़ी हुई हैं। भले ही नालों पर बनी इन अट्टालिकाओं से शहर को कितना भी नुकसान हो रहा हो लेकिन इनको कोई भी सरकार हिला नहीं सकी।

कमलनाथ के नेतृत्व में जब 15 महीने की सरकार बनी थी तब उन्होंने बीजेपी के खिलाफ घोटालों की जांच के लिए जन आयोग बनाने का वायदा किया था। कांग्रेसी मुख्यमंत्री और मंत्रियों की ओर से पूर्व सरकार के खिलाफ बातें तो बहुत की गई लेकिन कार्रवाई के नाम पर कुछ भी करने में सरकार सफल नहीं हुई। वही स्थिति अब वर्तमान सरकार के दौरान दिखाई पड़ रही है।

मंत्री विश्वास सारंग टेक होम राशन में कांग्रेस सरकार के दौरान घोटाले की बात भले ही स्वीकार कर चुके हैं लेकिन वह किसी भी कार्रवाई के प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सके। केवल यह कहना कि संबंधित एजेंसी का भुगतान रोक दिया गया था, अंतिम कार्रवाई नहीं हो सकती। किसी ने भी घोटाला किया है तो केवल भुगतान रोकना क्या उसका समाधान है? क्यों नहीं संबंधित एजेंसी को प्रतिबंधित किया गया? क्यों नहीं ऐसी कार्रवाई की गई जिससे भविष्य में इस तरह की गड़बड़ियों की कोई गुंजाइश न रह सके?

राजनीतिक दलदल में एक दूसरे के सहारे ही खड़े होने का शायद अघोषित सिद्धांत काम करता है। वैसे भी कहा जाता है दलालों का कोई दल नहीं होता। सरकारें भले बदल जाएँ लेकिन सरकार में काम करने वाली एजेंसियां कमोबेश वही होती हैं। राशन सप्लायर कांग्रेस के समय भी वही रहा होगा और आज भी वही होगा?

बिना सिद्धांतों की राजनीति, बिना काम के धन, बिना मानवता के विज्ञान, बिना नैतिकता के व्यापार और बिना चरित्र के ज्ञान को सामाजिक पाप माना गया है। समाज राजनीति का निर्माण करता है तो राजनीति समाज का निर्माण करती है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। चूँकि नेतृत्व राजनीति के पास है इसलिए जवाबदारी उनकी ज्यादा है। समाज की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। सामाजिक पाप चल रहे हैं तो उन्हें चलने देने के लिए जनता जिम्मेदार मानी जाएगी।

भारत में राजनीति कभी नैतिकता और शुचिता का प्रतीक हुआ करती थी। आज इस तरह की हवाएं बहना बंद हो रही हैं। नैतिकता ही राजनीति का मूल है और मूल से हटकर कोई भी बहुत लंबे समय तक जिंदा नहीं रह सकता। पक्ष-विपक्ष का वार-पलटवार का स्वांग, लगातार एक्सपोज हो रहा है। प्राकृतिक नियम यही कहता है कि भविष्य की राजनीति जरूर नया रूप लेगी।
(सोशल मीडिया से साभार)
(मध्यमत)
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