राकेश अचल

मध्यप्रदेश विधानसभा की दो दर्जन से अधिक खाली सीटों के लिए उपचुनाव की घोषणा होने में एक सप्ताह शेष है और इसी के साथ शुरू हो रही है एक और अग्निपरीक्षा। लेकिन ये अग्निपरीक्षा कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की नहीं बल्कि अपनी हेकड़ी की वजह से कांग्रेस की सरकार गिराने के दोषी पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की है। इन उपचुनावों में कमलनाथ या तो हमेशा के लिए हाशिये पर जायेंगे या फिर हमेशा के लिए कांग्रेस पर बोझ बने रहेंगे।

कांग्रेस छोड़ भाजपा में आये ज्योतिरादित्य सिंधिया तो 2018  के विधानसभा में हुई अग्निपरीक्षा में अपने आपको प्रमाणित कर चुके हैं। उस विधानसभा चुनाव में मुकाबला शिवराज  विरुद्ध कमलनाथ नहीं बल्कि शिवराज विरुद्ध महाराज था। ये स्वीकारोक्ति तब की भाजपा की थी। महाराज की वजह से ही भाजपा हारी थी और प्रदेश में पंद्रह साल बाद कांग्रेस की सरकार बनी थी, लेकिन कांग्रेस हाईकमान ने ज्योतिरादित्य सिंधिया की चमक को शायद पहचानने में गलती की और फिर 18 महीने में इसका खमियाजा भी भुगता। जिन सिंधिया की वजह से सरकार बनी थी उन्हीं सिंधिया की वजह से कांग्रेस की सरकार भरभराकर गिर भी गयी।

होने वाले उपचुनाव में भी फैसला ग्वालियर-चंबल अंचल से ही होना है क्योंकि सर्वाधिक 16 सीटें इसी अंचल में हैं। सिंधिया और शिवराज मिलकर इस अंचल में चुनाव प्रचार का श्रीगणेश कर चुके हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह फिर से लगातार तीन दिन ग्वालियर-चंबल अंचल में रहने वाले हैं, लेकिन कांग्रेस अभी तक अपने नेताओं को इस अंचल में उतार ही नहीं पायी है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अपना हवाई दौरा कर वापस लौट गए और कमलनाथ तो तारीख देकर भी नहीं आये। वे  जब मुख्यमंत्री थे तब भी इस अंचल से उन्होंने खासी दूरी बनाये रखी थी और अब शायद उनके पास नैतिक साहस नहीं है, इस अंचल में आने का। कमलनाथ ने जाते-जाते इस अंचल से बड़ा दगा तब किया था जब ग्वालियर के सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल के लिए धन न देते हुए छिंदवाड़ा को 1450 करोड़ की रकम दे दी थी।

ग्वालियर-चंबल अंचल में भाजपा के पास सिंधिया के आने से पहले केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह के रूप में एक नेता था ही, अब भाजपा की ताकत सिंधिया के आने से दुगुनी हो गयी है। जमीन पर ये ताकत दिखाई भी दे रही है। कांग्रेस सिंधिया के विरोध में यकीनन सड़कों पर दिखाई दे रही है लेकिन नेतृत्व विहीन है। कांग्रेस के नेता अभी भी बिखरे-बिखरे हैं। डॉ. गोविंद सिंह अपनी अलग ढपली बजा रहे हैं और लाखन सिंह यादव अलग। दोनों संभागों का कोई एक छत्र नेता कांग्रेस के पास नहीं है। भाजपा छोड़ कांग्रेस में आये पूर्व मंत्री बालेंदु शुक्ल और पूर्व मंत्री भगवान सिंह यादव का नयी पीढ़ी के  कार्यकर्ताओं से कोई तादात्म्य ही नहीं है, दोनों उम्रदराज हो गए हैं सो अलग।

विधानसभा उपचुनाव में इस अंचल में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की टीम भी बुढ़ा चुकी है, कमलनाथ की कोई मजबूत टीम है नहीं, ऐसे में विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस की पुरानी स्थिति को बरकरार रखना लगभग असम्भव सा लग रहा है। कांग्रेस को अगर कुछ हासिल होगा भी, तो वो कांग्रेस की वजह से नहीं अपितु प्रत्याशी की अपनी मेहनत से हासिल होगा। अब चूंकि शिवराज और महाराज एक साथ हैं इसलिए उनकी आंधी का मुकाबला कांग्रेस कैसे करेगी ये अब तक स्पष्ट नहीं है।

अभी तक ये मिथक था कि सिंधिया है जहां, कांग्रेस है वहां लेकिन अब ये मिथक टूटने वाला है। अब सिंधिया हैं जहां, सत्ता है वहां का नया मिसरा गढ़ा जा रहा है। इन उप चुनावों के बाद कांग्रेस का भविष्य तय हो जाएगा, भाजपा का भविष्य तो अभी से तय है। कांग्रेस की सरकार के लिए कांग्रेसियों को फिर तीन साल इन्तजार करना होगा, तब तक चंबल में कितना पानी बह जाएगा कोई नहीं जानता। भाजपा की केंद्र सरकार में अभी सिंधिया को शामिल किया जाना बाकी है। मुझे लगता है की संसद का मानसून सत्र शुरू होने से पहले ये काम भी हो सकता है। ये काम अभी न भी हो तो भी इसे बहुत दिनों तक टाला नहीं जा सकता।

आपको ध्यान रखना होगा की सिंधिया ने भाजपा में आने के बाद बड़ी तेजी से अपने आपको बदला है। वे यदि संघ के नागपुर मुख्यालय गए तो ग्वालियर में भाजपा के जिला मुख्यालय में भी गए और उनके यहां भी भाजपा के दिग्गज लगातार आ-जा रहे हैं। अर्थात वे तेजी से भाजपा में अपनी पैठ बनाने में लगे हैं। उन्हें स्थापित होने में ज्यादा समय भी नहीं लगने वाला। उनकी उपस्थिति राज्य शासन के निर्णयों पर भी साफ़ दिखाई देने लगी है। कांग्रेस के अठारह माह के शासन में सिंधिया के दैदीप्य को ढांकने की नाकाम कोशिश की गयी थी।