ये जन्माष्टमी की बधाई है या श्रीकृष्ण का मजाक?

सोशल मीडिया पर जन्‍माष्‍टमी के दिन कृष्‍ण जन्‍म की बधाइयों का लंबा सिलसिला चला। लेकिन इसमें सबसे ज्‍यादा खटकने वाली बात यह रही कि लोगों ने नया करने के नाम पर ऐसी भाषा और शैली में जन्‍माष्‍टमी की बधाई दी कि वह बधाई कम बल्कि श्रीकृष्‍ण का मजाक ज्‍यादा लग रही थीं। ऐसी ही एक बधाई की बानगी देखिए, जो सोशल मीडिया पर वायरल हुई।

‘’इमामे इश्क, क़ायदे आज़म-ए-हिंद, साहिबे किताबुल अमल, सरदारे ख़ानवादा-ए-पांडव, जद्दे अमजद क़बीला-ए-यादव, फातहे जंगे अज़ीम, मददगारे मिस्कीन, आली जनाब इज़्ज़त मआब देवकीनंदन कृष्ण उर्फ कन्हैयालाल उर्फ़ मुरली बजैया रास रचैया उर्फ़ बाल गोपाल उर्फ़ नन्द किशोर उर्फ़ इब्ने जनाब वासुदेव वृंदावन वाले की यौमे पैदाइश पर तमाम अहले वतन को पुरख़ुलूस मुबारकबाद।।।…’’

यहां सवाल किसी भाषा को लेकर नहीं है लेकिन क्‍या इसी तर्ज पर किसी और धर्म के देवी देवताओं अथवा पैगंबरों के बारे में संदेश जारी किए जा सकते हैं? जरा करके देखिए, दर्जनों जगहों पर दंगे हो जाएंगे। आखिर हम अभिव्‍यक्ति की आजादी, या नया करने के नाम पर कुछ भी ऊटपटांग हरकतें करके अपने ही धर्म और प्रतीक पुरुषों का इस तरह मजाक क‍ब तक उड़ाते रहेंगे।

वाट्सएप पर इसी तरह कृष्‍ण की अलग अलग लीलाओं और उनके व्‍यक्तित्‍व को लेकर भी छींटाकसी की गई। ऐसी पोस्‍ट पर प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त करते हुए एक ग्रुप एडमिन ने लिखा-

‘’एक मैसेज अभी सोशल मीडिया में चल रहा हैं, जिसमे प्रभु श्री कृष्ण को टपोरी, लफड़ेबाज़, मर्डरर, तड़ीपार, इत्यादि कहा गया है।‘’

कृष्ण ने नाग देवता को नहीं बल्कि लोगों के प्राण लेने वाले उस दुष्ट हत्यारे कालिया नाग का मर्दन किया था, जिसके भय से लोगों ने यमुना नदी में जाना बन्द कर दिया था।

वे कंकड़ मारकर लड़कियाँ नहीं छेड़ते थे, अपितु दुष्ट कंस के यहाँ होने वाली मक्खन की जबरन वसूली को अपने तरीके से रोकते थे और स्थानीय निवासियों का पोषण करते थे।

दुष्ट चाहे अपना सगा ही क्यों न हो, पर यदि वो समाज को कष्ट पहुँचाने वाला हो तो उसको भी समाप्त करने में संकोच नहीं करना चाहिए, यह भगवान कृष्ण की सीख है।

उनके 16000 लफड़े नहीं थे। वे सब नरकासुर की कैद से छुड़ाई गई स्त्रियाँ थी, जिन्हें सम्भवतः समाज स्वीकार नहीं कर रहा था। कृष्‍ण ने उन्हें पत्नी का सम्मानजनक दर्जा दिया। वो भोगी नहीं योगी थे।

इन संदर्भों में आप भी विचार करें कि आखिर हम अपने ही धर्म और संस्‍कृति का कब तक और किस हद तक मखौल उड़ाते रहेंगे। और इससे किसका भला होने वाला है?

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