राकेश अचल

देश की और दुनिया की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टियों में से एक है कांग्रेस। इस कांग्रेस में इस समय एक अजीब किस्म की हलचल है। कांग्रेस के युवा तुर्क तेजी से कांग्रेस छोड़कर इधर-उधर जा रहे हैं। लेकिन ये समझ में नहीं आ रहा है कि ये भगदड़ है या बगावत? भगदड़ और बगावत में बुनियादी भेद है। पार्टी नेतृत्व को बदलने या चुनौती देने के बजाय युवा नेता बहाने बनाकर कांग्रेस से पल्ला झाड़ रहे हैं। ताजा उदाहरण राजस्थान के युवा तुर्क सचिन पायलट का है।

कांग्रेस का नेतृत्व यकीनन परिवारवादी है लेकिन उसे चुनौती देकर हटाने का संकल्प किसी युवा तुर्क में दिखाई नहीं देता। मुझे तो सचिन जैसे संभावनाशील नौजवानों को युवा तुर्क कहने में भी संकोच होता है, क्योंकि युवा तुर्क हथियार डालते नहीं बल्कि हथियार छीनते हैं और उनका प्रयोग करते हैं।  कांग्रेस के परिवारवादी नेतृत्व से घबड़ाकर बागी तेवर अपनाने वाले सचिन पायलट न पहले व्यक्ति हैं और न आखरी होंगे। ये सिलसिला चलता ही रहता है लेकिन अपवादों को छोड़कर कोई ऐसा नेता अब तक सामने नहीं आया है जिसने कांग्रेस की विचारधारा का परित्याग किये बिना कांग्रेस को बदलने का काम किया हो।

देश में भाजपा के अलावा केवल और केवल कांग्रेस ऐसा राजनीतिक दल है जो सत्ता में न होते हुए भी उत्तर से दक्षिण तक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक जाना-पहचाना जाता है, या जो एक विचारधारा के रूप में आज भी मौजूद है। कांग्रेस के नेतृत्व से आजिज आकर बाहर जाने वालों में से ममता बनर्जी जैसी एक-दो नेता हैं जिन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई लेकिन वे भी कांग्रेस के परिवारवादी नेतृत्व का तख्ता पलट नहीं कर पाई, उन्होंने भी अपना प्रभाव क्षेत्र एक राज्य तक सीमित कर लिया। जिन नेताओं ने कांग्रेस छोड़ी वे या तो क्षेत्रीय नेता बन कर रह गए या फिर परिदृश्य से गायब हो गए, ज्योतिरादित्य सिंधिया या रीता बहुगुणा जैसों ने भाजपा में शरण लेकर अपना भविष्य सुरक्षित करने की कोशिश की, लेकिन विचारधारा के मामले में वे कहीं के नहीं रहे।

आपको याद होगा कि कांग्रेस के परिवारवादी नेतृत्व को आठवें दशक में स्वर्गीय नारायणदत्त तिवारी और अर्जुन सिंह जैसे नेताओं ने चुनौती दी थी। अपना अलग राजनीतिक दल भी बनाया लेकिन जन स्वीकृति न मिलने के बाद वे फिर कांग्रेस में लौट आये। गांधी परिवार के समानांतर खड़े रहने का बूता अब तक किसी में नजर नहीं आया है और शायद यही वजह है कि कांग्रेस में गांधी परिवार अप्रासंगिक नहीं हो पा रहा है। ज्योतिरादित्य सिंधिया की पीढ़ी से कुछ उम्मीद थी लेकिन इस पीढ़ी ने भी पीठ ही दिखाई है और परिवर्तन की संभावनाओं को समाप्त कर दिया।

कांग्रेस हो या कोई अन्य राजनीतिक दल, उसमें बगावत आम बात है किन्तु इस बगावत का कोई दूरगामी परिणाम सामने नहीं आ पाता। आज के सत्तारूढ़ दल भाजपा में भी बगावतें हुईं लेकिन नतीजा वो ही ‘ढाक के तीन पात’ वाला निकला। जो पार्टी से बाहर गया वो झक मारकर वापस आ गया। फिर चाहे बागी कल्याण सिंह रहे हों या उमा भारती या केशुभाई पटेल। कहने को भाजपा देखने में दूसरे दलों से एकदम अलग है लेकिन यहां भी नेतृत्व एक ‘परिवार’ का ही चलता है।

परिवारवाद पर आधारित राजनीतिक दलों से राजनीति को मुक्त करना आसान काम नहीं है। जैसे भाजपा संघ परिवार से बाहर नहीं निकल पाती वैसे ही कांग्रेस गांधी परिवार से। सपा यादव परिवार से और बसपा बहन जी से। बड़े राजनीतिक दल ही नहीं अपितु रामविलास पासवान जैसों की मुहल्ले छाप पार्टियों में भी परिवारवाद मुख्य तत्व है।

अब सवाल ये है कि क्या निकट भविष्य में कांग्रेस गांधी परिवार के नेतृत्व को ख़ारिज कर कोई नया नेतृत्व तलाश  पाएगी? कांग्रेस की मौजूदा सुप्रीमो श्रीमती सोनिया गाँधी कांग्रेस को जो ऊंचाई दे सकती थीं दे चुकीं, उनके उत्तराधिकारी राहुल गांधी पार्टी की जितनी दुर्दशा कर सकते थे, कर चुके। लेकिन आगे क्या हो सकता है। राहुल की बहन प्रियंका वाड्रा यूपी जीतने के लिए चन्द वामपंथियों का सहारा लिए लखनऊ   में डेरा डाले हुए हैं। कांग्रेस का आधार रहे, जनाधार वाले पुराने सामंत तेजी से कांग्रेस छोड़ भाजपा में जा रहे हैं। शुरुआत मध्यप्रदेश से हो चुकी है। अभी सिंधिया और लोधी गए हैं कल को और भी जायेंगे, बावजूद इसके कांग्रेस का वजूद क्यों बना रहेगा या क्यों बना रहना चाहिए?

दुर्भाग्य ये है कि कांग्रेस के पास कोई संघ परिवार नहीं है जो नए नेतृत्व को भविष्य की जरूरतों के हिसाब से तैयार कर सके। कांग्रेस को भी एक मोदी की जरूरत है, लेकिन गांधी परिवार के पास अपना मोदी तैयार करने की न दृष्टि है और न कोई तैयारी। कांग्रेस आज भी अपना काम उम्रदराज नेताओं के सहारे चलाना चाहती है। गुजरात में हार्दिक पटेल को अध्यक्ष बनाया जाना एक अपवाद है।

कांग्रेस का असल जनाधार हिंदी पट्टी में था लेकिन इस हिंदी पट्टी में अब कांग्रेस के पास ऐसा कोई नेता नहीं है जो पार्टी की नाव को पार लगा सके। दक्षिण में भी कांग्रेस का शिराजा बिखर चुका है। वहां भी जगनमोहन जैसे लड़के कांग्रेस का दामन छोड़ चुके हैं। ऐसे में क्या सम्भव है कि कांग्रेस का मौजूदा नेतृत्व 2024 में भाजपा के लिए चुनौती बन सके।

पिछले एक दशक में देश ने देखा है कि कांग्रेस लगातार क्षीण हुई है लेकिन नेस्तनाबूद नहीं हुई है। जब-जब लगता है कि कांग्रेस जमींदोज हो रही है, तब-तब उसमें अंकुर फूट पड़ते हैं। कांग्रेस मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और पंजाब में मर-मरकर खड़ी हो जाती है। भाजपा की देश को कांग्रेस मुक्त करने की कवायद को किसी न किसी वजह से धक्का पहुंचता है। भाजपा का अपना सपना है और कांग्रेस का अपना सपना। दोनों को जनता के सपनों की परवाह नहीं है जबकि जनता के सपने इन्हीं दो दलों के सपनों में कहीं न कहीं निहित हैं।

मेरा मानना है कि कांग्रेस में युवा तुर्कों को पार्टी में रहकर ही मौजूदा नेतृत्व के खिलाफ सीना तानकर खड़े होना चाहिए। उन्हें दुत्कारा जा कसता है, नकारा जा सकता है, लेकिन जनता को इससे उम्मीद बंधती है और मुमकिन है कि इसी के चलते कांग्रेस किसी दिन परिवारवादी नेतृत्व से मुक्त होकर एक नए रूप में देश के सामने आ जाये।

आप देख रहे होंगे कि कांग्रेस में भगदड़ के कारण भाजपा आधी कांग्रेसमय हो गयी है। कांग्रेस के बागियों को भाजपा में बड़ी आसानी से शरण मिल रही है। भाजपा के युवा तुर्कों को भी इस घालमेल के खिलाफ खड़ा होना चाहिए अन्यथा जैसे आज कांग्रेस की दुर्दशा है, कल को भाजपा की भी हो सकती है। तब भाजपा भाजपा नहीं काजपा बन सकती है, जिसका चाल, चरित्र और चेहरा बहुत कुछ कांग्रेस जैसा नजर आ सकता है। भाजपा में एक दिन आप शुद्धता खोजते रह जायेंगे।