आपकी बत्‍ती नहीं जली तो यह आग और ज्‍यादा फैलेगी

गिरीश उपाध्‍याय

पिछले माह ही विधानसभा के मानसून सत्र में आए एक मामले की गंभीरता शायद सरकार को अब समझ में आ रही होगी। और अगर ऐसा है तो, इससे ज्‍यादा दुख और गुस्‍से वाली बात कोई और नहीं हो सकती कि, सरकारें किसी व्‍यक्ति या व्‍यक्तियों की जान चली जाने के बाद मुद्दों पर गौर करती है। मुद्दे भी ऐसे जो कतई दबे छुपे नहीं हैं और सरकारी तंत्र से लेकर जनप्रतिनिधियों तक, सबके सब उनसे अच्‍छी तरह वाकिफ हैं।

मामला राजधानी भोपाल में बिजली का बिल ज्‍यादा आने पर बिजली कंपनी के एक जूनियर इंजीनियर को पीट कर मार डालने का है। हुआ यूं कि चांदबड़ इलाके के बिजली दफ्तर में बिल ज्‍यादा आने की शिकायत लेकर पहुंचे संतोष विश्‍वकर्मा और उसके भतीजे निहाल का वहां मौजूद बिजली कंपनी के कर्मचारियों से विवाद हो गया। पहले उन्‍होंने डाटा सेक्‍शन के क्‍लर्क विनय कुमार से बहस की। शोर सुनकर ऑफिस में मौजूद जूनियर इंजीनियर कमलाकर वराठे अपने कमरे से बाहर आए और उन्‍होंने शिकायतकर्ताओं से पूछताछ की। इसी दौरान शिकायतकर्ता उनसे भी उलझ लिए और चाचा भतीजे ने मिलकर वराठे की जमकर पिटाई कर दी। मारपीट के थोड़ी देर बाद, वराठे को उलटियां हुईं और जब तक उन्‍हें अस्‍पताल में इलाज मिल पाता उन्‍होंने दम तोड़ दिया ।

पता चला है कि जिस बिल पर विवाद हुआ, उसकी राशि मात्र 1038 रुपए थी और बिजली कंपनी के अनुसार आरोपियों ने कुछ माह से चूंकि बिल नहीं भरा था इसलिए बिल ज्‍यादा आया था। वराठे ने हंगामा कर रहे चाचा भतीजे से सिर्फ इतना कहा था कि बिल ठीक है और आप इसे भर दें। लेकिन बिल भरने के बजाय आरोपियों ने इंजीनियर की जिंदगी की ही रसीद काट दी।

विधानसभा के जिस मामले का मैंने जिक्र किया, वह इस घटना के पीछे छिपे कारणों की बहुत तफसील से व्‍याख्‍या करता है। 21 जुलाई को भाजपा के ही वरिष्‍ठ विधायक और पूर्व मंत्री कैलाश चावला ने ग्रामीण क्षेत्र में बिजली की समस्‍या उठाते हुए सरकार का ध्‍यान इस ओर दिलाया था कि, बिजली कंपनियों ने जो नियम बनाए हैं वे इतने उलझे हुए हैं कि नियमित रूप से बिल जमा करवाने वालों को भी बिजली नहीं मिल पा रही है। ऐसे इलाकों के ट्रांसफार्मर भी नहीं बदले जा रहे हैं। चावला की मांग थी कि सरकार यह घोषणा करे कि जो लोग नियमित रूप से बिजली का बिल जमा करवा रहे हैं, उन्‍हें दूसरे लोगों के बिल न जमा कराने की सजा नहीं मिलेगी। यदि बिल का भुगतान न होने के कारण उस इलाके की बिजली काट दी जाती है तो, गैर डिफॉल्‍टर लोगों के बिल माफ होंगे। लेकिन ऊर्जा मंत्री पारस जैन नियमों आदि का हवाला देकर अपनी बात पर अड़े रहे और सत्‍ता पक्ष एवं विपक्ष की सामूहिक मांग के बावजूद इस समस्‍या का कोई ठोस हल नहीं निकल पाया।

दरअसल प्रदेश में बिजली बिलों को लेकर शिकायत ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों को है। आमतौर पर उपभोक्‍ताओं के मन में यह धारणा बैठी हुई है कि बिजली कंपनियां उनसे अनाप-शनाप बिल वसूल कर रही हैं। लोग मानते हैं कि उनके मीटर ठीक से काम नहीं कर रहे और मीटर की रीडिंग भी गलत-सलत दर्ज की जा रही है। ऐसे में बिजली बिलों को लेकर रोष और विवाद की स्थिति आए दिन बनती रहती है। चूंकि बिजली कंपनियों ने बकाया वसूली को लेकर सख्‍ती का रुख अपना रखा है इसलिए तनाव ज्‍यादा होता है। क्‍योंकि एक तरफ तो नियमित रूप से बिजली बिल भरने वालों पर बिजली कंपनियां का लगातार दबाव बना रहता है, वहीं दूसरी तरफ उपभोक्‍ता देखते हैं कि कई लोग सरेआम बिजली चोरी करते हैं, पर उनसे न तो सख्‍ती होती है और न ही बिजली बिलों की वसूली।

प्रदेश का शायद ही कोई ऐसा शहर होगा जहां झुग्‍गी बस्तियों में बिजली की लाइनों पर सीधे तार डालकर बिजली चोरी न की जा रही हो। इसी तरह ग्रामीण क्षेत्र में भी कई रसूखदार लोग धड़ल्‍ले से बिजली चोरी करते हैं और इस कारण आने वाले अनाप शनाप बिल की राशि नियमानुसार न भरे जाने पर कंपनियां उस इलाके की बिजली काट देती हैं या फिर वहां का ट्रांसफार्मर खराब होने पर उसे बदला नहीं जाकर लोगों को सबक सिखाया जाता है। ये बातें लोगों को बर्दाश्‍त की सीमा लांघ जाने की हद तक नाराज करती हैं और राजधानी में हुई इंजीनियर की हत्‍या इसी नाराजी और तनाव का परिणाम है।

इस स्थिति को कतई स्‍वीकार नहीं किया जा सकता। कंपनियों का अपने इंजीनियरों और कर्मचारियों पर बकाया की वसूली को लेकर दबाव है। दूसरी तरफ वे यदि इसके लिए कोशिश करते हैं तो लोगों के गुस्‍से का शिकार होते हैं। और अब तो एक इंजीनियर की जान तक चली गई। जरूरी है कि सरकार इस दिशा में तत्‍काल गंभीरता से सोचे। बिजली की चोरी करने वाले सख्‍ती से दंडित हों। इसके साथ ही उपभोक्‍ता को दिए जाने वाले बिजली बिलों की मदों में और स्‍पष्‍टता लाकर उन्‍हें अधिक पारदर्शी बनाया जाए। इसके लिए उपभोक्‍ताओं की काउंसलिंग का व्‍यापक अभियान भी चलाया जा सकता है। भोपाल की घटना एक चेतावनी है, यदि खतरे की इस घंटी को अभी नहीं सुना गया तो भविष्‍य में इसके और अधिक गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

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