राकेश अचल

ग्वालियर शहर की बदसूरती की लिए कौन जिम्मेदार है, अगर आप ये जान लें तो आप उन्हें कभी क्षमा नहीं करेंगे। ग्वालियर को स्वर्गीय माधवराव सिंधिया द्वितीय ने बीसवीं सदी के आरम्भ में जितना आधुनिक बनाया था उनके समय के रजवाड़ों के उत्तराधिकारियों ने बीसवीं सदी समाप्त होते-होते उसी ग्वालियर की सूरत बद से बदतर कर दी। एक समय का साफ़-सुथरा ग्वालियर आज एक बड़ी झुग्गियों का शहर है। आज कोरोना काल में आप जो भीड़ इस शहर में देख रहे हैं वो भी इन्हीं पूर्व रजवाड़ों के लालच का दुष्परिणाम है।

शासकीय प्रेस के पीछे,  सरदार अकोलकर, खटके, सरनोबत के अलावा थोराट,  परांडे के तीन चार बाड़े, लगभग हरेक के तीस चालीस हजार वर्गफीट के थे जिनमें आज बहुमंजिला मार्किट बन गए। जितने भी रजबाड़े थे सब महाराज बाड़े से तीन किलोमीटर क्षेत्र में थे इसीलिए कंपू, इंदरगंज, शिंदे की छावनी, बहोड़ापुर, गोल पहाड़ियां तक के क्षेत्र में जनसंख्या घनत्व ज्यादा है। ग्वालियर को विकसित करते समय पूर्व के शासकों ने जो दूरदृष्टि अपनाई थी उसे बाद के शासकों ने भुला दिया।

ग्‍वालियर शहर में सिंधिया रियासत के डेढ़ सौ से ऊपर रजवाड़े थे। रजवाड़े यानि वे सरदार जो कभी सिंधिया दरबार में मंत्री थे। सिंधिया ने सभी को रहने के लिए बड़े-बड़े परिसर और महलनुमा कोठियां बनाने की इजाजत दी थी। जिसकी जैसी हैसियत थी उसके हिसाब से उनके बाड़े थे। किसी का छोटा तो किसी का बड़ा। सिंधिया की रियासत में पांच बड़े सरदार थे, सो उनके बाड़े भी लम्बे-चौड़े थे,  उसके बाद मध्यम और उनसे छोटे सरदार थे, उनके अपने बाड़े थे। कुछ तो महल जैसे थे,  लेकिन आज इनमें से अधिकाँश गायब हो चुके हैं।

आजादी के बाद अचानक बेरोजगार हुए इन रजवाड़ों के उत्तराधिकारियों ने अपने खर्चों की आपूर्ति के लिए अपने बाड़ों को पहले बाजारों में बदला,  किराए पर उठाया और फिर भी जब जरूरतें पूरी नहीं हुईं तो उन्हें टुकड़ों में बेच दिया। इस अराजक बिक्री से शहर पर आबादी का बोझ अचानक बढ़ा और शहर की बसाहट के साथ यातायात समेत तमाम व्यवस्थाएं चरमराने लगीं।

आपको शायद पता नहीं हो लेकिन बता दूँ कि ग्वालियर में महाराज बाड़े के पीछे ही एक विशाल जाधव महल था। इस महल के मालिकों ने इसे सैकड़ों टुकड़ों में बेच डाला। आज भी इसी महल में एक मैरिज गार्डन और अनेक गोदाम और मकान बने हैं। इस महल को यदि संरक्षित किया जाता तो महाराज बाड़ा क्षेत्र में न सिर्फ आवागमन सुविधाजनक होता बल्कि यहां आबादी का घनत्व न बढ़ता। जाधव महल के मालिक ग्वालियर छोड़ चुके हैं। हालांकि उनकी तमाम परिसम्पत्तियां आज भी उनकी आय का स्रोत बनी हुई हैं।

ग्वालियर में रॉक्सी सिनेमा के पास एक बाड़ा सिंधिया के धर्म गुरु श्री साहब का था। इस बाड़े का एक हिस्सा आज भी श्री साहब के परिजनों का आवास बना हुआ है लेकिन बाक़ी के हिस्से को टुकड़ों में बेच दिया गया है,  यदि ये बिक्री न होती तो आज रॉक्सी रोड पर आप आसानी से वाहन चला सकते थे। लश्कर के भीतरी हिस्से में कदम साहब, आंग्रे साहब और पता नहीं कितने साहब अपने-अपने बाड़े बेचकर चलते बने। आंग्रे साहब के उत्तराधिकारियों ने तो अभी भी अपने बाड़े का तमाम हिस्सा विरासत के तौर पर संभालकर रखा हुआ है। लेकिन पोटनीस का बाड़ा नहीं बचा। ऐसे अनेक बाड़े समय के साथ टुकड़ों में बिक गए।

ग्वालियर के बड़े सरदारों में एक सरदार थे फालके। उनके नाम से आज बाजार है, लेकिन बाड़े का अधिकांश हिस्सा बिक चुका है। हालांकि उनके बाड़े का एक खूबसूरत भाग बचा हुआ है, लेकिन उसे आप देख नहीं सकते, क्योंकि उस बाड़े के आगे पूरा बाजार बना हुआ है। जयेन्द्रगंज में शितोले साहब के बाड़े को भी खंड-खंड कर बेच दिया गया है। पाटिल, खासगीवाले, चिटनीस, महाडिक के बड़े-बड़े बाड़े खंड-खंड होकर बिक गए। अब अनेक के तो नामो-निशान तक नहीं हैं। लाड,  निम्बालकर,  मांडरे समेत अनेक ऐसे सरदार हैं जिनकी सम्पत्तियाँ बिक चुकी हैं। ये अधूरी सूची है, इसे आप भी अपनी जानकारी से पूरा कर सकते हैं।

पिछड़ी ड्योढ़ी में भी एक सरदार साहब रहते थे, उनका महल भी जाधव महल की तरह ही शादी मंडप बना हुआ है। अनेक सरदारों के नाम अब गलियों के रूप में ज़िंदा हैं जैसे जटार साहब। अब जटार साहब का कोई उत्तराधिकारी है भी या नहीं ये शहर नहीं जानता। सिंधिया शासकों के दीवान रहे राजवाड़े के एक महल में माधव महाविद्यालय है और दूसरे में मैरिज गार्डन। गश्त के ताजिये पर एक खूबसूरत नक्काशी वाले महल में वर्षों तक मध्यप्रदेश राज्य परिवहन निगम का संभागीय कार्यालय चला और जैसे ही वो खाली हुआ उसे खंड-खंड कर बेच दिया गया। आज वहां शॉपिंग काम्प्लेक्स है।

अगर इन रजवाड़ों को अपने शहर से प्रेम होता तो उनकी विरासत शहर की विरासत बनी रहती लेकिन अधिकांश सरदार ग्वालियर को विदा कहकर निकल गए,  कुछ वापस महाराष्ट्र लौट गए तो कुछ विदेश चले गए और जो बचे-खुचे हैं वे आज भी अपनी विरासतों के खंड खंड बेचकर अपनी गुजर-बसर कर रहे हैं। जिन सरदारों के वारिसों ने अपनी विरासत नहीं बेची उनका अभिनंदन होना चाहिए और जो भाग गए उनकी निंदा। दरअसल महत्वपूर्ण सम्पत्तियों को बेचकर पैसा बनाने का रास्ता उन्हें सिंधिया परिवार ने ही दिखाया। खुद सिंधिया के रानी महल की सम्पत्ति पर आज सिंध बिहार, हैलीपेड कॉलोनी, माधवनगर, चेतकपुरी, बसंत बिहार, विवेक बिहार,  हरिशंकरपुरम, श्रीराम कालोनी खड़ी हुई है। इससे महल की खूबसूरती गायब हो गयी।

ग्वालियर में रजवाड़ों की अधिकांश सम्पत्तियाँ लश्कर क्षेत्र में थीं, यदि ये न बेची गई होतीं तो लश्कर भी आज राजस्थान के उदयपुर से होड़ करता दिखाई देता। यहां न पुराने महल बचे न तालाब, न बावड़ियां। सब बेच दी गयीं। शारदा बिहार में बावड़ी के अवशेष आज भी हैं। मैं यहां शहर में पुराने महलों को खंडित कर बनाई गयी कालोनियों की फेहरिस्‍त नहीं दे सकता क्योंकि ये बहुत लम्बी है,  लेकिन आपको ये बता सकता हूँ कि यदि ये रजवाड़े लालची न होते तो हमारा ग्वालियर एक विरासत वाला शहर होता।

रजवाड़ों ने अपनी सम्पत्तियों का बेहतर प्रबंधन करने के बजाय उन्हें बेचना ज्यादा आसान समझा। विधिक अधिकार उनके पास था ही। ग्वालियर की पहचान महाराज बाड़ा के आसपास कि रियासतकालीन अनेक सम्पत्तियाँ न जाने कैसे खुर्द-बुर्द कर दी गयीं। आज उनके इर्द-गिर्द बाजार ही बाजार हैं। रियासत के समय की धर्मशालाएं शहर के धर्मप्रिय परिवार बेचकर खा गए।

रियासतकाल के मठ-मंदिरों की सम्पत्तियों के साथ भी यही खेल हुआ, इन मठ-मंदिरों के पुजारियों और न्यासियों ने तमाम संपत्ति बेच दी। ये अपने आप में खुद अपराध है लेकिन ये दोहरा अपराध इस लिए भी हुआ क्योंकि इसकी वजह से शहर की बसाहट अस्त-व्यस्त हो गयी। कोटेश्वर, गुप्तेश्वर,  भूतेश्वर,  मांडरे की माता मंदिर, गोरखी मंदिर,  दत्त मंदिर, अन्ना साहब का मंदिर जैसे असंख्य मंदिरों,  शालाओं,  श्मशानों की सम्पत्ति बची नहीं। यहां तक उप नगर ग्वालियर में तानसेन की समाधि के आसपास की जमीन भी एक-एक इंच कर कूटरचित दस्तावेजों के तहत बेच दी गयी।

सम्पतियाँ बेचने में रजवाड़ों की मदद की भूमाफिया ने और सत्ता में रहने वाले लोगों ने। यदि आजादी के बाद ही इन सम्पत्तियों का अधिग्रहण कर लिया जाता तो शायद शहर की ये फजीहत न होती। लेकिन लोकतंत्र की उदारता ने इन सम्पत्तियों को हथियाया नहीं और रजवाड़ों ने इन्हें भावी पीढ़ी के लिए बचाया नहीं। दुर्भाग्‍य से ग्वालियर की ऐतिहासिकता के साथ बलात्कार का ये सिलसिला आज भी जारी है। कोई इसे रोकने के लिए न आगे आ रहा है और न आ सकता है, क्योंकि ये अपराध करने वाले लोग अपने आप में समर्थ हैं। जनता और घुटनों के बल बैठी सरकार शहर की विरासत को बचा नहीं सकते।

सिर्फ ग्वालियर में ही नहीं बल्कि रियासतकालीन दूसरे शहरों में भी यही सब हुआ है और हो रहा है। मैंने शहर की बदसूरती पर आंसू बहाकर अपना मन हल्का कर लिया है,  आपकी आप जाने। ये सब लिखते समय मेरे मन में किसी के प्रति कोई नफरत नहीं है लेकिन मैं अपने क्षोभ को छिपा भी नहीं रहा। ग्वालियर मेरी जन्मभूमि भले न हो लेकिन इस शहर ने मुझे आश्रय दिया, पहचान दी,  मेरी आने वाली पीढ़ियों को अवसर दिए, इसलिए शहर के प्रति मेरा इतना दायित्व तो बनता ही है की मैं सच को सच कह सकूं।
(लेखक ग्‍वालियर के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।)